गुरुवार, 30 सितंबर 2010

टांग दिया है हल

दो जोड़ी बैल थे
अब नहीं रहे
मेरे ही नहीं
गाँव में
किसी के भी
नहीं रहे
बैल


निरीह थे
जुत जाते थे
रुखा सूखा खा लेते थे
हमारी तरह
अपनापन भरी
हथेलियों के स्पर्श से
भर जाता था
उनका भी पेट
और आँखें
चमक उठती थीं
बच्चों की तरह

खेती तो बढ़ी नहीं
लेकिन बढ़ गई
उसकी लागत
और तौर तरीके
और इस बदलते समय में
नहीं बदल सकते थे
बैल
बाबा की तरह


धीरे धीरे
घुस गई मशीन
खेतों में
खलिहानों में
दालानों में
कुटाई में
पिसाई में
पेराई में
मशीनों के दखल से
बेदखल होने लगे बैल
ठीक वैसे ही
जैसे आज
बेदखल हो गए हैं
पिता जैसे हज़ारो किसान
और
परिवर्तित हो गई
आत्मनिर्भरता
निर्भरता में

बैलो के
जाने के साथ
टांग दिया गया
वर्षों पुराना हल
आँखों में
सवाल के साथ
शायद
नहीं है जिनका
कोई हल
आधुनिक अर्थशास्त्र में .

बुधवार, 29 सितंबर 2010

धर्म निरपेक्ष

१.
नहीं निरपेक्ष
हम
जात से
पात से
भात से
फिर क्यों
निरपेक्ष हम
धर्मं से



नहीं निरपेक्ष
हम
आहार से
व्यवहार से
त्यौहार से
फिर क्यों
निरपेक्ष हम
धर्म से



नहीं निरपेक्ष
हम
उत्सव से
उद्भव से
विप्लव से
फिर क्यों
निरपेक्ष हम
धर्म से




नहीं निरपेक्ष
हम
प्रार्थना से
साधना से
कामना से
फिर क्यों
निरपेक्ष हम
धर्म से


५.
चलो निरपेक्ष हो जाएँ
धर्म से
उस से पहले
निरपेक्ष हो जाए
जाति
उपजाति
नाम
उपनाम से
लेकिन
ना भूलें
जो है
धारण योग्य
वही बस है
धर्म
सभी वाद विवाद से परे
समस्त वैभव से परे
प्रेम में पगा
प्रेम में बंधा

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

मत लौटाना मेरी नींद तुम

रह गई है
मेरी नींद
तुम्हारे पास,
तुम्हारे पहलू में
लौटाना मत
इस जिंदगी
आगे और
कई जिंदगी


नहीं चाहता मैं
देखूं सपने ,
चाहता हूँ
जागूं पूरी रात
और सोचूँ
तुम्हारे बारे में
जिऊँ
तुम्हारी हंसी को
और
सुनूं मैं
तुम्हारी धड़कनों को
और
सुनता रहूँ
सारी उम्र

मत लौटाना
मेरी नींद तुम

रविवार, 26 सितंबर 2010

बेटी ही प्रकृति है


बेटी की
आँख में आसमान
और अंजुरी में
समंदर होता है

बेटी
होती है
प्रकृति के
सबसे करीब


बेटी
का मन होता है
उजला चाँद
और मस्तिष्क में
सम्पूर्ण ब्रम्‍हांड

बेटी
होती है
प्रकृति के
सबसे करीब


बेटी
का चेहरा फूल
हाथ हैं शाखाएं, पत्ते
और पैरों में होती हैं जड़ें

बेटी
होती है
प्रकृति के
सबसे करीब


बेटी
मरने के बाद भी
नहीं मरती
और मारने के
बाद भी नहीं
गौर से देखो

बेटी
प्रकृति के
सबसे करीब नहीं होती
बेटी ही प्रकृति है

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

अयोध्या

राम
तुम्हारे पहले नन्हें कदम
जिस धरती पर पड़े थे
आज
बूटों तले रौंदी जा रही है
फ्लैग मार्च हो रहे हैं
और
खामोश है आस्था
मौन हो तुम भी

तुम नहीं आओगे
आना भी नहीं चाहिए तुम्हें
इस विवाद के बीच
कि
तुम पैदा हुए थे
इसी अयोध्या में
लेकिन
ए़क बात बताना चाहता हूँ कि
नहीं समझा गया जब तुम्हें
कैसे सुना जाएगा कि
क्या चाहता है
अयोध्या

नहीं समझा
किसी ने कि
आस्था से परे भी है
अयोध्या का जीवन
अयोध्या की पहचान
अयोध्या का अस्तित्व

अयोध्या में
बच्चे हंसते भी हैं
स्कूल भी जाते हैं
लडकियां खेलती हैं
औरतें बतियाती हैं
नहीं जाना किसी ने
बस जाना तो कि
है यह राम की अयोध्या
विवादित सी

पिता भी होते हैं
पिता के सपने भी होते हैं
उन्हें भी करने हैं
बेटियों के हाथ पीले
अयोध्या में
नहीं जानने की कोशिश की
किसी ने

आसमान है
होता है आसमान में चाँद
गायें रंभाती हैं
बछड़ों के लिए
संध्या बेला
परिंदे लौट आते हैं
अपने घोंसले में
नहीं कहा किसी ने
कभी भी

राम
चले जाओ
अयोध्या से
फैसले से पूर्व

ताकि
चौदह कोशी अयोध्या जिए
आम जीवन
बूटों तले नहीं, खुले आसमान में .

बुधवार, 22 सितंबर 2010

समय

घड़ी के
बंद होने से
नहीं रुकता
समय
ना ही
आँख बंद
कर लेने से

समय
चलता रहता है
अपनी गति से
समय के साथ
बदलता रहता है
परिवेश
परिवेश में होते हैं
परिवर्तन

कुछ सार्थक
निरर्थक भी
कुछ नहीं भी
लेकिन समय
रुकता नहीं
अर्थहीन परिवर्तनों से

हम समाहित
कर लेते हैं
स्वयं में
समय के कुछ टुकड़े
जिनमें होते हैं
हमारे भाव
हमारी संवेदनाएं

मैंने भी
समय से
चुरा लिया है
ए़क टुकड़ा
छोटा सा
जिसमें तुम हो
और मैं भी
भावनाओं क़ी पालकी
लिए खड़ा हूं
तुम्हारे मन के द्वार

चाहता हूं
समय से
थोड़ी और मोहलत
कि कह सकूं
वह सब
जिसे ना कह सका
आज तक

इसी ऊपापोह में
बीत ना जाए
समय का वह
दुर्लभ पल
समय
देना मुझे
अवश्य कुछ समय

सोमवार, 20 सितंबर 2010

जरुरी नहीं शब्द

चुप हो तुम
चुप हैं हम
लेकिन बाते हैं
जो रुक ही नहीं रहीं ।

कह नहीं रही
तुम कुछ
कह नहीं रहा
मैं कुछ
लेकिन
कुछ बाकी नहीं
कहने को ।

इसलिए तो
कहते हैं
कहने के लिए
शब्द जरुरी नहीं
और
जरुरी नहीं कि
हो कोई भाषा
हो कोई बोली
हो कोई व्याकरण ।

बिना शब्द भी
बोलती हैं हवाएं
गुनगुनाती हैं तितलियाँ
पुकारते हैं पत्ते

और तुम्हारी आँखे
कहती हैं मन की बातें ।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

आखिर मर ही गया बुधना

मेरे गाँव में
ए़क है
बुधना
कई पीढ़ियों से
बदला नहीं बुधना का नाम
बुधना के बेटे का नाम भी
रखा गया बुधना ही
क्योंकि
बदलना नहीं था
बुधना का प्रारब्ध

कहते हैं
सदियों से
बुधना है
खेतों में
खलिहानों में
आम के बगीचों में
बांस की बीट में
तालाब में
मर मर कर भी
नहीं मरा है
बुधना

सदियों से
उसकी पीठ
झुकी की झुकी ही है
खाल
उधडी की उधडी
मालिकों की पीढियां बदली
चेहरे बदले मालिकों के
बदला समय का तेवर भी
लेकिन
नहीं बदला बुधना,
बुधना का प्रारब्ध

प्रकृति और
भाग्य के सभी नियम
लागू नहीं होते थे
बुधना पर

उपजाने वाले
बुधना के हिस्से
नहीं आयी कभी

पूरी रोटी ,
हवेलियो में
चैन की नींद देने वाले
बुधना के
हिस्से
नहीं आयी कभी

आँख भर नींद

बुधना
मरा सौ सौ बार
कभी
बाप के मरने पर
माँ के साथ जबरदस्ती पर
बेटे के पहली बार बन्धुआगिरी पर
फिर भी नहीं मरा बुधना

पहली बार
बुधना को लगा
नहीं बदल सकता
बुधना का प्रारब्ध

जब
उसके बीच के बुधने ने
उसी के हाथ का
नहीं पिया पानी

उसी के बेटे को
लगाया बन्धुआगिरी पर

उसी के हिस्से का आसमान
रख दिया गिरवी,
जाकर रहने लगा
उसी ड्योढ़ी में
जहाँ सदियों से
कर रहा था बुधना

चौकीदारी

आखिरकार
मर ही गया

बुधना
ए़क बुधना के ही हाथों ।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

साक्षात्कार

फूल
जो गिरे होते हैं
पेड़ के नीचे
दूब की सेज़ पर
ओस की बूंदों से सजे,
पूजा के लिए
उन्हें चुनना
एक संवाद है
एक अनुभव है
एक यात्रा है
ए़क साक्षात्कार है
प्रकृति से

तुम
प्रकृति का उपहार सी
पृथ्वी के विस्तार पर
क्षितिज सा चूमती
लग रहा था
असंख्य फूल
एक हो गए हैं
सुवासित
सुगन्धित
सुरंजित
और उनमें से
चुनना
गिन गिन कर
साँसे
ए़क संवाद है
एक अनुभव है
एक यात्रा है
एक साक्षात्कार है
प्रकृति से
ईश्वर से
स्वयं से ।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

प्रेम की तीन क्षणिकाएं

जल

सुना है
बहुत कमी होने वाली है
जल की
आने वाले समय में
सो
सँभाल के रखना
अपनी आँखों का पानी
नहीं बहाना उसे
मुझ पर

मिटटी

सुना है
मिटटी
उपजाऊ नहीं रह जायेगी
आने वाले समय में
सो
ए़क बीज रख लो
अपने भीतर
ताकि
अंकुरित हो सके
नया जीवन

वायु

सुना
है
वायु
नहीं रह जाएगी
सांस लेने के लायक
सो
भर लो मेरी भी साँसे
अपने भीतर
ताकि
संचारित रहो तुम
चिरंतन तक

सोमवार, 13 सितंबर 2010

गोबर

गोबर
हूँ मैं
कहा
जाता रहा है
बचपन
के दिनों से
जवानी के दिनों तक
और अब
बच्चे भी कहते हैं
उम्र के ढलान पर

गोबर
वही गोबर
जो गाय देती हैं
नाक सिकोड़ कर
निकल जाते हैं हम
उठा कर अपने पैर
नज़र चुराते बच्चों की तरह
लांघ कर

सदियों
से
प्रवृत्ति रही है
मुझे उठा कर
अलग
रख दिए जाने की
खेतों में दबा दिए जाने की
सड़ कर
उपयोगी बन जाने की
अजीब सी खूबी है
है मुझमें

पवित्र भी माना गया है मुझे
लीपा गया है मुझसे
आँगन घर
दालान
पूजा घर
लेकिन तभी तक
जब तक कि
नहीं चढ़ा है
प्लास्टर पत्थर का
घर और आँखों पर

इन दिनों
बहुत बदलाव आ रहा है
बाजार जो आ गया है
इसके आने से
प्रतिष्टित हो गया हूँ मैं,
हो गया हूँ
पर्यावरण मैत्रीय
और प्रीमियम भी

वही पवित्र किन्तु बदबूदार गोबर
हो गया हूँ
'आर्गेनिक '

ए़क विचलित कर देने वाली
सम्वेदना गई है
मेरे प्रति
'ओल्ड एज होम ' में रहने वाले
माता पिता की तरह
गोबर जो हूं मैं

रविवार

अलसाई सुबह
नरम धूप
मोटा सा अखबार
ख़बरों पर चाय

और
इन सब के बीच
तुम्हारी हंसी
खनकती
चाय के प्याले में,
फुसफुसाती
अखबार के पन्नो में ,
गुनगुनाती
धूप के साथ



रविवार का होना
इस तरह
ए़क अनुभव है
तुम्हें जीने का
हर हफ्ते ।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

सीढियां

देखा है
कभी सीढ़ियों को
जीवन सी लगती हैं
धरती पर रख कर पाँव
आसमान की ओर बढती हैं

बहुत अनुशासित होते हैं
सीढ़ियों के कदम
नपे तुले

दृढ होते हैं
सीढियों के भाव
और पता होता है
उन्हें अपना लक्ष्य

सीढियां
कभी थकती नहीं
चाहती हैं
मिले तुम्हें
मंजिल

धैर्य का
दूसरा नाम होती हैं
सीढियां
जो मंजिल तक तो
पहुचाती हैं
लेकिन
हिस्सा नहीं बन पाती
मंजिल तक पहुँचने की ख़ुशी का

सीढ़ियों की पीठ पर
चढ़ कर
पहुँच जाते हैं लोग
कहाँ से कहाँ
और नहीं मालूम उन्हें
उनका अपना महत्व

बिल्कुल
तुम्हारी तरह

भले ही छू लिया हो
तुमने आसमान
धरती से टिके हैं
तुम्हावे पाँव
सितारे भरे हैं
झोली में
लेकिन
अभिमान का
कोई पुच्छल तारा
नहीं दिखा
तुम्हारे वहां

वटवृक्ष सा
भावों को आश्रय देती हो तुम
किन्तु
दर्प का कोई धूप
नहीं आया
तुम्हारी आँचल की छाँव से

ए़क सीढी
मेरे लिए भी
गढ़ दो कि
छू लू
मैं भी
थोडा आसमान
कर दो निर्धारित
उसका लक्ष्य
जो जाता हो
तुम तक

शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

चिड़िया, आकाश और प्रायश्चित

ए़क चिड़िया को
आकाश में उड़ते देखा
सूरज की ढलती नारंगी में
आसमान को चुनौती देते उसके पंख
सुनहरे लग रहे थे


चिड़िया भी
क्षितिज को चूमती
प्रिय लग रही थी

मैंने
चिड़िया को दिखाया
और भी सुंदर आसमान
चिड़िया हंसने लगी थी


मैंने कहा
देखो चिड़िया
तुम्हारी आँखों में हैं सपने
सच करना है
तुम्हे
चिड़िया ने फडफडाए अपने पंख
ख़ुशी में
छूने को आकाश और भी ऊँचे


चिड़िया
उड़ने लगी
मैंने कहा
थोड़ी देर बैठो मेरे पास
चिड़िया
बैठ गयी
मैंने कहा
तुम्हारा बैठना
अच्छा लगता है
हंस कर चिड़िया ने कहा
लेकिन मेरी उड़ान !


मैंने शब्दों का
ए़क जाल बुना
कहा देखो कितना सुंदर है
चिड़िया को भी
अच्छा लगा
शब्दों का जाल
चिड़िया के पंख
अब आसमान को नहीं माप रहे थे
शब्दों में रह गए थे
उलझ कर


चिड़िया
ऊब गयी थी अब
भूलती जा रही थी उड़ना
चिड़िया ने कहा
मुझे उड़ने दो
मुझे फ़ैलाने दो अपने पंख
मुझे दो मेरा आकाश


तोड़ दिया उसने
शब्दों का जाल
चिड़िया खुश थी
चिड़िया उड़ रही थी


टूटे हुए शब्द
अब कांटे से लग रहे थे
लग रहा था मुझे भी
देना था मुझे आकाश
फिर क्यों दिया
मैंने जाल शब्दों का
होने को कैद


टूटे हुए शब्द
जोड़ रहा था
मैं
बनाने को ए़क स्मृति चिन्ह
चिड़िया की मधुर स्मृति में
चिड़िया जब भी
इधर से गुजरती
देखती मुझे
मेरे शब्दों को
स्मृतियों को
ए़क पल रूकती
डर जाती
फिर उड़ जाती
आसमान में फैला कर अपने पंख
चिड़िया नहीं जानती स्मृति क्या होती है
उसे उड़ना पसंद है
उड़ान ही उसका स्वप्न है
उड़ान ही उसका लक्ष्य है
फिर क्यों ये ठहराव

चिड़िया उड़ना
थक जाने तक
लेकिन
जरुर आना ए़क बार
मेरे ह्रदय में
तुम्हारा घोंसला
खाली रहेगा
चिरंतन तक
ताकि कर सकू मैं
शब्दों के जाल बुनने का
प्रायश्चित

बुधवार, 8 सितंबर 2010

गीला है मन का आँगन

झीनी झीनी बूंदे
स्वागत में
खडी की मैंने
और आया
तुम्हे लेने कि
चलो तुम
मेरे मन के
आँगन

तुमने पूछा
क्या करोगे ले जाकर
अपने मन के आँगन

मैंने कहा
गीला है मन का आँगन
वहां
आगे आगे
तुम चलना
और गीली मिटटी पर बने
तुम्हारे पैरों के निशान पर
रख कर चलूँगा मैं
अपने पैर
मानो साथ साथ चले हो हम
होने देना यह भ्रम
आखिरी बार

फिर
तुम प्रवेश करना
पूजा घर में
जहाँ पसार देना
अपना आँचल और
उठा लेना
भगवती की अचरी से
ए़क लाल फूल
माथे से लगा लेना उसे
और फिर
लौट आना

विश्वास करो
कभी कम नहीं होगी
तुम्हारी मांग की लाली
तुम्हारा दर्प का सुर्ख लाल रंग
तुम्हारे मन का रंग भी
नहीं होगा कभी धूमिल

हाँ
ए़क बात करना
वो लाल फूल
रख लेना
उसी डिबिया में
जो दी थी मैंने
अपनी पहली मुलाकात में

देखो
झीनी झीनी बूंदे
लगी हैं बरसने
न जाने किसने
खबर दी हैं उन्हें
मेरे मन की .

साक्षर कर दो

अक्षर
मिलकर
बनाते हैं
शब्द,

जबकि
नहीं होता
अक्षरों का
अपना कोई अर्थ
लेकिन
मिलकर देते हैं
शब्द को
अर्थ
आयाम
अभिव्यक्ति

जानने के लिए
शब्दों के अर्थ
आवश्यक नहीं होता है
अक्षर ज्ञान
कुछ अनुभव जन्य होते हैं
कुछ तो बस
महसूस भर किये जाते हैं

साक्षर
हो रहा है देश
पर कहाँ हो रहा है
स्वर मुखर उस अनुपात में
खो रहे हैं
शब्दों से सन्दर्भ
जितना बढ़ रहा है
हमारा अक्षर ज्ञान

दूसरी ओर
बिना उच्चारित किये
सब कुछ कह जाती हो तुम,
लिखने के बाद भी बहुत कुछ
अधूरी रह जाती है
मेरे मन की बात

बस
ढाई आखर का
देकर ज्ञान
थोडा मुझे भी
साक्षर कर दो !

सोमवार, 6 सितंबर 2010

मन्नत

माँ ने
माँगी थी
ए़क मन्नत,
हुआ मेरा
इस खूबसूरत दुनिया से
परिचय

उसी की मन्नतों ने
शायद
बचाया मुझे
चेचक, हैजे
और ना जाने किन किन
रोग व्याधियों
और कुपोषण से

कहीं भी
आँचल पसार लेती थी
किसी से भी
मांग लेती थी
दुआ
माँ जो थी
वह

ए़क मन्नत
मांगी थी
पिता ने ,
हुआ मेरा
एस खूबसूरत दुनिया से
साक्षात्कार

शायद
उन्हीं की मन्नतों से
नदी
पहाड़
रेगिस्तान
सागर पार करने का
आया हौसला

अंतिम सांस तक
ना नहीं कहने वाली
हिम्मत की
मन्नत मांगी थी
उन्होंने

पेड़
पौधे
मंदिर
मजार
कहीं भी
गमछा बिछा
मांग लेते थे
मेरे लिए
थोड़ी उम्र
थोड़ा बल
थोड़ा हौसला
और
थोड़ी आदमियत

ए़क मन्नत
मांग रही तो
तुम
इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में
बनाने को मेरी
नयी पहचान
भीड़ से
करने को अलग
ए़क चेहरा
ए़क व्यक्तित्व
ए़क मानव
ए़क पुरुष
अपने मन जैसा

तुम भी
कहीं भी
फैला लेती हो
दुपट्टा
सूरज
चाँद
मंदिर
मस्जिद
गुरुद्वारा
यहाँ तक कि
तुलसी के आगे भी
बिल्कुल
माँ की तरह सौम्य हो
पिता की तरह दृढ हो

कहो ना
क्या नाम दूं
तुम्हें !

शनिवार, 4 सितंबर 2010

फेल हो गए मेरे पहले शिक्षक

बाबूजी
आप थे पहले शिक्षक
आपने ही
परिचय कराया था
अक्षरों से
संस्कारों से
सभ्यता से
मिटटी से
खेत से
खलिहान से
और
अखबार से

लेकिन
दुःख है मुझे
बाबूजी, मेरे पहले शिक्षक
फेल हो गए हैं आप

आपको
याद हो या ना हो याद
मुझे याद है
आपने ही लगवाया था
अखबार
जो पहुचता था दो दिन बासी होकर
और
बांचते थे आप उसे
बंचवाते थे हम से भी
बहुत बड़े सपने पाल रखे थे
हमारे लिए
लेकिन
कहाँ खरे उतर पाए हम

बाबूजी,
मेरे पहले शिक्षक
फेल हो गए आप

समय के साथ
चलने को कहा था आपने
नहीं पता था आपको
दिशा इसकी उल्टी हो जायेगी
बाजार से
कहा था दूर रहने को
कहाँ पता था आपको भी कि
घर के भीतर
गुसलखाने में
रसोई में
घुस जाएगा बाजार
और
ऐसे में नहीं बचा पाया मैं
खुद को बाजार से
कठपुतली सा बन
बहुत सफल लिख रहा हूँ
और
विडंबना देखिये कि
मेरी सफलता के साथ ही
फेल हो गए आप
बाबूजी, मेरे पहले शिक्षक

जो धरती
आपके कंधे से चढ़ कर देखी थी
ना जाने कहाँ खो गई है,
जीवन का गणित
जो सिखाया था आपने
उसका उत्तर
अब मेल नहीं खाता ,
आपका बताया हुआ
इतिहास
अब बेमानी हो गया है ,
देश-दुनिया और समाज के
लिखे, अनलिखे संविधान में
हो गए हैं कई कई संशोधन
और
किसी मूल्य की बात करते थे आप
ना जाने कहाँ छूट गए हैं
जैसे आपका हाथ

हाथ के छूटने के साथ
फेल हो गए हैं आप
बाबूजी, मेरे पहले शिक्षक

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

२१ वी सदी में प्यार का इजहार


तुमने जो
एन्टर किया
मेरे ह्रदय में
शिफ्ट हो गए
मेरे भाव
और
कण्ट्रोल खो दिया
मैंने
स्वयं पर से


जब से
तुमने
इन्सर्ट किया है
प्रेम
मेरे दिल में ,
डिलीट हो गए हैं
सभी अवसाद


अब
"होम" हो गया है
तुम्हारा दिल
और
जीवन के
सभी रास्ते
तुम तक पहुँच के ही
"एंड" होते हैं


ए़क बार जो
कैप्स लाक कर लिया
तुम्हे
मैंने अपने दिल में
नहीं काम करता कोई
बैक स्पेस


हमारे तुम्हारे बीच
ना हो कभी कोई
स्पेसबार
ना हो कोई
एस्केप बार
कोई टैब भी ना करे काम
और
स्क्रोल लाक हो जाएँ
हम और तुम
सदा के लिए

बुधवार, 1 सितंबर 2010

कृष्ण कैसा यह विलाप

कृष्ण
पुरुषोत्तम नहीं थे
तुम
तभी तुमने
दिखाया
सत्य के परे भी
है अस्तित्व
सत्य से च्युत हो भी
संभव है विजय

सजा है
फिर से वही दरबार
नगर नगर
द्रौपदियां सहज हो
स्वीकार कर रही हैं
दुर्योधन का प्रस्ताव
शकुनि हो गया है
बहुराष्ट्रीय

फिर
कैसा यह विलाप
आज जब
नए महाभारत के लिए
तैयार है
कुरुक्षेत्र
अर्जुन
नहीं है द्वन्द में
भीष्म को
नहीं है कोई प्रायश्चित
कौरवों की ओर होने का
और स्वयं तुमने
बदल लिया है पाला
दुर्योधन की ओर से
खड़े हो तुम

सब कुछ
बदल गया
कृष्ण
लेकिन
नहीं बदली राधा
प्रभावित
नहीं कर पाया उसे
तुम्हारा बीज मंत्र
"कर्मण्ये वा..."
उसे अब भी
इच्छा है
फल की

सुखद हरा रंग

पत्तों पर
कभी देखा है
धूप को टिकते हुए..
पत्तों का रंग
कितना सुखद हरा
होता है ।

ये हरीतिमा
प्रतीक है
जीवन की
सुख और
शांति की
वैभव और
समृद्धि की ।

हरियाली लाती है
सन्देश
भरपूर है चराचर
और अपनी सृष्टि
साँसे ले रही
तरुणाई
हो रही
पतझड़ की भरपाई ।

इसी हरे रंग में
समाई है
जीवन की उर्जा
ऊष्मा और
इसमें ही
रमी
रिश्तों की नमी ।

कभी देखना
मेरा चेहरा भी
तुम्हारी आभा से
कैसे खिल जाता है
और हो जाता है
सुखद हरे रंग जैसा ।

वही हरा रंग
जो ओढती हो तुम
पहनती हो
वही हरा रंग
जो जीवंत है
तुममें ।

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...