शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

आग

तुम्हे सोचते हुए 
मुझे याद आती है 
आग 
जो पकाती है रोटी, 
सुलगाती है बोरसी 
और 
अकेले होती है 
बुझ जाने के बाद 

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

कच्ची सड़क

कच्ची सड़को को छोड़ 
जब चढ़ता हूँ 
पक्की सड़क पर 
पीछे छूट जाती है 
मेरी पहचान 
मेरी भाषा 
मेरा स्वाभिमान ! 

कच्ची सड़क में बसी 
मिटटी की गंध से 
परिचय है वर्षो का 
कंक्रीट की गंध 
बासी लगती है 
और अपरिचित भी 

अपरिचितों के देश में 
व्यर्थ मेरा श्रम 
व्यर्थ मेरा उद्देश्य 
लौट लौट आता हूँ मैं हर बार 
पीठ पर लिए चाबुक के निशान 
मनाने ईद , तीज , त्यौहार 

कहाँ मैं स्वतंत्र 
मैं हूँ अब भी गुलाम 
जो मुझे छोड़नी पड़ती हैं 
कच्ची सड़क !




मंगलवार, 26 अगस्त 2014

औसत बारिश



मेरे गाँव में 
बारिश नहीं हुई 
जब रोपनी हो रही थी 
धान की 

फिर आया 
भीषण बाढ़ 
मेरे गाँव में 
और बह गया 
रहा-सहा धान 

तब भी बारिश नहीं हुई 
जब फूटना था 
बाढ़ से बचे हुए धानों को 

जैसे तैसे धान फूटे 
और कटनी के समय 
बादल बरसा खूब 
मेरे गाँव में 

इण्डिया गेट पर तब 
नहाये खूब बच्चे 
भीगे रूमानी मौसम में खूब जोड़े 
अखबारों ने छापे 
हरे भरे, साफ़ सुथरे वृक्षों के चित्र 
जब माथे पर हाथ धरे 
रो रहे थे मेरे गाँव के किसान 
मौसम विभाग ने बुलाकर प्रेस कांफ्रेंस कहा 
इस साल भी हुई औसत बारिश 

मेरा खलिहान रहा खाली 
जिसका जिक्र नहीं होगा 
किसी रिपोर्ट में ! 

रविवार, 24 अगस्त 2014

बर्गर, बगोदर और ब्रह्मपुत्र



राजधानी के मेट्रो रेल के 
वातानुकूलित स्टेशन पर 
देर रात लौटते हुए 
किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के 
मझौले स्तर का कामगार 
कर रहा होता है चर्चा अपने सहयोगी से
बेमौसम बारिश में 
ठंढ के लौटने की 
खाते हुए बर्गर 
ठीक उसी समय मेरे गाँव में एक किसान 
कोस रहा होता है बेमौसम बारिश को 
जिसने तोड़ दी हैं गेंहूं की पकी हुआ बालियां 
और ब्रह्मपुत्र घाटी से आई हुई एक  लड़की 
खो देती है अपनी अस्मिता 
इसी शहर के रौशनी भरे  सड़को के अँधेरे में  

यह समय रहा होगा 
जब पुलिस के छापे में 
पकड़ा गया एक नौजवान 
जिसकी धसी हुई आँखे लाल लाल थी 
बगोदर (झारखंड का एक शहर) में 
चुराते हुए कोयला 
उसके पास बरामद हुआ था 
एक थैले में देशी शराब 
जो वह कोयला डिपो के कर्मचारी को देता था 
घूस के तौर पर 
उस पर लगा दी गई हैं कई गैर जमानती धाराएं 

उसी समय एक मजदूर कुचला जाता है 
एक महँगी गाड़े से 
जो लौट रहा होता है अपने घर 
चौदह घंटे की नौकरी के बाद 
टूटी हुई साइकिल पर 
तोड़ देता है वह दम 
सरकारी अस्पताल के गेट पर 
शिनाख्त नहीं हो पाती है 
उस मजदूर की .   

खाते हुए बर्गर वही  युवक 
कर रहा होता है ट्वीट अपनी चिंताएं
मौसम के बारे में, 
लड़कियों की सुरक्षा के बारे में 
गरियाते हुए नक्सलियों को
तबतक डाउनलोड हो चुका होता है उसके स्मार्ट फोन पर 
एक और ट्रिपल एक्स फिल्म  

उसके भूगोल में नहीं है बगोदर या ब्रह्मपुत्र 
वह जानता है शहर के तमाम बर्गर आउटलेट्स ! 

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...