मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

जयदीप शेखर की किताब "नाज़ ए हिंद सुभाष" श्री लाल कृष्ण अडवानी जी तक पहुची


२७ फ़रवरी २०१२ को तीन बजे दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित जयदीप शेखर की किताब "नाज़ ए हिंद सुभाष" का विमोचन हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार श्री संजीव जी के हाथों संपन्न हुआ.

हंस के कार्यकारी संपादक श्री संजीव, डॉ. अग्रवाल,डॉ.शेरजंग गर्ग और मदन कश्यप (साथ में सलिल वर्मा जी) जयदीप शेखर जी की पुस्तक "नाज़ ए हिंद सुभाष"का विमोचन करते हुए
 

अडवाणी जी पुस्तक स्वीकार करते हुए


नाज़ ए हिंद पुस्तक के बारे में अडवाणी जी जानकारी लेते हुए

पुस्तक के आकर्षक आवरण को देखते हुए अडवाणी जी

अडवाणी जी ने पुस्तक को पढ़कर प्रतिक्रिया देने का आश्वासन दिया
ठीक एक घंटे बाद यह पुस्तक श्री लाल कृष्ण अडवाणी जी तक पहुच गई. जितनी ईमानदारी से यह पुस्तक लिखी गई है, नेताजी सुभाष जी पर एक नयी बहस शुरू होगी. अडवाणी जी स्वयं इस पुस्तक के कुछ पन्ने पढ़े. बाकी उन्होंने आश्वासन दिया है कि इस पुस्तक पर वे अपनी प्रतिक्रिया  जरुर भिजवाएंगे. 

जयदीप शेखर जी को बधाई.

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

कुछ बच्चे



१.
कुछ बच्चे 
गैराज में पड़ी 
धूल भरी गाड़ियों पर
नन्ही उँगलियों से 
लिख कर अपना नाम 
होते हैं खुश

कुछ बच्चे 
करते हुए कपड़ो पर इस्त्री 
पढ़ते हैं कपड़ो के लेबल 
टटोल टटोल कर , 
आँखे चमक उठती हैं 
उनकी 

जबकि 
कुछ बच्चो को
याद होते हैं 
सैकड़ो गाड़ियों के नंबर 
देख कर चेहरा ही
निकाल  लेते हैं 
गाड़ी की चाबी 
शहर के
व्यस्ततम पार्किग स्थल में 

कुछ बच्चे 
जो हाशिये पर होते हैं
सीख लेते हैं जीना

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

एकतरफा प्रेम


सेंकते हुए रोटी 
अक्सर जल जाती  है
तुम्हारी उंगलियाँ
तुम उफ़ भी नहीं कहती 

कड़ाही का गरम तेल
अक्सर छिटक कर 
पड़ जाता है 
तुम्हारी बाहों पर 
फफोले उग आते हैं
तुम चुप ही रहती हो

पानी लग जाता हैं
तुम्हारे पैरों की उँगलियों में
बिल्कुल भी 
रूकती नहीं तुम 

हर पर्व त्यौहार पर
तुम्हारी व्यस्तता 
बढ़ जाती है 
कई गुणा

इन सबके बीच
तुम बालों में लगा लेती हो
सुगन्धित तेल
भर लेती हो मांग
बालों में गूंथ लेती हो
एक फूल
प्रतीत होती हो 
रिझाती सी 

पैरों में 
घिरनी बांधे तुम
सदियों से
कर रही हो प्रेम
(एकतरफा प्रेम !)

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

विकास मार्ग




राजधानी से
देश की ओर निकलने वाली
हर सड़क को
कहा जाता है
विकास मार्ग.

विकास मार्ग
जहाँ जहाँ से गुज़रता है
छीन लेता है
खेत खलिहान
मोड़ देता है
पानी का बहाव
बदल देता है 
प्रकृति का स्थानीय चक्र 
उगा देता है
कंक्रीट के कांटे
चिमनियाँ सुलग  उठती हैं
सूरजमुखी फूलों की जगह

विकास मार्ग
लाता है विकास का बेतरतीब बहाव 
करता है बहुत विकास एकमुखी 
चौड़ी कर देता है खाई 
बदल देता है
अर्थव्यवस्था का चरित्र ही
आत्मनिर्भरता को
विस्थापित कर देता है
नौकरी पेशा से
प्रति व्यक्ति आय के अनुपात में
तेज़ी से बढ़ता है प्रति व्यक्ति व्यय

विकास मार्ग के दोनों ओर
लग जाते हैं
मोबाइल के ऊँचे ऊँचे टावर
बंद हो जाते हैं
छोटे छोटे बाज़ार
खुलने लगते हैं माल
बिकने लगते हैं
दुनिया के नामी गिरामी ब्रांड
सूखे खेतों  की पीठ पर
चाबुक की छाप से प्रतीत होते हैं

तेज़ी से बढ़ रहे हैं
फ़ैल रहे हैं
विकास मार्ग
चारों ओर
अमर बेल  की तरह
चूसते हुए
धरती का पानी, पोषण
यह दौर है जब
नामकरण हो रहा है इनका 
भांति भांति से
ताकि याद रहे 
खेत खलिहानों को
अवाम को 
कि कौन लाया था यह विकास मार्ग 
क्या था इसका उद्देश्य 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

चौराहा



चौराहे पर
जरुरी नहीं
चार रास्ते ही हों 
और जो रास्ते दिख रहे हैं 
वे रास्ते ही हों 

ये भी जरुरी नहीं

रास्ता वो नहीं
जो दिखता है
रास्ता वो है
जो दिखे नहीं

फिर भी दिशा दे 

भटकाव 
चौराहे की प्रकृति है
दिशा दिखाना 
रास्ते का चरित्र

शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

गाँव का अमलताश बनाम मुग़ल गार्डेन



अमलताश
मेरे गाँव में
उग आते हैं यूं ही
पुराने पोखर के किनारे
परती पर
आम के बगीचे में
खेतो के बीच चौड़े मेढ़ों पर
और झूलते हैं
खुल कर
हँसते हैं बेफिक्री से
घूप उन पर गिर कर
सोने की चमक उठती है
कोई माली नहीं
कोई खाद पानी नहीं
कोई देखभाल नहीं
सुरक्षा भी नहीं कोई
फिर भी अमलताश
खिलता है हर बरस

आजकल उदास है
अमलताश
अखबार में पढ़कर खबर
खुलने वाला है
राष्ट्रपति भवन का मुग़ल गार्डेन
आम जनता के लिए
दिखाने के लिए
क्या फर्क है
लोक और तंत्र में

आजकल
लग रहा है
पीलिया से ग्रस्त
गाँव का अमलताश

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

चुनाव



हाथ

हाथी
कमल
साइकिल
तीर
मोमबत्ती
आलमारी
चाबी
घर
सूरज
दो पत्ती
हसुआ हथौड़ा
कंप्यूटर
अंगूठी
कबूतर
कौवा
आम
कटहल
गेहू की बाली
सड़क
मोटर
गाय
बछड़ा
उगता सूरज
आदि आदि

इन सबके बीच

उलझे आदमी को
करना है चुनाव (?)

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...