मंगलवार, 27 सितंबर 2011

जनता दरबार और खाली कुर्सियां



प्रदेश के मुख्यमंत्री का
विसर्जित जनता दरबार,
अब, खाली ये कुर्सियां
रात को शांत पड़ीं
जैसे थक कर सोया हो
एक्के का घोडा,
स्टेशन का कुली
या दिहाड़ी मजदूर,
सो रही हैं
ये खाली कुर्सियां
जनता दरबार में।

समेट कर रख दी गई हैं
कुर्सियाँ, एक ओर,
कभी-कभी
एक के ऊपर एक तक
क्योंकि
बुहारा जायेगा परिसर,
बहुत सी गुहारें
और किए गए वायदों का कचरा।

इन्हीं कुर्सियों में से
कुछ एक पर
दिन भर बैठी थी
बेकारीबेगारी,
विनती कर रही थी -
नहीं मिली है वर्षों से
कीमत वाजिब -
पसीने  की,
दिलवा दी जाय।.

इस बार भी सुनी गई
माननीय द्वारा
गुहार
पहले की तरह,
खाली कुर्सियाँ गवाह हैं।

एक खाली कुर्सी पर
बैठी थी कुँवारी अस्मिता
जिससे खेला गया कई बार
वालीबाल की तरह
कभी खेतों में,
फैक्ट्रियों में,
थानों में अक्सर,
कभी मंत्री जी के घर
पीछे वाले कमरे में।

उसकी भी बात
सुन ली मंत्री ने,
कैमरे को देखकर
प्रकट की संवेदना, और
कंधे पर रख हाथ
आश्वश्त किया,
पहले की तरह, बस,
रोई थी कुर्सी पहले पहल,
पर, अभ्यस्त हो गई है
उस रुदन से,
भावना में नहीं बहती, अब।

एक कुर्सी
पहली बार आई है
दरबार में,
दिन भर बैठी रही
नीति उस पर
ठूँठ की तरह
बताती रही अड़चनें,
अनुपालन की कठिनाइयाँ,
नीति की व्यथा-कथा !
उद्वेलित यह कुर्सी नई
सोई नहीं रात भर,
कस गईं मुट्ठियाँ
उठ रहे मन में
क्रांति के ज्वार।

पुरानी कुर्सियाँ
हँस रही हैं इस नई कुर्सी पर।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2011

स्टॉक एक्सचेंज बताते है देश का मिजाज

(काफी दिनों से कुछ नया लिख नहीं सका हूं. इण्डिया गेट से सर्किल में एक कारवाले ने मेरी बाइक को टक्कर मार कर बिना रुके चला गया. मैं उन्हें धन्यवाद भी ना कर सका क्योंकि टक्कर जबरदस्त थी किन्तु मुझे उस हिसाब से कम चोट लगी. अब ठीक हो रहा हूं. इस बीच चढ़ते-उतरते स्टाक एक्सचेंज के बीच अपनी एक पुरानी कविता की याद आ गई. जिस तरह यूरोज़ोन  में समस्या से प्रभावित हुआ है अपना स्कोक एक्सचेंज ,लग रहा है आज भी  यह कविता प्रासंगिक है. )

स्टॉक एक्सचेंज बताते है देश का मिजाज

अब
जरुरत तय नही करतेमूल्य जिंसों का
स्टॉक एक्सचेंज के हाथ में
है रिमोट जिंदगी का 


मानसून  प्रभवित नही करते
अर्थ व्यवस्था
किसानों व कामगारों की थाली से
नही मापी जाती है भूख 


चढते स्टॉक एक्सचेंज
लुढ़कते स्टॉक एक्सचेंज
बताते हैं देश का मिजाज

बाढ़ में डूबे खेत
सूखे खलिहान
दंगों
भूखमरी
कुपोषित माँ और उनके बच्चे
बेरोजगार युवा कन्धों को
इन में शामिल नही किया जाता 


एस एम एस से तय होता है
बाज़ार का रूख
और अखबार कहते हैं
जींस में तेजी है
मूल्य स्थिर हैं
नही सो रहा है
कोई भूखा 



दुनिया के अलग अलग 
समय ज़ोन में होती हलचल से 
हो जाती है हमारी
निर्भरता की परीक्षा 

असफल हो जाते हैं हम
हिल जाती हैं नींव अपनी
स्थायित्व के दावे
और उजागर हो जाता है
उधार की रेत पर खड़ी
इमारत का सच


गिरवी लगता है
स्टोक एक्सचेंज,
इसकी संवेदनाएं
समय के इस ज़ोन में

बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी : कुछ क्षणिकाएं


रौशनी जहाँ 
पहुंची नहीं 
वहां की आवाज़ हो 
भाषा से
कुछ अधिक हो 
तुम हिंदी


खेत खलिहान में
जो गुनगुनाती हैं फसलें
पोखरों में जो नहाती हैं भैसें
ऐसे जीवन का 
तुम संगीत हो 
भाषा से
कुछ अधिक हो 
तुम हिंदी


बहरी जब
हो जाती है सत्ता
उसे जगाने का तुम
मूल मंत्र हो
भाषा से 
कुछ अधिक हो
तुम हिंदी. 

बिना कहे भी 
कुछ समझाना हो
सुनना और सुनना हो 
सम्प्रेषण का 
सशक्त माध्यम हो 
भाषा से 
कुछ अधिक हो 
तुम हिंदी. 

अधरों से 
बहती हो सरल 
कानों में 
घुलती हो सरस 
मन से बांधे मन 
सम्मोहन का सुन्दर पाश हो 
भाषा से 
कुछ अधिक हो  
तुम हिंदी.  

सोमवार, 5 सितंबर 2011

शिक्षक : कुछ क्षणिकाएं

१.
आपने
पढाया तो था
'प' से प्यार
न जाने
कब कैसे
बन गया
'प' से पैसा


मोटे चश्मे में
आपकी छवि
आदर्श बन न सकी
बदल लीजिये 
अब तो इसे


हे मेरे प्रथम शिक्षक !
आपका योगदान
वैसे ही अप्रत्यक्ष रहेगा
जैसे गगनचुम्बी ईमारत के नीचे दबी
नींव की ईंट

४.
एक दिन
याद करने की
परंपरा चल पडी है
आपको ही  नहीं
माता पिता
भाई बहन
मित्र सबको,
धन्यवाद कीजिये कि
भुलाये नहीं गए हैं आप

शनिवार, 3 सितंबर 2011

एक अस्पष्ट कोलाज़ मैं


मैं
चला  जा रहा हूं
लक्ष्य
निर्धारित नहीं
दिशा नहीं ज्ञात
माध्यम भी अज्ञात
फिर भी
चला जा रहा हूं

बहुत शोर हो रहा है
किसका है शोर
क्यों है शोर
शोर का क्या है उद्देश्य
किसी को कुछ नहीं पता
सब निरुद्देश्य
इस शोर को 
अपने कंधे पर लादे
चला जा रहा हूँ मैं

बहुत रौशनी है
इस रास्ते पर
इतनी चकाचौंध
स्पष्ट कुछ दिखाई नहीं दे रहा
सबके चेहरे एक से हैं
कोई फर्क नहीं दिख रहा
एक दूसरे में
बीच बीच में
प्रकाश का एक विस्फोट सा होता है
और अट्टाहस करते हैं ये चेहरे
और दौड़ पड़ते हैं इसी रास्ते पर
एक दिशा में

थोडा आगे बढ़ा हूँ मैं
तो देख रहा हूं
एक ढलान है
बहुत तेज़
और उतर गया हूँ मैं
बिना गुरुत्वाकर्षण के
बिना घर्षण के
मैं गिरा  जा रहा हूं
जितना नीचे जा रहा हूं
शोर उतना ही अधिक हो रहा है
रौशनी उतनी ही तीक्ष्ण  हो रही है
और उतनी ही तेज़ी से ख़त्म हो रही है
मेरे सोचने समझने की शक्ति

मैं गिर रहा हूँ
यह रास्ता अंतहीन है
दिशाहीन है
इसके आकर्षण के आगे
कोई गुरुत्व नहीं करता है काम
मैं गिर रहा हूं
हो गया है फिर एक
रौशनी का विस्फोट
मैं अब इसी शोर का 
हो गया हूं हिस्सा 

एक अस्पष्ट कोलाज़
हो गया हूँ मैं

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...