गुरुवार, 30 नवंबर 2017

मौजूद रहेंगी ध्वनियाँ

एक दिन कुछ ऐसा होगा
मिट जाएगी पृथ्वी
ये महल
ये अट्टालिकाएं
ये सभ्यताएं
सब मिटटी बन जाएँगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

जब सब सागर
सूख जायेंगे
नदियाँ मिट जायेंगी
मछलियों की हड्डियां
अवशेष बचेंगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .


मनुष्य रहे न रहे
मनुष्यता उसमे रहे न रहे
रहें न रहे दिन
रहें न रहे रात
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

हां !
ध्वनियों से फिर जन्म लेगी
कोई न कोई पृथ्वी
अन्तरिक्ष में
कहीं न कहीं  !

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

अँधेरा है जीवन


जीवन 
अँधेरा ही तो है 
अँधेरा न हो तो 
क्या है रात का अस्तित्व 
पर्वतों की गुफाओं से लेकर 
पृथ्वी के गर्भ तक 
नदियों के उद्गम से लेकर 
समुद्र की तलहटी तक 
पसरा हुआ है 
अँधेरा ही अँधेरा 

जैसे हर रात के बाद 
दिन का होना तय है 
तय है 
दिन के बाद रात भी 
उजाले के बाद अँधेरा भी 

अँधेरा न हो तो 
कहाँ पता चलता है 
उजाले का प्रतिमान 
रौशनी का अस्तित्व ही है 
अँधेरे से 

बीज को पनपने के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
आँखों की नींद के लिए 
जरुरी है अँधेरा 
गर्भ के भीतर भी है 
गहन अन्धकार है 
हर परछाई का रंग 
होता है अँधेरा 

अँधेरा जीवन का ही 
एक नितांत अनिवार्य पहलू है 
मेरे जीवन में स्वागत है तुम्हारा 
हे अन्धकार ! 

सोमवार, 27 नवंबर 2017

भाषाई सौहार्द





प्रकृति की अनुगूंज से 
नदियों की धारा
सागर की लहरों
पक्षियों से कलरव से
निकली जो दिव्य ध्वनियाँ 
सैकड़ो वर्षों तक 
सभ्यता की कंदराओं में 
किया विश्राम 
गढ़े  शब्द 
मानव की जिह्वा से 
गुज़रते हुए पाए अर्थ 
यही बने मानव के उदगार के माध्यम
कहलाये भाषा 


समय के सागर की लहरों के साथ 
तैरते हुए शब्दों ने की 
अनंत यात्राएं 
सभ्यता के सभी कालखंडो के साथ 
ये समृद्ध हुई 
संस्कृति की अंग बनी 
मानव की उदगार बनी 
मनोभावों के सम्प्रेषण का माध्यम बनी 

जो शब्द 
संस्कृति की यात्रा के साथ नहीं चले 
शब्दकोष की शोभा बने 
और कालांतर में समाप्त हो गए 

शब्द
जिन्होंने भूगोल की सीमाओं को 
धवस्त किया 
वे विश्व की भाषाएँ बनी 
विश्व की वाणी बनी 
ज्ञान की सेतु बनी 
जिन्होंने भाषाओँ पर लगाए पहरे
भाषाएँ वहीँ समाप्त हो गई
मृतप्राय हो गई

भाषाएँ बनी कभी तलवार तो 
कभी बनी योद्धाओं की हुंकार
कभी बनी  ज्ञान का भण्डार 
कभी संप्रेषित किया संचित ज्ञान 
तो कभी किया नृपों को सावधान 

भाषाएँ जब एक हुई 
बन गई स्वतंत्रता का स्वर 
भाषाएँ जब एक हुई 
देश हुआ एक
एक हुई जन्शंक्ति
अलग अलग भाषाएँ 
हैं जैसे उंगलियाँ 
एक साथ जब आती है 
बन जाती है मुट्ठी  
बन जाती है शक्ति ! 


बुधवार, 22 नवंबर 2017

चाँद तुम मुस्कुराना पृथ्वी के होने तक

चाँद तुम मुस्कुराना
पृथ्वी के होने तक

अभी लालटेन के नीचे
पढ़ रहे हैं
झूम झूम कर बच्चे
माँ लकड़ी वाली अंगीठी में
सेंक रही है गोल रोटियां
तुम खाकर जाना
लगाने पृथ्वी का चक्कर

चाँद तुम मुस्कुराना
माँ और बच्चों के होने तक

अभी उड़ेंगे जहाज के जहाज
और बरसा जायेंगे
बम और बारूद
चुपके से अँधेरे में
धरती के किसी कोने में
जब सो रही होगी चिड़िया
अपने बच्चों के साथ
तुम रोना , जरुर रोना
रोना एक प्रतिक्रिया है प्रतिरोध का

चाँद तुम रोना 
पृथ्वी पर बम बारूद के होने तक 

मेरे पीछे
पड़े है कई हथियारबंद लोग
तरह तरह के लेकर हथियार
इन हाथियारों से टंगे हैं 
कई कई तरह के झंडे 
कुछ भूगोल के झंडे 
कुछ धर्म के झंडे 
कुछ जाति के झंडे 
वे नहीं रहने देंगे
आदमी को आदमी

चाँद तुम मत बँटना
लड़ना,  पृथ्वी पर आदमी के होने तक .

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

प्लेटफॉर्म नंबर 16


यह है 
प्लेटफर्म नंबर 16 
जहाँ से जाती हैं 
रेलगाडियां 
पूरब की तरफ 

पूरब 
जहाँ सूरज पहले तो निकलता है 
लेकिन रौशनी पहुचती है 
सबसे बाद में 

इस प्लेटफार्म से 
रेलगाड़ियों में चढ़ती है 
थके हुए सपने
टूटे बिखरे
जड़ो से उखड़े हुए
अपनी जड़ों की तलाश के जल्दी में

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में चढ़ती है भीड़
भीड़ जिसने तय समय में
खडी कर दी अट्टालिकाएं
जिसकी भुजाओं ने दिन रात एक कर
पूरे किये विलायती आर्डर
जिसने उठाये कूड़े
जिसने पिलाई चाय
उठाये बोझे
प्रगति के पथ पर जिनका नहीं खुदा कभी कोई नाम

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में चढ़ता है रोगियों का जत्था
जीर्ण-शीर्ण शरीर लिए
कुछ ठीक हुए, कुछ नई तारीख लिए
कुछ लौटाए हुए
देश के सबसे बड़े अस्पताल से
सोचते हुए ऐसा अस्पताल उसके यहाँ क्यूं नहीं है
जहाँ हैं मरीज़ अधिक , जहाँ मरते हैं लोग अधिक

इस प्लेटफार्म से
रेलगाड़ियों में में लदता है बोरियों की तरह
बेटी की शादी करने वाला पिता,
शादी करने वाली बेटी
होने वाला दूल्हा
और उनमे शामिल होने वाला बाराती-सराती
जिनके मन में गूँज रहा होता है
देवी गीत, गाली गीत , उबटन गीत

प्लेटफार्म नंबर 16
रेलवे का प्लेटफार्म भर नहीं है
आशा की किरण है
पूरब के लिए .



कुलीनता

जिस तरह
मर्यादा पुरुषोत्तम होने के लिए
राम का राजकुंवर होना जरुरी है
उसी तरह जरुरी है
बुद्ध होने के लिए
राजकुंवर होना
राज-पाट का त्याग करना

आपका ज्ञान, आपकी शिक्षा
आपकी महानता के लिए जरुरी है
आपका कुलीन होना .

 कोई केवट या कोई लाचार बूढा
कोई धोबी या कोई बीमार रुग्ण दीन मनुष्य
नहीं हो सकता राम या बुद्ध
वह उत्त्पन नहीं कर सकता करुणा
उस पर नहीं लिखी जा सकती है
कोई महागाथा



गुरुवार, 9 नवंबर 2017

अँधेरा का निर्जन द्वीप

जब दुनिया 
रहने के लिए असुरक्षित हो 
मैंने बना लिया है 
अँधेरे का एक निर्जन द्वीप 

इस द्वीप पर नहीं है 
कोई रौशनी 
कोई द्वार 
बस है सन्नाटा 
सन्नाटे से बजता है 
अनसुना संगीत 

सोमवार, 6 नवंबर 2017

दीवार पर टंगी एक तस्वीर का उतर जाना

दीवार पर टंगी
एक तस्वीर का उतर जाना
केवल एक तस्वीर का उतर जाना नहीं होता
न ही यह कैलेण्डर पर महीने के बीत जाने के बाद
नए महीने के पन्ने का आना होता है
यह साल के अंत में पुराने कैलेण्डर का विस्थापन
और नए कैलेण्डर का स्थापन्न होना भी नहीं होता है


कई बार सीलन, नमी की वजह से
सालों साल कमजोर होती रहती हैं दीवारें
ख़त्म होने लगता है दीवार का धैर्य
कील पर पकड़ ढीली हो जाने से
 बोझ नहीं उठा सकने की स्थिति में
अंतत एक दिन तस्वीर गिर जाती है
दीवार से
तस्वीरों को दीवार पर
टंगे रहने के लिए जरुरी है
दीवार कमजोर न पड़े अविश्वास के सीलन से
कील का धैर्य कम न हो

तस्वीर का गिरना
केवल तस्वीर का गिरना नहीं होता
इससे पैदा होता है दीवार की छाती में शून्य
शून्यता है एक खतरनाक संकेत
जो बड़ा होने से बन सकता है ब्लैक होल
लील सकता है जीवन।  

मंगलवार, 10 अक्तूबर 2017

हौसला

उड़ने के लिए
आसमान की कमी नहीं है
कमी है तो हौसले की

देखना तुम्हारे पैरों के नीचे ही
पडा हुआ है वह पत्थर
जिसे उछाल कर शुरू की जा सकती है
एक मुकम्मल क्रांति

निकलने के लिए पैर में चुभा काँटा
मत देखो आगे पीछे ऊपर नीचे
या दायें बाएं
इस्तेमाल करो एक और काँटा

रौशनी का महत्व
उन्हें कहाँ मालूम
जिन्होंने नहीं देखा अँधेरा
और रौशनी की ओर जाने वाला रास्ता
अक्सर अँधेरे से होकर जाता है

मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

छुट्टियों के दिन

छुट्टियों के दिन
जब बच्चे खेल रहे होते हैं
पार्कों में
घूम रहे होते हैं माल
एम्युजमेंट पार्क में कर रहे होते हैं
झूले में सैर
पानी के फव्वारे में
कर रहे होते हैं नृत्य
उसी दिन उत्साह में होते हैं
रेडलाईट पर खिलौने बेचते बच्चे
माल की पार्किंग में बलून बेचते बच्चे
मिठाई की दूकान पर पैकिंग करते बच्चे

कितनी  भिन्न होती हैं छुट्टियाँ
क्या राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री की शुभकामनाओं का रास्ता
पहुचता है इन तक.

रविवार, 24 सितंबर 2017

संघर्ष विराम

चलो डाल देते हैं
हथियार
स्वीकार कर लेते हैं
हार
बच जायेंगे कुछ बच्चे
असमय मृत्यु से
कुछ स्त्रियां बच जाएँगी
बलत्कृत होने से
कुछ किले मंदिर बच जायेंगे
ध्वस्त होने से

संघर्ष विराम की घोषणा से
कितने खुश होते हैं वृक्ष
नदी और चिड़िया। 

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

अचानक



कल तक जो पेड़
हरे थे पत्तियों की वजह से
अचानक वे हरी पत्तियां
हो जाएँ लाल
रिसे उनसे टिप टिप लहू
क्या बैठ सकती हैं
उन शाखों पर
नन्ही चिड़िया
गा सकती हैं
क्या फुदक फुदक कर
चीं चीं . 

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिंदी : कुछ क्षणिकाएं



रौशनी जहाँ
पहुंची नहीं
वहां की आवाज़ हो
भाषा से
कुछ अधिक हो
तुम हिंदी


खेत खलिहान में
जो गुनगुनाती हैं फसलें
पोखरों में जो नहाती हैं भैसें
ऐसे जीवन का तुम संगीत हो
भाषा से
कुछ अधिक हो
तुम हिंदी

बहरी जब
हो जाती है सत्ता
उसे जगाने का तुम
मूल मंत्र हो
भाषा से
कुछ अधिक हो
तुम हिंदी.

४ 
तुम मेरे लिए
मैथिली, अंगिका, बज्जिका
मगही, भोजपुरी
सब हो 

मंगलवार, 12 सितंबर 2017

मद्धम आंच

मद्धम आंच पर
पकती हैं
नरम रोटियां

मद्धम आंच पर ही
पकता है
कुम्हार का दिया और घड़ा
दिया जो आग से जलकर
रौशनी देता है
घड़ा जो पानी को सहेजता है
अपने भीतर

मद्धम आंच में
नहीं होता है
अहंकार
अट्टहास

मद्धम आंच पर
सिझता है प्रेम
धीरे धीरे सहजता से . 

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

हत्यारा

यह समय
अनुकूल है
हत्या के लिए
अनुकूल है
हत्यारों के लिए भी .

हटा दो
जन्मजात बच्चो की नाक से लगी
आक्सीज़न की नली
यही नली लगा दो
किसानो के गले में
और उन्हें लटका दो
किसी पेड़ से या फिर छत से
या फिर किसी बिजली के खम्भे से

छेद दो गोलियों से
विरोधियों की कनपट्टी
ताकि उनकी आवाज़
न पहुचे सत्ताधीशों तक
न पहुचे आमजनों तक

किसी युवा को
थमा दो हथियार
दे दो निर्देश
किसी के भी धड से
अलग कर देने को गर्दन
जिनके विचार तुम्हारे विचार से
मेल नहीं खाते

यह समय
अनुकूल है
हत्या के लिए
अपने अपने तर्क
छुपा दो तकिये के नीचे . 

सोमवार, 4 सितंबर 2017

युवा

जब उसकी उम्र
स्कूल जाने की थी
वह उठा रहा था
किसी ढाबे में जूठे बर्तन

जबकि वह लिखना चाहता था
काली स्लेट पर
सफ़ेद चाक से उजाला
वह रगड़ रगड़ कर
चमका रहा था
कडाही और तवे की काली पेंदी

उसकी पीठ पर
होना चाहिए था बस्ता
वह तेज़ी से उठाता था
लकड़ी के गट्ठर
कोयले की बोरी
गेंहू धान का बोझ

उम्र बीतते देर कहाँ लगती
वह अब लिखता है
आसमान की छाती पर
कोलतार से बेकारी
सरकार कहती है
युवा है देश
तालियों की गडगडाहट में
वह ढूंढता है खुद को .

शनिवार, 2 सितंबर 2017

सड़क

सड़कें
कहीं नहीं पहुँचती
पहुंचाती है
यात्री को।

यात्री
सड़क के बिना
नहीं पहुच सकते
कहीं भी
मंजिल यदि साध्य है
सड़कें साधन।

सड़कें
धरती को नहीं छोड़ती
जो धरती को छोड़ते हैं
औंधे मुँह गिरते है
किसी न किसी मोड़ पर

मैं बने रहना चाहता हूँ
सड़क
तुम पाना अपनी मंजिल
यहीं से गुज़रते हुए। 

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

कभी बात करना वृक्षों से

मित्र
कभी बैठना पल दो पल
वृक्षों के निकट
करना उनसे बाते .

वे कभी नहीं करेंगे
कोई शिकायत अपने हत्यारे के बारे में
जानते हुए कि तुम उन लोगों में शामिल हो
उनके साथ खड़े हो
जिन्होंने की है वृक्षों की हत्या
वे कोई शिकायत नहीं करेंगे
उनके पत्ते मुस्कुराएंगे
हवा के झोके के साथ
अपनी गहरी छाया में वे तुम्हे
तब तक बिठाएंगे जब तक तुम स्वयं
उठकर चले न जाओ .

समय जब नहीं इन दिनों दुनिया के पास
दुनिया एक ही दिशा में भागी जा रही है
मंजिल अस्थायी हो गए हैं और निरंतर विस्थापित हो रहे हैं
वृक्ष टिके रहते हैं जड़ों के साथ
जब तक कि हम तुम उन्हें
जड़ समेत उखाड़ न फेंके
फिर भी अंतिम सांस तक लड़ते हैं वृक्ष .

वृक्ष के पास हमारी तुम्हारी तरह
शब्द नहीं होते
वे संवाद करते हैं
रंगों से , हवा की तरंगों से
वे उदास होते हैं तो चुप हो जाते हैं
उनके पत्ते,
दुःख में वे पीले पड जाते हैं और सुख में गहरे हरे
उन जैसा रंग हम बना नहीं सकते
फिर भी वृक्षों के पास नहीं कोई अहंकार

कभी बैठना पल दो पल
हो सके तो सीखना
बिना शब्दों के संवाद, टिके रहना
और तो और हत्यारे के साथ रहना .


गुरुवार, 24 अगस्त 2017

हुंकार

बाँध दिए गये हैं
उसके दोनो पैर
और कहा जा रहा है उसे
दौड़ो , तेज़ दौड़ो
छू लो मंजिल


उसके दोनों हाथों को
पीठ की तरफ मोड़ कर
बाँध दिया गया है
और कहा जा रहा है
लिखो क्रांति,
बदल दो देश की तस्वीर

उसकी आँखों पर
चढ़ा दिया गया है
नीला पीला चश्मा
और कहा जा रहा है कि
फर्क करो रंगों में
फर्क करो सच झूठ में

वह हुंकार भर रहा है . 

बुधवार, 23 अगस्त 2017

बाढ़

1.
यह कहना गलत है कि
नदियाँ तटों को तोड़ कर
चली आ रही हैं
घरों में , खेतों में,  खलिहानों में
गाँव , देहात , शहरों में
वे तलाश रही हैं
अपना खोया हुआ अस्तित्व
जिसके अतिक्रमण में
संलग्न हम सब .

2.

नदियाँ
गर्भवती नहीं होती
उसके पेट में
नहीं पलता है कोई भ्रूण
वह नहीं जनती
कोई मकरध्वज
उसके पेट में बसता है
मानव की अपरिमित तृष्णा

3

क्रंदन करती है नदी
अनुरोध करती हैं
तोड़ दो तमाम तटबंध
खाली कर कर दो उसका मंच
वह नृत्य करेगी मिट्टियों के बीच
छोड़ जाएगी अतं में
उर्वर धरा
वह लौट आएगी फिर
अगले वर्ष

4

नदी को नहीं मालूम कि
उसके पेट में सो रहा है
कोई चार दिन का दुधमुंहा बच्चा
या फिर जगा हुआ खांसता
कोई लाचार बूढा
या स्वप्नशील कोई  नव विवाहिता युगल
नदी के लिए अतिक्रमण आक्रमण ही है .





शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

जो चुप हैं , वे हैं अपराधी

देखिये अँधेरा है घना 
रौशनी को है लाना
अच्छी नहीं ये ख़ामोशी 
जो चुप हैं , वे हैं अपराधी 

बोलेंगे नहीं आप तो 
बोलेगा कौन 
कब तक रहेंगे आप 
दमन पर मौन 
स्थिति नहीं यह सीधी सादी
जो चुप हैं , वे हैं अपराधी 


रोटी का हल मिला अभी कहाँ 
रौशनी की मंजिल मिली अभी कहाँ 
जस के तस हैं हालात अब यहाँ 
बचेंगे आप कब तक यहाँ 
तटस्थता है भीषण बर्बादी 
जो चुप हैं, वे हैं अपराधी 

बाढ़ है बीमारी है 
है कितनी बेगारी 
जनता कोसती किस्मत को 
कितनी है लाचारी 
बोलो अब तो बोलो 
अच्छी नहीं यह आपाधापी 
जो चुप हैं, वे हैं अपराधी 


मर गए जो बच्चे पूछो उनसे 
कितनी थी तकलीफ 
उनकी माओं से पूछो 
लाश है जिनके पीठ 
धिक्कार है ऐसी आबादी 
जो चुप हैं, वे हैं अपराधी 

सोमवार, 14 अगस्त 2017

यह देश तुम्हारा नहीं

मेरे बच्चो
यह देश युवा है
युवाओं का है
युवा हैं इनके सपने
सपनो में उन्माद है
 यह देश तुम्हारा नहीं है
मेरे बच्चो !

इस देश से मत मांगो रोटी
मत मांगो कपडे
मत मांगो किताबें
यह सब तुम्हारा अधिकार नहीं है
तुम्हारा अधिकार हाशिये पर से
ताली बजाना है
यह देश तुम्हारा नहीं
मेरे बच्चो !

हमें मिसाइल बनानी है
हमारी प्राथमिकता में युद्ध है
हमें शहरो को स्मार्ट बनाना है
हमें सड़के चौडी करनी है
इन सडको पर चलनी है
भारी भरकम गाड़ियाँ
यह देश तुम्हरा नहीं
मेरे बच्चो !

तुम मर गये ठीक हुआ
जो जिन्दा है वे भी क्या कर रहे
मलेरिया, टायफायड, तपेदिक से मर तो रहे हैं
हजारो अन्य बच्चे रोज़
लाखों कुपोषित बच्चे जीवित तो हैं
क्या कर रहे हैं वे जीवित रह कर भी
सोचती है ऐसा ही सरकार
ऐसा ही सोचते हैं अधिकारी

अच्छा हुआ जो तुम मर गये हो
मेरे बच्चे !
यह देश तुम्हारा नहीं . 

बुधवार, 9 अगस्त 2017

अधूरी आजादी




बेटी मरती कोख में 
बैठा बेटा बेरोज़गार  
कैसे मनाये आप कहें
आजादी का त्यौहार 

हाथ में जिनके हुनर 
थामे वे तलवार 
उन्मादी दुनिया में देखो
मानव का व्यवहार 
कैसे मनाये आप कहें
आजादी का त्यौहार 

खेत ऊसर हो रहे 
खेती घाटे का व्यापार
सूद का फंदा कस रहा
बदल के चेहरा साहूकार 
कैसे मनाये आप कहें 
आजादी का त्यौहार 

साल दशक कई बीते
छंटा न अन्धकार
ऊँचा होता जा रहा 
घावो का अम्बार 
कैसे मनाये आप कहें
आजादी का त्यौहार 


जल जंगल जमीन सब 
कर रहे हाहाकार 
सोई गहरी नींद में 
जनता और सरकार 
कैसे मनाये आप कहें
आजादी का त्यौहार 

जन जन को बाँटने का 
फूल रहा कारोबार
हवा पानी धूप पर
बिठाये अपने पहरेदार
कैसे मनाये आप कहें 
आजादी का त्यौहार

सबको रोटी सबको पानी
सेहत अक्षर का अधिकार
बस इतना सा मांगे देश 
निरुत्तर क्यों सरकार
कैसे मनाएं आप कहें
आजादी का त्यौहार। 

बुधवार, 2 अगस्त 2017

संसद में प्रश्न




घट गई खेती 
मिट गये किसान
नहीं पूछा गया संसद में इसके बारे में कोई प्रश्न 


स्कूल कालेज से निकल 
सड़क और कारखानों के बीच 
धक्का खाते युवाओं पर भी 
नहीं पूछा गया संसद में कोई प्रश्न 

इस मानसून 
बाढ़ लील गई हजारों जाने 
नदियाँ उफन कर 
गली मोहल्लों में घुस गई 
संसद के मानसून सत्र में इस बारे में भी नहीं हुआ कोई हंगामा 

इस विषय पर कभी नहीं रुकी कोई कार्यवाही कि 
अस्पतालों में डाक्टर नहीं है 
नहीं है दवाइयां 
स्त्रियाँ अब भी मरती हैं लाखों में जनते हुए बच्चा 
मरे हुए लाश को ढोने के लिए भी नहीं है एम्बुलेंस 

 
दलगत विरोधों से ऊपर उठते हुए 
सांसद ऐसे स्याह प्रश्नों को उठा नहीं खराब करना चाहते हैं 
सब्सिडी वाले कैंटीन में बने मुर्गे का जायका
जबकि आंकड़े बता रहे हैं सस्ती हो रही हैं दालें, गेंहूं  आदि आदि।  

सोमवार, 24 जुलाई 2017

अजेय




दुनिया में कुछ भी 
अजेय नहीं 
वह जो अजेय है 
मात्र है एक दंभ 

धूल में मिल जाएँगी 
ये सभ्यता 
पीछे भी मिल गई हैं 
कई कई सभ्यताएं 

जो कर रहे हैं हत्याएं आज 
समाप्त हो जायेंगे वे भी स्वयं 
सेनायें जो फहरा रही हैं पताकाएं 
सब ध्वस्त हो जायेंगी 

बची रहेगी 
नदी, हवा, पानी और मिटटी 
अजेय हैं ये।