शुक्रवार, 3 मई 2013

 चीन लद्दाख में डेरा जमाये बैठा है. जब रक्षामंत्री प्रधान मंत्री के पास गए होंगे कि सेना को आदेश दीजिये कि चीन के साथ सख्ती दिखाएँ तो उन्होंने वित्त मंत्री से पूछा होगा. वित्त मंत्री जी के पास देश भर से व्यापारियों के फोन आये होंगे कि माई बाप, चीन के माल के बिना न तो प्लांट चलेंगे न खुदरा बाज़ार, न कपडा बाज़ार की रौनक रहेगी न इलेक्ट्रोनिक बाज़ार की . देश के अर्थव्यवस्था के लगभग दस प्रतिशत हिस्से पर चीन का परोक्ष कब्ज़ा है. हम चीन से लगभग 44 मिलियन यु एस डालर का माल आयात करते हैं और निर्यात केवल 15 मिलियन यु एस डालर। जिस देश में तमाम मन्युफेक्चारिंग गतिविधिया बंद हो गई हो चीन से इम्पोर्ट के भरोसे, वह देश कभी अपनी संप्रभुता की रक्षा नहीं कर सकता . हम बहुत कमजोर हैं और लगातार कमजोर हो रहे हैं चीन के मुकबले. चीन से इम्पोर्ट के कारण देश में बेरोज़गारी बढ़ी है क्योंकि लाखों निर्माण गतिविधियाँ बंद हुई हैं , रेडीमेड वस्त्र, छोटे कल पुर्जे, खिलौंगे, कपडे, प्लास्टिक के उत्पाद, बाल बियरिंग आदि आदि में चीन का कब्ज़ा है हमारे बाजारों पर. आर्थिक राष्ट्रवाद जरुरी है प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री जी ! प्रस्तुत है मेरी एक कविता :

 

रुपया


१. 
रुपया 
गिर रहा है
लगातार
होकर कमजोर 
वह रुपया जो
आम जनता की जेब में
नहीं है, फिर भी
रोटी आधी हो रही है
नमक कम हो रहा है
उसकी थाली से,
फिसल रहा है 
उसकी जेब से 
२.
रूपये  से
खरीदना  है
पेट्रोल, गाड़ियाँ
कपडे, घड़ियाँ
टीवी, इंटरनेट,
हवाई जहाज़ और उसकी टिकटें
ई एम आई और क़र्ज़ 
आत्मनिर्भरता नहीं
खरीद सकता 
अपना रुपया 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

आज मजदूर दिवस है

आज मजदूर दिवस है. आज के ही दिन वर्ष 1991 में मेरी पहली कविता "मजदूर" धनबाद, झारखण्ड से प्रकाशित दैनिक जनमत में छपी थी . उसके बाद धनबाद में मजदूरों के बीच थोडा बहुत  काम किया . एशिया के प्रसिद्द मजदूर  कालोनी भूली में दोस्तों के साथ मिलकर निःशुल्क ट्यूशन पढाया, पुस्तकालय खोला, पानी बिजली की लड़ाई लड़ी और फिर एक दिन अचानक सब छोड़ मैनेजमेंट की पढाई करने धनबाद से जो बाहर निकला सो फिर लौटा नहीं . एक बोझ मन में अब भी है. शायद ही कभी उतरे। पिछले साल मई में ही नेशनल बूक ट्रस्ट द्वारा आयोजित शिमला पुस्तक मेला में अपने प्रकाशन के साथ पहली बार शिमला गया और वहां माल रोड पर कुलियों को देख शिमला का आनंद जाता रहा और एक कविता बनी। साहित्यिक पत्रिका हंस के मई अंक में ही यह कविता प्रकाशित हुई है . शिमला के साथ साथ पहाड़ो के तमाम कुलियों को मजदूर दिवस पर समर्पित कविता आपसे साझा करता हूँ 


माल रोड, शिमला



गोरखा युद्ध से लौटे
अपने सेनापति के लिए
ब्रिटिश साम्राज्य का
उपहार था शिमला
जिसे कालांतर में बनाई  गई
गुलाम भारत की  ग्रीष्मकालीन राजधानी

कहा जाता है
कालों को अनुमति नहीं थी
माल रोड तक पहुचने की
और गुलामी का प्रतीक
माल रोड शिमला में
अब भी पाए जाते हैं कुली
जो अपनी झुकी हुई पीठ पर
लादते हैं अपने से दूना वज़न तक
जीवन रेखा हैं ये
इस शहर की

पीठ पर
लाते हैं उठा
माल रोड की चमक दमक
रौनक
और किनारे पडी
किसी लकड़ी की बेंच के नीचे बैठ
सुस्ताते पाए जाते हैं
आँखों में सन्नाटा लिए


आँखे नहीं मिलाते हैं
ये कुली
क्योंकि झुकी हुई पीठ से
आदत हैजमीन को देखने की
ख़ुशी से भरे चेहरों के बीच
अकेले होते हैं
ये कुली

जब भी आता है 
जिक्र
माल रोड या  शिमला का
नहीं होता है जिक्र  पीठ पर वजन उठाये
इन कुलियों का
इस चमक के पीछे
घुप्प अँधेरा होता है
इनकी जिंदगी में

दासता के पदचिन्ह
और गहरे होते जाते हैं
जब भी उठाते हैं
अपनी पीठ पर वजन
और मापते हैं पहाड़ की ऊंचाई,
ये कुली.

मंगलवार, 26 फरवरी 2013

बैंक मोड़

(कविता विकास, कवियत्री हैं, ब्लॉगर हैं, अंग्रेजी की शिक्षिका है। धनबाद में रहती हैं . डी ए वी में पढाती हैं . धनबाद मेरी भी पृष्ठभूमि में है, डी ए वी भी है. इसलिए कविता जी काफी स्नेह रखती हैं मुझसे . उनसे बात कर मेरा स्कूल याद आ जाता है.  एक दिन मैंने फोन किया तो पता चला कि वे बैंक मोड़ जा रही हैं . वही बैंक मोड़ जो धनबाद के इर्दगिर्द के कोयला खदानों के हजारो मजदूरों के लिए नहीं पहुच पाने वाला स्थान माना जाता था. आज बैंक मोड़ की चमक और भी बढ़ गई है, खदान वैसे ही काले हैं, मजदूर बस्तियों की कालिख और बढ़ गई है. एक कविता धनबाद के मजदूर साथियों के लिये. )


धनबाद शहर में
है एक बैंक मोड़

इस मोड़ के चारो और
फैले हुए हैं बैंक
तरह तरह के बैंक 
सरकारी बैंक निजी बैंक, 
सहकारी बैंक 
चमकते दमकते बैंक 
खनकते बैंक 

बैंक 
जिनके पेट भरे जाते हैं 
खदानों से निकले कोयले से 
उन कोयलो का रंग होता है काला 
जिसमे होता है 
भूख और पसीने गंध 
और इन्ही गंध से 
होता है रोशन 
बैंक मोड़ की शाम 

बैंक मोड़ से 
एक सड़क जाती है 
झरिया की और 
वही झरिया जो बसा है 
जलते कोयले पर 
धीमी धीमे मिटते हुए 

जो सड़क 
झरिया से कोयला लेकर आती है 
वह सडक बैंक मोड़ से नहीं ले जाती पैसे 
झरिया की जरूरतों के लिए 

बैंक मोड़ से 
एक सड़क जाती है 
महुदा के लिए 
कहने के लिए तो बस तीस किलोमीटर की दुरी है 
लेकिन यह दुरी आधी शताब्दी से अधिक है 
अब भी अर्धनग्न लोग 
चोरी करते हैं कोयला बोरियों में 
दो जून की रोटी के लिए 
लेकिन भर नहीं सका है उनका पेट 
जबकि खदाने हो चुकी हैं 
खाली 

बैंक मोड़ से 
एक सड़क जाती है 
वासे पुर की तरफ 
वही वासेपुर जिसपर बनी है फिल्म भी 
लेकिन यह वासेपुर तो है नहीं 
यहाँ अँधेरे में खिलती हैं रोशनी 
लाटरी की टिकट बेच/साइकिल की पंक्चर लगा
लोग पढाते हैं अपने बच्चे 
ताकि वे पहुच सके 
बैंक मोड़ 


बैंक मोड़ 
जगमगा रहा है 
जगमगा रहा है वहां के बैंको के खाते 
खदान खाली  हो रहे हैं 
और जिनकी जमीन पर थे खदान 
वे आज भी हैं 
बैंक मोड़ से दशको दूर 

बुधवार, 20 फरवरी 2013

बंद

(कोयल मजदूरों की कालोनी में हम पले बढे . बहुत करीब से शोषण देखा है. और देखा है हड़ताल में हिस्सा लेते मजदूरों को. सरकार पर अब कोई असर नहीं होता इन हडतालों का क्योंकि जनसरोकारों से दूर होती गई है सरकार. आज भारत बंद है. एक कविता  हडतालियों मजदूरों के नाम )

वे चाहते हैं 
 होठ सिले रहें
और बंद हो जाये
स्वर 
ताकि न लगे कोई
नारा कभी
शासन के विरुद्ध
 
चाहते हैं वे 
उँगलियाँ
न आयें कभी साथ
बनाने को मुट्ठी
जो उठे प्रतिरोध में


ठिठके रहे
 कदम
एक ताल में
न उठे कभी
सदनों की ओर

वे  चाहते हैं 
छीन लेना
हक़ जीने का
विरोध जताने का।

शुक्रवार, 15 फरवरी 2013

मोक्ष




1. 
मृत्यु 
स्वयं मोक्ष है 
वह गंगा तट पर हो 
या हो 
किसी स्टेशन प्लेटफार्म पर 


भगदड़ में 
अनगिनत पैरों के नीचे 
कुचलकर 
मिलता है मोक्ष 
अवाम को 


2.
मोक्ष की चिंता 
उन्हें नहीं होती 
जिनके लिए 
खाली होते हैं 
रास्ते/प्लेटफार्म/हवाई अड्डे/गंगा का घाट भी 

3.
मोक्ष के लिए 
जरुरी है करना 
पाप

जितना अधिक पाप 
मोक्ष का आडम्बर उतना ही अधिक 


4.
मोक्ष का 
होता है उत्सव 
पूर्व नियोजित 
सुनियोजित 



5.
मोक्ष भी 
एक किस्म का 
बाज़ार ही 
हम सब 
उसके ग्राहक 

शुक्रवार, 14 दिसम्बर 2012

माँ तुम्हारा चूल्हा


2010 में एक कविता लिखी थी "माँ तुम्हारा चूल्हा" और आज चर्चा है सभी अख़बारों में कि  देश के स्वस्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक है - चूल्हा (हाउस होल्ड एयर पाल्यूशन). संयुक्त राष्ट्र संघ से डबल्यू  एच ओ तक इसे साबित करने पर तुला है। आश्चर्य है कि विकसित देशो में  ए सी, गाड़ियाँ, हवाई जहाज़ आदि आदि धरती को कितना नुकसान पहुचते हैं, इस पर कोई अध्यनन नहीं होता। वह दिन दूर नहीं जब लकड़ी को इंधन के रूप में इस्तेमाल पर पाबंदी होगी और सोचिये कि कौन प्रभावित होगा, साथ ही पढ़िए मेरी कविता भी। 



माँ
बंद होने वाला है
तुम्हारा चूल्हा
जिसमे झोंक कर
पेड़ की सूखी डालियाँ
पकाती हो तुम खाना
कहा जा रहा है
तुम्हारा चूल्हा नहीं है
पर्यावरण के अनुकूल

माँ
मुझे याद है
बीन लाती थी तुम
जंगलों, बगीचों से
गिरे हुए पत्ते
सूखी टहनियां
जलावन के लिए
नहीं था तुम्हारे संस्कार में
तोडना हरी पत्तियाँ
जब भी टूटती थी
कोई हरी पत्ती
तुम्हे उसमे दिखता था
मेरा मुरझाया चेहरा
जबकि
कहा जा रहा है
तुम्हारे संस्कार नहीं हैं
पर्यावरण के अनुकूल
तुम्हारा चूल्हा
प्रदूषित कर रहा है
तीसरी दुनिया को

पहली और
दूसरी दुनिया के लोग
एक जुट हो रहे हैं
हो रहे हैं बड़े बड़े सम्मेलन
तुम्हारे चूल्हे पर
तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर
हो रहे हैं तरह तरह के शोध
मापे जा रहे हैं
कार्बन के निशान
तुम्हारे घर आँगन की
हवाओं में

वातानुकूलित कक्षों में
हो रही है जोरदार बहसे 

कहा जा रहा है कि
तुम प्रदूषित कर रही हो
अपनी धरती
गर्म कर रही हो
विश्व को
और तुम्हारे चूल्हे की ओर से बोलने वाले
घिघियाते से प्रतीत होते हैं
प्रायोजित से  लग रहे  है
शोध अनुसन्धान
और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी

माँ !
मौन हैं सब
यह जानते हुए कि
जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां
जलाओगी तुम,
उतना कार्बन
एक भवन के  केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र  से
उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

वे लोग छुपा रहे हैं
तुमसे तथ्य भी
नहीं बता रहे कि
तुम्हारा चूल्हा
कार्बन न्यूट्रल है
क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में
जलावन न भी जले फिर भी
कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही
लकड़ियों से
बस उसकी गति होगी
थोड़ी कम
और तुम्हारा ईंधन तो
घरेलू है,
 उगाया जा सकता है
आयात करने की ज़रूरत नहीं

लेकिन बंद होना है
तुम्हारे चूल्हे को
तुम्हारे अपने ईंधन को
और जला दी जाएगी
तुम्हारी आत्मनिर्भरता
तुम्हारे चूल्हे के साथ ही .

माँ ! एक दिन
नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा !

बृहस्पतिवार, 6 दिसम्बर 2012

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा


लोकतंत्र में यदि संसंद किसी जन विरोधी नीति को मुहर लगा दे तो जनता शायद कुछ नहीं कर सकती। वर्तमान में खुदरा क्षेत्र में ऍफ़ डी आई पर हुई बहस ने यह साबित कर दिया है। बी एस पी, जो इस मुद्दे पर सदन में अनुपस्थित रही, उन्होंने ही रिलायंस को उत्तरप्रदेश में स्टोर खोलने से रोक दिया था। एक बिग बाज़ार या विशाल या फिर रिलायंस स्टोर से यदि पचास नजदीकी छोटे दुकानों की बिक्री बंद हो जाती है या कम हो जाती है तो और बड़े प्लेयर क्या कर सकते हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
ग़ाज़ियाबाद के इंदिरापुरम कालोनी में दो किलोमीटर के दायरे में लगभग दस छोटे बड़े मॉल हैं और सभी मॉल में एक दो रिटेल प्लेयर हैं एंकर के तौर पर। पिछले दिनों उनके दवाब के कारण कालोनी में लगने वाले साप्ताहिक हाट लगाने पर रोक लग गई थी लेकिन लोगों के भरी विरोध के बाद यह टल सका। ऍफ़ डी आई आने के बाद शायद यह संभव हो जाए। अभी भारत के रिटेल में जैसी घुसपैठ चीन के सामानों की हो गई है, वह और बढ़ेगी ही, कम नहीं होगी। कई विनिर्माण क्षेत्र जिसे खिलौने, रेडीमेड कपडे, बल्ब, इलेक्ट्रोनिक आइटमों में भारत के छोटे और मझौले उद्यम या तो बंद हो गए हैं या रुग्ण। इसके लिए नीति नियंताओं को भागीरथ पैलेस बाज़ार, चावडी बाज़ार और देश के अन्य थोक बाज़ारों में जाना चाहिए। निर्माण कम्पनियाँ अब इम्प्रोटर भर रह गई हैं। बेरोज़गारी बढ़ी है। वालमार्ट जैसे खिलाडी के आने के बाद उनकी सोर्सिंग भारत से होगी यह दिवास्वप्न भर है। जब अभी भारतीय कंपनिया यहाँ से सोर्स नहीं कर रही हैं तो कल कैसे होगा यह, समझ से परे है।
(चित्र सौजन्य : दी गार्डियन )

जो लोग वालमार्ट जैसे रिटेल जायंट से देश में बेरोज़गारी कम होने और कीमत घटने की बात कर रहे हैं, उनके लिए एक ताज़ा जानकारी यह है कि वालमार्ट के कर्मचारी शोषण के खिलाफ सड़क पर उतर गये हैं. बहुत पुरानी घटना नहीं है यह। 23 नवम्बर 2012 को अमेरिका के पचास से अधिक स्टोरों पर वालमार्ट के कर्मचारी हड़ताल पर गए हैं, क्योंकि कंपनी अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन, ओवर टाइम, भत्ते नहीं देता है, अधिकारों की बात करने पर सीधे छटनी करता है।

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा। छोटे व्यापारी जो आज स्वाबलंबी हैं वे कल रिटेल स्टोर के मैनेजर भर होंगे।