मंगलवार, 29 मार्च 2011

मेरे कैनवास के चित्र

इन दिनों मैं
बनाना चाह रहा हूँ
एक चित्र
पूरी असफलता से

एक आदमी
बनाना चाह रहा हूँ
लेकिन बन नहीं पा रहा
जो बनाया इसका सिर
बन गया बहुत बड़ा विशाल 
और अनगिनत वायरों में उलझ गया 

इसके हाथ
आम आदमी के हाथ से
बन गए काफी बड़े और
उंगलियाँ बन गईं
मोबाइल के टावर सी
और नाखून उग आये
इस चित्र में
नाखून बढ़ने लगे
बेहिसाब और
कुरेदने लगे
धरती की आंतें
रक्त रंजित हो गया
वातावरण और आवरण

जो बनाने लगा पैर
वामन से बन गए
चट्टानों से पैर के नीचे
आने लगे पेड़ पौधे
पहाड़ और नदियाँ
रेगिस्तान
अचानक बढ़ने लगा
रेगिस्तान का आकार
उसमे उगने लगे नागफनी
हर तरफ

तूलिका से
जो खींचा कैनवास पर
आसमान की  पृष्ठभूमि
रंग स्वयं बदल गया
नीले से स्याह
धुंए के गुबार से भर गया
आसमान

मशीन सा हो गया
मेरे चित्र का मानव
यंत्रों की तरह हो गई
संवेदनाएं उसकी
कृत्रिम सा हो गया
फूलों का रंग
उसके बगीचे में
डरी सी है चिड़िया
गुमसुम
गंध कुछ हो गई
पेट्रोल सी

बनाया जो
उसका ह्रदय
संकुचित सा बन गया वह
खुल ही नहीं रहे उसके कपाट
मानव जन्य भाव
उत्पन्न ही नहीं हो रहे 
उसके चेहरे को
जो रंगना चाहा हल्के गुलाबी रंग में
कुछ ईंटों सा हो गया उसका रंग
सिलवटें भी आड़ी तिरछी नहीं बनी
बल्कि दीवार सी हो गईं सीधी सपाट 
संज्ञा विहीन

मेरे कैनवास पर
बने इस चित्र का यह
असमानुपातिक  मानव
कर रहा है हासिल
ज्ञान विज्ञान कला के क्षेत्र में
तरह तरह की उपलब्धियां
लोग पसंद कर रहे हैं इसे
विभिन्न गैलरियों  में
पूछ हो गई है इसकी
लिया  जा रहा  है इसका  साक्षात्कार
 
जबकि
मेरा ही एक और चित्र
जिसमे  उसकी आँखों मे झील है 
और पानी इतना पारदर्शी कि
झील की  तलहटी में 
बसी मछलियाँ यूं ही दिखती हैं
करती  अटखेलियाँ
उसमे एक बच्चा भी है
तितलियों के पीछे भागता
एक गौरैया पेड़ की डाल पर
खुश दिख रही है , 
उतार दिया गया  है दीवार से
पड़ा है अकेला .

बुधवार, 23 मार्च 2011

कबाड़

कल तक
होता जो था धरोहर अनमोल
आज उसका तय कर दिया गया है 
अपना मोल
कुछ प्रति नग तो कुछ प्रति किलो

सहेज कर जो
रखे जाते थे बच्चो के कपडे
और रोमांचित हुआ करते थे
वर्षो बाद
सुखद स्मृतियों
कर लिया करते थे ताज़ी
अब नहीं हुआ करेंगी
बिकने लगे हैं
लगने लगे हैं भाव
पुराने कपड़ो के  भी

उतरन से
ढकी जाती थी 
दूसरो की देह
कई बार भरा होता था
इसमें भी नेह
अब नहीं हुआ करेगा
ऐसा
कबाड़ जो हो गए हैं
हमारे पहिरन
बिकने लगे हैं


कांसे पीतल
अलमुनियम
और फिर स्टील  की थाली, कटोरी, गिलास
इन पर खुदे होते थे
बच्चो के नाम
दादा दादी के नाम
माँ बाबूजी के नाम
पीढियां संजोती थी इन्हें
जीती थी इन्हें रोज़ ही
अब नहीं होगा कुछ ऐसा
पुराने बर्तनों के बदले
मिल जाते हैं बर्तन नए

बाबूजी उतार कर
दे दिया करते थे
अपना जूता
जब आने लगता था बेटे को
और गर्व से होता था
जूते की उम्र का जिक्र
पुराने जूते काटा नहीं करते एडियाँ
कहा करते थे पुराने लोग
और फिर आरामदेह भी हुआ करते थे
जूते अब नहीं बदलते 
पीढियां

व्याकरण, साहित्य, शब्दकोष
चलती थी कई पीढ़िया
कई बार मिल जाते थे उनके बीच
मोर के पंख
फूलों की सूखी किन्तु 
सहेज कर रखी गई पंखुड़ियां
लिख कर मिटाया गया किसी का नाम
सिले होते थे मोटे खादी के धागों से मोटी किताबें
रंग दिया जाता था सिलाई के धागों को
अब किलो के भाव बिक जाती हैं कहीं भी
खो जाते हैं, अनाथ हो जाते हैं
मोर के पंख, पंखुड़ियां और 
कुछ नाम भी

हो गए  हैं संदूक खाली
दालान के , मन के
सब यादें  हो गई  हैं अब कबाड़ .

शुक्रवार, 18 मार्च 2011

प्रिये ! रंग देना इस होली


बनियान
जिसमे हो गए हैं
असंख्य छेद
पीठ पर उगे
समय के  काँटों से
उलझ कर,
रंग देना उसे प्रिये
इस होली
लाल रंग में 


लहराते झंडे की तरह लाल
 . 



कमर से 
बंधी है जो 
घुटने तक धोती 
कभी रही होगी 
धवल सफ़ेद 
समय के खिलाफ 
मिटटी से लड़कर 
आज मटमैली हो गई  है 
रंग देना प्रिये 
इस होली 
हरे रंग में 

लहलहाते खेतों की तरह हरी
३. 

पैरों में 
टायर की काली चप्पल 
जो पड़ी है सालों से 
घिसने लगी है अब 
कोलतार वाली सडको पर
चल कर 
रंग देना प्रिये 
इस होली 
सुनहरे रंग में 

रोशनी से सुनहरे रंग में 

४.

कंधे पर 
रखा है जो अंगोछा 
सोख सोख कर पसीना 
हो गया है 
उसी के रंग सा बदरंग 
रंग देना प्रिये 
इस होली 
गहरे नीले रंग में 

आसमान सा नीला जो टिका रहे कन्धों पर 

५.

चेहरे पर
उग आयी हैं
पगडंडियाँ
मानो हर रोज़
इस रास्ते गया हो कोई 

अनजान लक्ष्य की तरफ
फिर लौट कर न आया हो
इन्हें भर देना प्रिये
मुट्ठी भर गुलाल से
इस होली


समय जैसे भर देता है सारे घाव

६ . 

आँखों में
ठहरी हुई है
एक नदी
अरसे से
गंदला हो गया है पानी
रुकने से
घोल देना इसमें प्रिये
बहते हुए पानी का रंग
इस होली 

कि  फिर कोई और नदी ठहरे नहीं. 

इस होली

इस होली
भर दूंगा
तुम्हारे आँचल को
हरे रंग से
जैसे भरा होता है जंगल
हरीतिमा से

इस होली

भर दूंगा
तुम्हारी आँखों में
नीला रंग
कि हो जाओ तुम
समंदर की तरह अथाह 

इस होली 

रंग दूंगा 
तुम्हारे चेहरे को
नारंगी रंग से
जैसे क्षितिज पर होता है
सूरज हर शाम


इस होली

भर दूंगा
तुम्हारा  अंग अंग
विश्वास के रंग से
ताकि  
समय और सीमा  से परे 
होली बसे
हमारे जीवन में
हर दिवस .

मंगलवार, 15 मार्च 2011

ताला


सुना  है
पहले के ज़माने में 
घरों में ताले नहीं लगाये जाते थे
यह भी सुना है कि
आज भी कई गाँवों  में 
लोग घरो में ताला नहीं लगाते 
सहसा विश्वास ही नहीं होता 
आज के समय में 
 
सोच सोच कर 
जकड जाता है दिमाग की
ना जाने क्यों बना ताला 
किसने किया अविष्कार 
क्या आवश्यकता रही होगी 
और पहली बार 
किसने लगाया होगा ताला 

ताला 
आदमी आदमी के बीच 
अविश्वास का 
पहला यन्त्र रहा होगा 
जब किसी  भाई ने 
अपने भाई से 
छिपाया होगा कुछ 
ताले के भीतर 
या फिर कोई 
छीन लाया होगा
किसी के हिस्से की रोटी

जब किसी के पास 
हुआ होगा जरुरत से अधिक 
बचा लिया होगा उसने 
भविष्य की खातिर 
या मन में उपज आया होगा 
कोई भेद, कोई लोभ 
यहीं पैदा हुई होगी आवश्यकता 
ताले के आविष्कार की 

किसी को 
जब मिल गया होगा
बिना श्रम के कोई साध्य 
या फिर किसी और के श्रम का साध्य 
जरुरत पड़ी होगी उसे
दुनिया से छिपाने  की
जरुरत पड़ी होगी 
ताले की 
भ्रष्ट्राचार की पहली कड़ी
ताले के निर्माण से शुरू हुई होगी 
निश्चित ही किसी चोर ने 
नहीं बनाया होगा ताला

कालांतर में 
ताला बन गया 
जीवन का अभिन्न अंग
घर में ताला
घर के भीतर तिजोरी में ताला 
फैक्ट्री में ताला 
दफ्तर में ताला
गाड़ी में ताला
कंप्यूटर में ताला
और इन तालों की रक्षा के लिए 
लगाये जा रहे हैं और भी कई  ताले 
तरह तरह के ताले
भरपूर उपयोग हो रहा है 
साधनों संसाधनों का 
सेना, हथियार सब जुटाए जा रहे हैं
ताले की रक्षा के लिए

आज हो रही है राजनीति 
ताले की
किसका ताला है 
कितना मजबूत
कौन खोल सकता है
किसका ताला
किसके ताले की चाबी
है किसके पास
कोई लगाना चाहता है
पेट्रोल पर ताला तो
कोई दावा करता है
उसके पास है
नाभकीय ऊर्जा के ताले की चाबी
कहीं नदी
कहीं पहाड़
कहीं जंगल
कहीं खदान तो
कहीं रेगिस्तान पर
जुगत लगाई जा रही है
ताला जड़ने की
सत्ता और इसके गलियारे में
होती है बस इसकी ही
जोड़ तोड़

कहीं कहीं
लगा दिया जाता है 
जबान पर ताला तो 
कहीं होता है ताला 
सपनों पर 
दुखद तो 
यह है कि 
लोग जड़ने लगे हैं 
ह्रदय पर भी ताला. 

शनिवार, 12 मार्च 2011

चार स्तंभों वाला असहाय पशु


कुछ लोग
एक पशु को
ले जा रहे हैं बांधे
जिबह घर की तरफ
सरे आम 
दिन दहाड़े

रेशम सी चमकीली
प्लास्टिक की डोरी से
बाँध दिया गया है
पशु  का मुंह  
जिस से कि वह 
बोल न सके 
चिल्ला न सके
जुटा न ले देश भर के 
पशुओं  को 

कहने की बात तो 
नहीं है लेकिन
जरुरी है
याद दिलाना कि
पशु के होते  हैं चार पाँव 
इन चार पाँवों पर
खड़ा होता था वह 
लाचार है आज

तोड़ दिया गया है 
उसका एक पाँव 
वही पाँव जो था तो पिछला 
लेकिन उसके शरीर का 
पूरा भार उठाता था 

पशु  के दूसरे पाँव को
निर्बल कर दिया गया है
देकर अलग तरह का 
नशा 
जिससे हो गया है बेकार 
उसका यह पाँव भी 
लड़खड़ा रहा है नशे में 
उसका यह पाँव 
जिसे अभी करना चाहिए था
 विद्रोह, आन्दोलन,क्रांति 

उसके बाकी के दो पाँवों  को 
जकड दिया गया है
मजबूती से
उसी चमकीली रेशम सी 
प्लास्टिक की रस्सी से
जो संवेदनहीन होती  है
प्लास्टिक के सभी गुण होते हैं
उस रस्सी में 

पाँवों  को  बेकार कर देने से
निर्बल हो गया है 
वह पशु और
बिना अधिक प्रतिरोध के
ले जाया जा रहा है वह 
जिबहघर की ओर 

हम देख रहे हैं
आप भी देख रहे हैं
सब देख रहे हैं
पशु  देखते देखते जिबह हो जायेगा
परोस दिया जायेगा 
राष्ट्रीय बहुराष्ट्रीय भक्षियों के सामने 

चार स्तंभों वाला 
असहाय पशु  ! 

गुरुवार, 10 मार्च 2011

लिफ्टमैन

किसी भी
बहुमंजिले कार्पोरेट टावर में
होती  हैं कई कई लिफ्ट
जो चलती  हैं
भूतल के दो तल नीचे से
सबसे ऊपर मंजिल तक
और प्रत्येक लिफ्ट में
होता है एक लिफ्टमैन
पूरी तरह सुसज्जित
चेहरे पर मुस्कान लगाये
और संक्षिप्त अभिवादन करते
सुबह से देर रात तक
यांत्रिक सा


जिन लिफ्टों में
तय होता है
व्यापारिक नीतियों का सफ़र
विपणन की रणनीति
एक मंजिल से दूसरी मंजिल तक
तटस्थ रूप से
होता है  खामोश
लिफ्टमैन


गिरते सेंसेक्स पर
जब कोई छलांग मारता है
सबसे ऊपरी  मजिल से नीचे
लिफ्टमैन ही
पहुंचाया होता है उसे
सबसे ऊपरी मंजिल पर
रोक लिया होता उसने
यदि नही होता
उसे निर्देश
तटस्थता का

वह जो
रोज़ शाम को
आती है दफ्तर के
बंद होने के बाद
पब्लिक रिलेशन के नाम पर
बिल्कुल अच्छा नहीं लगता
लिफ्टमैन को
वह नहीं ले जाना चाहता  है
लिफ्ट उसके निर्देश पर
चाहता है कि
पंहुचा दे उसे घर वापस
या फिर लगा दे
एक जोरदार चांटा
भाई स्वरुप

कई बार
जब देर रात को
उतर रहे होते हैं
वे दो
लिफ्टमैन
स्वयं ही नहीं उतरता मंजिले
उनके साथ
प्रार्थना करता है
ईश्वर से

जिसकी पिछले साल
हुई थी शादी
अभी पेट से है
उसे देख कर
लिफ्टमैन को
याद आती है
अपनी घरवाली
उसे सुध नहीं रहती
मंजिलो की

जब बंद हो जाते हैं
दफ्तर सभी
सुस्ताते हैं दोनों
लिफ्ट और लिफ्टमैन
बहुत बातें करता है
वह लिफ्ट से
अपनी पत्नी
होने वाले बच्चे के बारे में

आदमियों के
जाने के बाद ही
आदमी सा मह्सूस कर पाता है
यांत्रिक सा दिखने वाला
तटस्थ लिफ्टमैन

सोमवार, 7 मार्च 2011

तवा

तवा 
बदला नहीं है
रसोई में 
वर्षो से 

चढ़ा है  
रोज ही 
कई कई बार
जब तक रहा है 
सब कुछ सामान्य 
थका नहीं है कभी 
तवा 

आंच पर
चढ़ने से 
कमजोर तो हुआ ही है 
किन्तु तप कर 
कुछ अधिक ही 
हुआ है काला 
कुछ इस्पात सा 


थका नहीं है
ना कभी हुई है
कोई प्रतिक्रिया 
कठोर है
लेकिन दिखाई नहीं 
कठोरता 
हाँ ! दृढ अवश्य दिखता है 
कभी जो गौर से 
देखो इसे 

जब तक
आंच पर नहीं चढ़ता 
बहुत अकेला होता है
तवा 
सबसे अलग
सबसे भिन्न
अपने अकेलेपन को
कभी किसी से 
जताया नहीं
बांटा नहीं 
अन्य बर्तनों की तरह 
ना ही कभी खडका 

बातें करना चाहता है 
बिना आंच पर चढ़े भी 
कुछ पिता सा लगता है 
तवा , आज 

गुरुवार, 3 मार्च 2011

चार साल और हम

जब दुनिया मिलेनियम  वर्ष मना रही थी, मैं और ज्योति विवाह के बंधन में बंधे थे. एक कापीराइटर के पास क्या होता है अपनी पत्नी को देने के लिए. बस विज्ञापन सी कवितायें. आज के दिन फिर जब कार्य की विवशता के कारण  उसके साथ रहना नहीं हो रहा है, अपनी चौथी वर्षगाँठ पर लिखी एक कविता याद आ रही है, जो आज भी प्रासंगिक है.



कैसे गुजर गए
चार साल
समझते समझाते
लड़ते झगड़ते
प्यार प्यार में
मनते  मनाते 

कैसे गुजर गए
चार साल 

दीवारों को बनाया घर
तिनका तिनका जोड़ कर
रसोई में आयी खुशबू
दरवाज़ों पर लगे गमले
कभी गुस्से में लाल होकर
कभी प्यार में सुर्ख हो  कर
कैसे गुजर गए
चार साल 

मनाई कई कई दिवाली
खेले हर दिन होली
आसमां में देखे कई इन्द्रधनुष
बादलो पर होकर सवार
खोये खोये से हम
पाए पाए से हम
कैसे गुज़र गए
चार साल 

तुमने बटोरी  ख़ुशी
अपनी अंजुरी में
तुमने संजोये सपने
अपनी आँखों में
तुमने समेटा मुझे
अपने  आँचल में
तुमने भरा रंग
कुछ अलग सा कुछ चटक सा
अपने जीवन में
मेरे जीवन में
'अभि ' के जीवन में

कुछ ऐसे गुजरे
ये चार साल

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...