शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2020

जंगली परिजात* लुईस ग्लूक

 वर्ष 2020 में साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत कवयित्री लुईस ग्लूक की प्रसिद्ध  कविता "The Wild Iris" का अनुवाद ।   


जंगली परिजात* 

लुईस ग्लूक  
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जहाँ ख़त्म होते थे मेरे दुःख 
उसके आगे था एक दरवाजा 

तुम्हे बता दूँ कि  जिसे तुम मृत्यु कहते हो 
उसे मैं सदैव याद रखती हूँ ।  

बाहर का अनन्य शोर , देवदार की झूलती शाखाएं 
निढाल ढलता सूरज समा रहा है 
बंजर धरती के आगोश में । 

ऐसे मे बचे रहना चुनौतीपूर्ण है 
क्योंकि दफन हो रही हैं  संवेदनाएं 
धीरे धीरे धरती के अंधेरी कोख में । 

अचानक झुक रही है पृथ्वी एक ओर
भय से आत्मा सन्न है 
असमर्थ है बोलने से 
और खत्म हो रहा है सब कुछ 
जैसे खतरे में है झाड़ियों में रहने वाली चिड़िया । 

आप जैसे लोग 
जिन्हें याद नहीं इस दुनिया की यात्रा 
उन्हें बताना चाहती हूँ कि
उठा सकती हूँ मैं अपनी आवाज़ फिर से 
विस्मरण से जागने वालों की 
आवाज़ हूँ मैं । 

मेरे भीतर से निकलती है 
एक विशाल नदी
गहरे नीले समुद्र के वितान पर 
छाया हुआ नीला आसमान 
बसता है मेरे  भीतर  । 

- अनुवाद : अरुण चंद्र रॉय 
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*एक प्रकार का नीला फूल । 

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

बच्चे जो डूब गए - लूइस ग्लूक

वर्ष 2020 में साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार से पुरस्कृत कवयित्री लुईस ग्लूक की प्रसिद्ध  कविता "The Drowned Children" का अनुवाद । 



बच्चे जो डूब गए 
- लूइस ग्लूक 


 जब उनके पक्ष में 
नहीं है कोई निर्णय 
फिर बेहतर है  उनका डूब जाना ही।  

चलिए, भीषण सर्दी में सबसे  पहले 
उन्हें बर्फ के भीतर डुबोते हैं 
उनके पूरी तरह मर जाने के बाद 
जब शरीर पानी से ऊपर उठकर तैरेगा 
साथ में तैरेंगे उनके ऊनी स्कार्फ 
बर्फ से भरे तालाब ले लेगा उन्हें 
अपने असंख्य अँधेरे बाहों के गहन आगोश में।  

किन्तु उन बच्चों  को मौत आनी चाहिए
कुछ अलग तरह से  
जीवन के शुरू होने के बाद जल्दी ही  
हालांकि वे हमेशा से ही रहे हैं 
रतौंधी के शिकार और कम  वज़न वाले, कुपोषित।  
अतः बाकी सब स्वप्न है कि 
उनके मृत शरीर को नसीब हो 
रौशनी, और श्वेत धवल कफ़न
जैसे सजा होता है मेजपोश।  

सर्द तालाब में 
धीरे धीरे डूबते हुए उन्हें सुनाई देती है 
माता पिता की आद्र  पुकार - 
"क्या कर रहे हो वहां, किसका इन्तजार कर रहे हो !!
आ जाओ घर, घर आ जाओ,लौट आओ !!
और धीरे धीरे वे डूब जाते हैं गहरे नीले पानी में 
हमेशा के लिए। 

(अनुवाद : अरुण चंद्र राय ) 


मूल कविता 
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The Drowned Children

You see, they have no judgment.
So it is natural that they should drown,
first the ice taking them in
and then, all winter, their wool scarves
floating behind them as they sink
until at last they are quiet.
And the pond lifts them in its manifold dark arms.

But death must come to them differently,
so close to the beginning.
As though they had always been
blind and weightless. Therefore
the rest is dreamed, the lamp,
the good white cloth that covered the table,
their bodies.

And yet they hear the names they used
like lures slipping over the pond:
What are you waiting for
come home, come home, lost
in the waters, blue and permanent.

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गुरुवार, 20 अगस्त 2020

दुविधा

 मतदाता 

दुविधा में हैं कि 

किसके पक्ष में प्रकट करे 

अपना  मत 

एक तरफ रोटी छोटी हो गई है 

दूसरी तरफ रोज़गार गया है छिन

गांव उसका दह गया है बाढ़ में 

तो भाई शहर में बेकारी झेल रहा है 

वह किसके लिए दे अपना मत . 


जिसे वह देता है मत 

वही चढ़ कर कुर्सी पर भूल जाता है 

किये गए वायदे 

बिजली पानी, स्कूल, किताब , चूल्हा - चौका 

काम , धंधा पानी , दवाई 

सब रह जाती हैं बहस भर की बाते 

बाद में चर्चा में होता है 

सीमा पर युद्ध, 

युद्ध का भय 

फ़िल्मी सितारों की बातें 

खिलाडियों की कमाई 


वह दुविधा में है कि 

वह किस आधार पर तय करे अपना मत 

भाषणों पर या झंडे के रंग पर 

अपनी जाति के नाम पर या 

दंगे या युद्ध के भय के नाम पर 

या उन्माद पर . 

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

राम

1.
तलुवे में 
चुभने पर कांटा 
अनायास ही 
मुंह से निकलने वाले राम को
नहीं जरूरत किसी मंदिर की 
किसी भव्यता की । 

2.
थककर चूर होने के बाद
जब खाने का पहला निवाला
पहुंचता है पेट में 
तृप्ति का वह भाव 
पर्याय है राम का 
लेकिन ऐसे राम को रहने के लिए
जरूरत नहीं किसी मंदिर के गर्भगृह की। 

3.
जो नाम 
भरता हो जोश
देता हो ऊर्जा
प्रकट करे आश्चर्य या दुख ही
किसी भी परिस्थिति में
कहीं भी किसी भी तरह
उपयुक्त लगे
ऐसे राम रहते हैं मानस  के हृदय में 
इन्हे जरूरत नहीं किसी पताके की। 

रविवार, 2 अगस्त 2020

मित्रता

1.
उजाले की मित्रता दिखती है वह परछाई की तरह कराता रहता है अपने होने का एहसास हर क्षण ।

2. अंधेरे की मित्रता बसा रहता है भीतर बिना की नाम के
बिना किसी आकर के कभी देखी है परछाई अंधेरे में।

3.
अपेक्षाएं
आकांक्षाएं
मित्रता की हैं शर्तें
अनकही
अलिखित। ---- - अरुण चन्द्र रॉय