शुक्रवार, 24 मई 2019

जनता की आकांक्षा को समझने में असफल रहे राजनीतिक दल

जनता की आकांक्षा को समझने में असफल रहे राजनीतिक दल
- अरुण चन्द्र रॉय 

पंडित नेहरू के बाद नरेन्द्र मोदी दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार दो बार अपने दल को लोकसभा चुनाव में जिताया है।  जब देश के लगभग सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर भाजपा का विरोध कर रही हो ऐसे समय में चुनाव के जो नतीजे आयें हैं वह चौकाने वाला आया है।  लेकिन यह चौकाने से अधिक राजनीतिक दलों को सीख देने वाला नतीजा है क्योंकि इस तरह के नतीजे केवल तभी आते हैं जब जातिगत समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण के चक्रव्यूह को तोड़कर वोटर वोट करे।  
अभी तक जिस तरह के चुनाव देखते आये थे, राजनीतिक दलों ने वोटरों को जाति और धर्म के आधार पर तौलते थे, वे अपने उम्मीदवार का चुनाव जातिगत समीकरणों और धार्मिक समीकरणों के आधार पर किया करते थे और इस बार भी ऐसा ही हुआ था।  विभिन्न राज्यों में जाति एवं धर्म के आधार पर उम्मीदवारों का चयन किया और गठबंधन का आधार भी यही रहा. किन्तु चुनाव के परिणामों ने यह दिखा दिया कि इतने बड़े लोकतंत्र में जन संवाद करके बिना जाति और धर्म को आधार बना कर बदलाव कर सकती है।  
लोकसभा चुनाव के नतीजो से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि जनता ने अवसरवादी और परिवारवाद के विरुद्ध वोट किया है।  भाजपा को जहाँ संघ से कैडर सहयोग मिल रहा है वहीँ पार्टी ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं से नियमित संवाद बनाए रखा है।  इस चुनाव में पार्टी ने अपने लगभग आधे सांसदों को फिर से चुनाव लड़ने का मौका नहीं दिया जिन्होंने  जनता से संवाद नहीं रखा।  भाजपा के अतिरिक्त जो विपक्षी पार्टियां मैदान में थी वे अदिकांशतः किसी निजी कंपनियों की तरह चलाई जा रही हैं और वर्षों से परिवार का नेतृत्व है जिसमे आम कार्यकर्ताओं के लिए कोई स्थान नहीं।  चुनावी नतीजों ने बता दिया है कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद, वंशवाद और अवसरवाद के लिए कोई स्थान नहीं।  
मुझे लग रहा है  कि राजनीतिक दलों ने जनता के मुद्दों और जनता के आकांक्षाओं को समझने में भूल कर दी।  सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाएँ जो जनता को सीधे सीधे प्रभावित करती हैं, उन योजनाओं की जब विपक्षी दलों द्वारा आलोचना की गई जिसे जनता ने अस्वीकार कर दिया।  स्वच्छता अभियान, जन धन योजनायें, डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, मुद्रा योजना, आर्थिक आधार पर आरक्षण, बुनकरों के लिए योजनायें, प्रधानमन्त्री पेंशन योजना, प्रधानमन्त्री आवास सब्सिडी योजना, आयुष्मान योजना, उज्जवला योजना, घर घर बिजली योजना  आदि  कुछ ऐसी योजनायें थी जिससे बड़ी संख्या में जनता को प्रत्यक्ष लाभ मिला और उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ।  यही सुधार वोट में बदला ऐसा प्रतीत होता है।  जबकि विपक्ष ने अलग अलग मंचो पर इन योजनाओं पर तंज़ ही कसा।  इस तंज का उत्तर जनता ने वोट के माध्यम से प्रकट किया है।  जिस देश में स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी रोज़ी-रोटी, शौचालय, शिक्षा आदि मुद्दे ज्वलंत हों, वहां परिवारवाद और अवसरवाद से ऊपर उठकर नेतृत्व करना होगा और जनता भी यही चाहती है।  

समग्र नेतृत्व और नेतृत्व का एक चेहरा चमत्कार पैदा करता है और भारतीय जनमानस चमत्कार में विश्वास करती है। जनता को  मोदी के नेतृत्व में  चमत्कार करने और समय बदलने का माद्दा दिखा और उसने इसे जाहिर कर दिया।  दूसरी ओर विपक्ष के पास न विचारधारा की एकजुटता हो सकी, न मुद्दों पर राय बनी और न कोई स्पष्ट नीति।  इसके फलस्वरूप कोई एक चेहरा उभर नहीं पाया जिसमे जनता अपना विश्वास दिखा सकी ।  

इन नतीजों ने सत्ताधारी दल को सत्ता में लौटाने के साथ बड़ी चुनौती भी दी है और यह चुनौती है जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की जिसमे युवाओं के पास शिक्षा और रोज़गार के पर्याप्त अवसर हों, बेहतर स्वास्थ्य देखरेख हो और बिना जातीय और धार्मिक भेदभाव के अवसर प्राप्त हों।  यही नई भारत की संकल्पना है , यही नई सरकार का लक्ष्य भी होना चाहिए।  

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मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

घृणा



घृणा से उपजी ऊर्जा से 
पिघला कर इस्पात 
बनती हैं तलवारें, बंदूकें 
बम्ब और बारूदें 
बम वर्षक विमानें 
मरते हैं आदमी 
मरती है आदमीयता 

तुम ऐसा करना 
तुम्हारे भीतर जो हो किसी से घृणा 
उसे शब्दों में देना ढाल 
देखना बनेगी 
दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता 

कवितायेँ नहीं करती 
रक्तरंजित इतिहास 
वे तिनका हो जाती हैं 
जब डूब रही होती हैं मानवता।    

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

चमत्कार देखिये : एक ग़ज़ल

वादों पे वादों की भरमार देखिये 
सिसायत में हो रहे चमत्कार देखिये   

रोटी नहीं सबकी थाली में फिर भी 
वज़ीरे आज़म के माथे अहंकार देखिये 

दे रहे ज़ख्म अब मंदिर औ मस्जिद 
नए नए ईश्वर का अवतार देखिये 

ख़बरों में ढूंढें नहीं मिलेगा आदमी 
किसी भी दिन कोई अखबार देखिये 

ताले जड दिए हैं हमने दरवाजों पर 
सांकल बजा लौट गया इन्तजार देखिये 

सूखे आसमा भी बरसेंगे एक दिन  
गा रहा कहीं कोई मल्हार देखिये 


(बिना तकनीकी ज्ञान और इसके पक्ष को देखते हुए ग़ज़ल की कोशिश) 

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

शुभकामनाओं से भरा बाजार


वे दे रहे हैं शुभकामनाएं
तरह तरह के माध्यमों से
कुछ अखबारों के जरिये
कुछ टेलीविज़न के माधयम से
कुछ सोशल मीडिया के जरिये
कुछ आपके मोबाइल में सदेशों के माध्यम से
और कुछ तो इन सभी माध्यमों से
और तो और सड़कें, रेल, बस, जहाज सब पटे  पटी  हैं
शुभकामनाओं के पोस्टरों, बैनरों, होर्डियों से।


उल्लेखनीय यह है कि
शुभकामनाएं वे दे रहे हैं
जो चूस  रहे हैं खून
उनकी ओर  से भी आ रही हैं शुभकामनाएं
जो तौल रहे हैं जेब
वे कहाँ पीछे हैं शुभकामनाएं देने में
जो बेच रहे हैं मौत !

एक दिन यही होना है कि
छीन लेंगी ये आदमी से उसकी हंसी
हवा को कर देंगी जहरीली
घोंट देंगी दम
नदियों में भर देंगी तेज़ाब
पहाड़ों में बारूद
और आदमी शुभकामनाओं के बोझ के नीचे
मिलेगा दबकर मरा हुआ .



बुधवार, 20 मार्च 2019

ठहरो , फिर मैं भी मना लूं होली



आज भी आया है वह
उठाने मोहल्ले भर का कूड़ा
मिठाइयों के डिब्बे में
ढूंढेगा बचा हुआ कोई टुकड़ा
आशा भर कर मन में
उसकी सुबह भूख से शुरू होती है
भूख पर भी ख़त्म
पहले उसको रंग दूं
भात-रोटी  के रंग से
ठहरो, फिर मैं भी मना लूं होली !

वह मार डाला गया था
पुलिस की हिरासत में
मिली नहीं थी लाश भी
मां रोती रही पीटपीट कर छाती
पत्नी सदमे से रो भी नहीं पाई
पहले ले आता हूँ कोई ऐसा रंग
जो रोती हुई मां को चुप करा दे
ठहरो, फिर मैं भी मना लूं होली !

अभी अभी तो मरा था वह सीमा पर
जब हम सो रहे थे चैन से
और वह तो तब मर था
जब हम सपरिवार देख रहे थे
नई रिलीज़ फिल्म
पहले ले आता हूँ कोई ऐसा रंग
जो उस जवान की दूधमुंही बेटी के लिए गढ़ दे पिता
ठहरो, फिर मैं भी मना लूं होली !


(हर साल सैकड़ो लोग पुलिस की हिरासत में मारे जाते हैं बिना न्याय के , कई बार बिना अपराध के, हर साल हम सैकड़ो जवानों को खो देते हैं सीमाओं पर , सीमाओं के भीतर , कितने ही लोग हमारे आसपास भूखे सोते हैं. इनके लिए त्यौहार के क्या मायने हैं !)