बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

बंद

(कोयल मजदूरों की कालोनी में हम पले बढे . बहुत करीब से शोषण देखा है. और देखा है हड़ताल में हिस्सा लेते मजदूरों को. सरकार पर अब कोई असर नहीं होता इन हडतालों का क्योंकि जनसरोकारों से दूर होती गई है सरकार. आज भारत बंद है. एक कविता  हडतालियों मजदूरों के नाम )

वे चाहते हैं 
 होठ सिले रहें
और बंद हो जाये
स्वर 
ताकि न लगे कोई
नारा कभी
शासन के विरुद्ध
 
चाहते हैं वे 
उँगलियाँ
न आयें कभी साथ
बनाने को मुट्ठी
जो उठे प्रतिरोध में


ठिठके रहे
 कदम
एक ताल में
न उठे कभी
सदनों की ओर

वे  चाहते हैं 
छीन लेना
हक़ जीने का
विरोध जताने का।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन रचना...
    सशक्त अभिव्यक्ति...

    सादर
    अनु

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  2. वे सब कुछ अपने हिसाब से चाहते हैं ....

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  3. कभी हम बनते वे, कभी वे बनते हम.

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  4. मूक रहें जन,
    तप्त सहें मन,
    क्यों उत्सुक हैं,
    कमतर जीवन।

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  5. और उन्हें हक मिले मनमानी करने का..

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  6. वे चाहते हैं
    होठ सिले रहें
    और बंद हो जाये
    स्वर
    ताकि न लगे कोई
    नारा कभी
    शासन के विरुद्ध.

    सरकार को इस तरह के प्रदर्शन और विरोध नाकाबिले बर्दाश्त है और यह भी सच है है कि उन्हें कोई अन्य तरीके भी हजम नहीं है.

    सुंदर सशक्त कविता.

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. बहुत स्पष्ट ओर प्रभावी .... अगर उनका बस चले तो साँसें भी गिन गिन कर लेने दें ... सामयिक रचना है अरुण जी ...

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