गुरुवार, 29 मार्च 2012

उन्हीं के लोग



चल रही  है
जोरदार बहस 
जोर जोर से चीखते हुए
लोग सुनवाना चाहते हैं
मनवाना चाहते हैं बात

उन्हीं  के वही लोग
बाँट रहे हैं
विज्ञप्तियां 
जारी कर रहे हैं
वक्तव्य 
पुष्टि कर रहे हैं
जोरदार बहस की 

उन्हीं के कुछ लोग
बैठे हैं
अखबारों में 
मोटा मोटा चश्मा चढ़ाये 
टी वी पटल पर भी 
कब्ज़ा है 
उन्हीं लोगों का 
उनकी  आँखों पर भी है
वैसा ही मोटा मोटा चश्मा 
जिनसे छूट जाती हैं
साधारण मोटी बातें 

उन्हीं के लोग 
घुस गए हैं
हमारे घर आँगन में 
बाँट दिया है 
कुछ को 
बहस के इस ओर,
कुछ को 
उस ओर 

बहस 
हमारे बारे में हैं 
हम भूखे क्यों हैं !
हमें क्यों नहीं रोटी मिली!
हमारे पेड़ क्यों कट गए !
हमारे हिस्से की जमीन क्यों छिन गई !
कितने में होगा हमारा गुज़ारा !
नए नए विषय उठाते हैं
उन्हीं  के लोग 

कहते हैं
वर्षों से जारी है बहस 
मोटे हो रहे हैं 
उन्हीं के लोग 
कर हम पर बहस

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

सेनाध्यक्ष जनरल वी के सिंह ने 
ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित 
श्री जयदीप शेखर की पुस्तक "नाज़-ए-हिंद" 
के लिए शुभकामनाएं प्रेषित की हैं 


मंगलवार, 20 मार्च 2012

दालान की ढिबरी



दादाजी
आँगन नहीं आते
दालान पर होते हैं
अकेले नहीं होते (होते भी हैं )
सांझ होते ही
साथ देती  है 
एक ढिबरी 

ढिबरी के धुएं से 
दादाजी की नाक में 
समां जाती  है 
जिसे दादा 
तम्बाकू की छींक से 
निकालने की कोशिश करते हैं 
लेकिन ढिबरी के धुएं से
उनका सम्बन्ध वर्षो पुराना है 

जानते हैं दादा
उनके नहीं रहने के बाद
दालान
हो जायेगा अकेला
ढिबरी अकेले नहीं जलेगी
जलने के लिए  चाहिए 
ढिबरी को 
बाती, तेल 
एक चिंगारी 
जो नहीं मिलेगी 
उनके जाने के बाद 

ढिबरी उदास है
दादा जी से अधिक 
उसे अकेलेपन से नहीं
मिटने का भय अधिक है.

शनिवार, 17 मार्च 2012

यह बज़ट शहर और गाँव के बीच की दूरी कम करेगी

 दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का बज़ट पेश होने के बाद चैन की सांस रहे थे, देश के दादा. घर का बज़ट तो संभाला जाता नहीं है लोगों से, और मीन मेख निकलते हैं,  देश के बज़ट में, बुदबुदा रहे थे .

शहर और गाँव के बीच में जब दूरी रहती है तो लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं. सरकार को असफल कहते हैं. और जब इस दूरी को कम करने की बात चल रही है तो लोगो को समस्या हो रही है. शहर में घर लेना हो तो कर्जे पर लो, टीवी,कार लेना हो कर्जे पर लो. सब उपलब्ध है. यदि ई एम आई नहीं चुका पा रहे हो तो फिर पर्सनल लोन ले लो. गाँव में भी सरकार यही करने वाली है. सत्तर हज़ार गाँव में इस साल बैंक खुलने वाले हैं. सड़क नहीं है तो क्या हुआ. अस्पताल नहीं है तो क्या हुआ. कर्जा तो मिलेगा किसानो को. किसानो को कर्जा कैसे मिलता है ये भी सबको पता है. अब कर्जा लेके खेती करो. फसल हुई तो सरकार लेने नहीं आएगी. बिचौलिए को औने पौने दाम में बेचो. लागत आ जाये तो खुशनसीब नहीं आये तो किसान कार्ड से फिर लोन ले लो. दो तीन साल में आठ दस फसल चक्र में ऐसा चक्का फंसेगा जैसे कि शहरी मध्य वर्ग का फंसा हुआ है. कोई रास्ता निकले तो ठीक है, नहीं तो खेत बेच हो नए साहूकार के हाथो. नहीं तो आत्महत्या कर लो. शहर में तो ये आम हो गया है. अब गाँव देहात में भी होगा. शहर और गाँव के बीच खाई ऐसे ही कम होगी.


इस बज़ट में कई और उपय किये गए हैं. सस्ते मकान बनेंगे. शहर में सस्ते मकान का मतलब अफोर्डेबल होम से है. अफोर्डेबल यानी २०-२५ लाख का घर. अब सरकार बिल्डर को विदेश से लोन लेने की छूट दे रही है. विदेश से पैसा लो और सस्ते मकान बनाओ. अब जब देश का सारा काला धन विदेश में है और देश की जानता जोर दे रही है विदेश के काला धन वापिस लेन के लिए तो कोई न कोई उपाय करना ही होगा. बिल्डर को विदेश से लोन दे दो. इस से काला धन वापिस देश में आ जायेगा और गोरा हो जायेगा. ये बिल्डर किसानो के सस्ते जमीन लेंगे और सस्ते मकान बनायेंगे. खेती के लिए ज़मीन कम ही हो जाएगी तो क्या होगा, विदेश से हम आयात कर ही लेंगे. छोटे किसान क्या कमाते हैं जो उन्हें खेती में रहना है. बेहतर है नौकरी कर ले. आत्मनिर्भरता तो दुश्मन है नई उदारवादी अर्थव्यस्था में. सरकार के इस उपाय से भी शहर और गाँव के बीच की खाई दूर होगी.

दादा ने बढ़िया व्यवस्था कर दी है. अब देखना है गाँव कब तक शहर के जंजाल से बचे रहते हैं.

मंगलवार, 6 मार्च 2012

विश्व पुस्तक मेला २०१२ के दौरान ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन : कुछ चित्र

डॉ. शेरजंग गर्ग जी का अभिवादन करती ज्योति 

डॉ. राजेंद्र अग्रवाल  का अभिवादन करती ज्योति 

मंच सञ्चालन करते सलिल वर्मा 

वरिष्ठ कथाकार श्री संजीव जी   का अभिवादन करती ज्योति 

वरिष्ठ कवि  मदन कश्यप   का अभिवादन करती ज्योति 

एक सांस मेरी काव्य संग्रह का विमोचन 

एक सांस मेरी की प्रति को देखते वरिष्ठ कवि मदन कश्यप जी 

सम्माननीय  दर्शक गण

वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेम जनमजेय जी  और बलराम अग्रवाल जी  दर्शक दीर्घा में 

दर्शक समूह

सलिल वर्मा जी जिन्होंने अपने कुशल सञ्चालन से कार्यक्रम को सफल बनाया 

सलिल वर्मा जी जिन्होंने अपने कुशल सञ्चालन से कार्यक्रम को सफल बनाया  

नाज़ ए हिंद का विमोचन 

नाज़ ए हिंद सुभाष की प्रति के साथ कवि द्वय श्री  मदन कश्यप और श्री उपेन्द्र कुमार , भा प्र से  (भूतपूर्व संयुक्त सचिव (रक्षा मंत्रालय)

नाज़ ए हिंद सुभाष की प्रति के साथ कथाकार संजीव, लेखक जयदीप शेखर और  डॉ. राजेंद्र अग्रवाल 



चर्चित ब्लोगर श्रीमती वंदना गुप्ता , आनंद द्विवेदी और संजू तनेजा जी . सुदूर में जयदीप  शेखर के मित्र 


चर्चित ब्लोगर एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री अविनाश वाचस्पति की पुस्तक
व्यंग्य का शून्यकाल  का विमोचन 

रामपती  जी के काव्य संग्रह लहरों के बीच का विमोचन 

राजेश उत्साही जी के काव्य संग्रह वह, जो शेष है का विमोचन 


नाज़ ए हिंद सुभाष पुस्तक का विमोचन 

नाज़ ए हिंद सुभाष पुस्तक पर बोलते हुए श्री संजीव 

दर्शक दीर्घा में सम्मानित साहित्यकार और ब्लोगर

दर्शक दीर्घा में सम्मानित साहित्यकार और ब्लोगर


ब्लॉग और मूलधारा के साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कवि मदन कश्यप 


रश्मिप्रभा जी की किताब आत्मचिंतन का विमोचन 

डॉ. शेर जंग गर्ग जी अविनाश वाचस्पति जी की पुस्तक पर बोलते हुए 

विहंगम दृश्य 

विहंगम दृश्य 





अनुपमा जी अपनी पुस्तक के साथ 


अनुभूति का विमोचन 

गीता का पाठ करती अनुपमा त्रिपाठी जी 

गीता का पाठ करती अनुपमा त्रिपाठी जी 

डॉ. राजेंद्र अग्रवाल ज्योतिपर्व प्रकाशन और आत्मचिंतन पुस्तक पर बोलते हुए 

दर्शक गण 

निर्मल गुप्त की किताब एक शहर किस्सों भरा का विमोचन 



एक सांस मेरी के विमोचन पर पहुच नहीं सके थे श्री एम् वर्मा. बाद में एक सांस मेरी की प्रति के साथ  श्री वर्मा और श्री उपेन्द्र कुमार 










जयदीप शेखर अपने मित्रो के साथ पुस्तक विमोचन के उपरांत 


अपने मित्रो के बीच एक सांस मेरी के साथ वर्मा जी और गुंजन जी 
एक सांस मेरी के विमोचन पर पहुच नहीं सके थे श्री एम् वर्मा. बाद में एक सांस मेरी की प्रति के साथ डॉ. गर्ग, मदन  कश्यप, एम् वर्मा और उपेन्द्र कुमार 





थिंक इण्डिया के संपादक डी पी त्रिपाठी जो कि एक अग्रणी बुद्धिजीवी हैं , सभा में मौजूद थे
और हमारा दुर्भाग्य कि हम उन्हें उचित सम्मान न दे सके. अनुपमा जी के अनुरोध पर वे पधारे थे. 

थिंक इण्डिया के संपादक डी पी त्रिपाठी 

बैक ड्रॉप नए लोग नई सोच - समारोह के बाद अकेला 

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...