रविवार, 16 फ़रवरी 2020

बसंत

1. 


खिले हुए फूल 
धीरे धीरे मुरझा जायेंगे 
इनके चटक रंग 
उदासी में बदल जायेंगे 
बसंत की नियति है 
पतझड़
फिर भी बसंत लौटता है 
अगले बरस . 

2.

आम पर 
जब लगती हैं 
मंजरियाँ 
उन्हें मालूम होता है 
कुछ ही मुकम्मल हो पाएंगी 
अधिकाँश झड जायेंगी 
अपरिपक्व 
फिर भी मंजरियाँ महकती हैं 
हवाओं में . 


3. 
वह जो सुबह सवेरे 
साइकिल पर अखबार लादे 
तीसरी चौथी मंजिल तक फेंकता है अखबार
उसपर कहाँ असर होता है 
बसंत की मादक हवाओं का 
उसे फूलों पर मंडराते भौरे नहीं दीखते 
उसके लिए बसंत
ग्रीष्म, शरद या शिशिर से भिन्न नहीं 
कोई खबर भी नहीं 
फिर भी वह
गुनगुनाता है प्रेम गीत. 

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गुरुवार, 19 सितंबर 2019

प्रसिद्द तिब्बती कवि तेनजिंग चेंडू की एक कविता का अनुवाद


विश्वासघात
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- तेनजिंग चेंडू


मेरे पिता मर गए
बचाते हुए हमारा घर,
हमारे गाँव, हमारा देश
लड़ना चाहता था
मैं भी
किन्तु हम हैं बौद्ध
दुनिया कहती है
हमें होना चाहिए
शांतिपूर्ण और अहिंसक
इसलिए मैंने अपने दुश्मनों को
कर दिया है क्षमा .
किन्तु कई बार मुझे लगता है
मैं ने अपने पिता के साथ किया है
विश्वासघात।
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अंग्रेजी से अनुवाद : अरुण चन्द्र रॉय

बुधवार, 18 सितंबर 2019

प्रसिद्द तिब्बती कवि तेनजिंग चेंडू की एक कविता - रिफ्यूजी- का अनुवाद .


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रिफ्यूजी
- तेन्ज़िन चेंडू

सड़क के किनारे
बर्फ में धंसे टेंट में
जब मैं पैदा हुआ था
मेरी मां ने कहा-
तुम शरणार्थी हो !
तुम्हारे माथे पर
दोनों भौंहों के बीच
लिखा है "आर" -
कहा था शरणार्थी शिविर में
एक शिक्षक ने !
मैंने कोशिश की
रगड़-रगड़ कर
इस चिन्ह को मिटाने की
मेरा माथा छिल कर लाल हो गया
किन्तु यह दाग मिटा नहीं
मैं शरणार्थी पैदा हुआ हूं
मेरी तीन जीभें हैं,
उनमे से एक जीभ
अब भी गाती है
अपनी मातृभाषा में ।
मेरे माथे पर लिखे "आर" को
अंग्रेजी और हिंदी की जीभ के बीच
तिब्बती जीभ पढ़ती है:
"रंगजन"
जिसका अर्थ होता है - स्वतंत्रता !
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अनुवाद : अरुण चन्द्र रॉय

मंगलवार, 17 सितंबर 2019

एक निर्वासित तिब्बती कवि तेन्ज़िन च़ंडू की कविता "एक्जाइल हाउस" का अनुवाद
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निर्वासन
- तेन्ज़िन च़ंडू

हमारी छतें चूती थीं
और दीवारें कभी भी भहर कर गिर सकती थीं
फिर भी हमें घर जाने की जल्दी होती थी
हम अपने घर के आगे
उगाते थे पपीते
आँगन में मिर्ची
और पीछे बगीचे में नींबू
हमारे मालघर (मवेशियों को रखने वाला घर) की छत्ती पर
लटकती थी लौकियाँ और कद्दू
इन्ही के बीच से कूद कर निकलते थे बछड़े
छत पर लटकती थी फलियां
और अंगूर की लताएं
खिड़कियों से घुस आती थी मनी -प्लांट की लताएं
घर के भीतर
मानो घर को उग आईं हो जड़ें
आज आंगन में बस गए हैं जंगल
अब अपने बच्चों को कैसे बताएं
कहाँ से आये हैं हम ?
कहाँ हैं हमारी जड़ें ?

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अनुवाद : अरुण चन्द्र रॉय

सोमवार, 16 सितंबर 2019

जी



जी जी कहने में 
लगे हैं संतरी 
जी जी कहने में 
लगें हैं मंत्री 
हम ही जो कहने लगे जी जी 
आपको क्यों हुई नाराजगी !

जी जी कहने में 
लगे हैं अखबार 
जी जी कहने में 
लगे हैं पत्रकार 
जी जी की रट में समाचार 
हो गया व्यापार 
हमारा जी जी 
क्यों हो गया व्यभिचार !

जी जी कहने में 
लगे हैं उद्योगपति 
जी जी कहकर 
जुटा रहे अकूत संपत्ति 
जी जी जो न करे 
उसकी है अधोगति 
फिर हमारी जी जी से 
आपको क्यों लगा मारी गई मेरी मति 

जी जी !