शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

माँ तुम्हारा चूल्हा


2010 में एक कविता लिखी थी "माँ तुम्हारा चूल्हा" और आज चर्चा है सभी अख़बारों में कि  देश के स्वस्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक है - चूल्हा (हाउस होल्ड एयर पाल्यूशन). संयुक्त राष्ट्र संघ से डबल्यू  एच ओ तक इसे साबित करने पर तुला है। आश्चर्य है कि विकसित देशो में  ए सी, गाड़ियाँ, हवाई जहाज़ आदि आदि धरती को कितना नुकसान पहुचते हैं, इस पर कोई अध्यनन नहीं होता। वह दिन दूर नहीं जब लकड़ी को इंधन के रूप में इस्तेमाल पर पाबंदी होगी और सोचिये कि कौन प्रभावित होगा, साथ ही पढ़िए मेरी कविता भी। 



माँ
बंद होने वाला है
तुम्हारा चूल्हा
जिसमे झोंक कर
पेड़ की सूखी डालियाँ
पकाती हो तुम खाना
कहा जा रहा है
तुम्हारा चूल्हा नहीं है
पर्यावरण के अनुकूल

माँ
मुझे याद है
बीन लाती थी तुम
जंगलों, बगीचों से
गिरे हुए पत्ते
सूखी टहनियां
जलावन के लिए
नहीं था तुम्हारे संस्कार में
तोडना हरी पत्तियाँ
जब भी टूटती थी
कोई हरी पत्ती
तुम्हे उसमे दिखता था
मेरा मुरझाया चेहरा
जबकि
कहा जा रहा है
तुम्हारे संस्कार नहीं हैं
पर्यावरण के अनुकूल
तुम्हारा चूल्हा
प्रदूषित कर रहा है
तीसरी दुनिया को

पहली और
दूसरी दुनिया के लोग
एक जुट हो रहे हैं
हो रहे हैं बड़े बड़े सम्मेलन
तुम्हारे चूल्हे पर
तुम्हारे चूल्हे के ईंधन पर
हो रहे हैं तरह तरह के शोध
मापे जा रहे हैं
कार्बन के निशान
तुम्हारे घर आँगन की
हवाओं में

वातानुकूलित कक्षों में
हो रही है जोरदार बहसे 

कहा जा रहा है कि
तुम प्रदूषित कर रही हो
अपनी धरती
गर्म कर रही हो
विश्व को
और तुम्हारे चूल्हे की ओर से बोलने वाले
घिघियाते से प्रतीत होते हैं
प्रायोजित से  लग रहे  है
शोध अनुसन्धान
और तम्हारे चूल्हे के प्रतिनिधि भी

माँ !
मौन हैं सब
यह जानते हुए कि
जीवन भर जितने पत्ते और टहनियां
जलाओगी तुम,
उतना कार्बन
एक भवन के  केन्द्रीयकृत वातानुकूलित यन्त्र  से
उत्सर्जित होगा कुछ ही घंटे में

वे लोग छुपा रहे हैं
तुमसे तथ्य भी
नहीं बता रहे कि
तुम्हारा चूल्हा
कार्बन न्यूट्रल है
क्योंकि यदि तुम्हारे चूल्हे में
जलावन न भी जले फिर भी
कार्बन उत्सर्जन तो होगा ही
लकड़ियों से
बस उसकी गति होगी
थोड़ी कम
और तुम्हारा ईंधन तो
घरेलू है,
 उगाया जा सकता है
आयात करने की ज़रूरत नहीं

लेकिन बंद होना है
तुम्हारे चूल्हे को
तुम्हारे अपने ईंधन को
और जला दी जाएगी
तुम्हारी आत्मनिर्भरता
तुम्हारे चूल्हे के साथ ही .

माँ ! एक दिन
नहीं रहेगा तुम्हारा चूल्हा !

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा


लोकतंत्र में यदि संसंद किसी जन विरोधी नीति को मुहर लगा दे तो जनता शायद कुछ नहीं कर सकती। वर्तमान में खुदरा क्षेत्र में ऍफ़ डी आई पर हुई बहस ने यह साबित कर दिया है। बी एस पी, जो इस मुद्दे पर सदन में अनुपस्थित रही, उन्होंने ही रिलायंस को उत्तरप्रदेश में स्टोर खोलने से रोक दिया था। एक बिग बाज़ार या विशाल या फिर रिलायंस स्टोर से यदि पचास नजदीकी छोटे दुकानों की बिक्री बंद हो जाती है या कम हो जाती है तो और बड़े प्लेयर क्या कर सकते हैं, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
ग़ाज़ियाबाद के इंदिरापुरम कालोनी में दो किलोमीटर के दायरे में लगभग दस छोटे बड़े मॉल हैं और सभी मॉल में एक दो रिटेल प्लेयर हैं एंकर के तौर पर। पिछले दिनों उनके दवाब के कारण कालोनी में लगने वाले साप्ताहिक हाट लगाने पर रोक लग गई थी लेकिन लोगों के भरी विरोध के बाद यह टल सका। ऍफ़ डी आई आने के बाद शायद यह संभव हो जाए। अभी भारत के रिटेल में जैसी घुसपैठ चीन के सामानों की हो गई है, वह और बढ़ेगी ही, कम नहीं होगी। कई विनिर्माण क्षेत्र जिसे खिलौने, रेडीमेड कपडे, बल्ब, इलेक्ट्रोनिक आइटमों में भारत के छोटे और मझौले उद्यम या तो बंद हो गए हैं या रुग्ण। इसके लिए नीति नियंताओं को भागीरथ पैलेस बाज़ार, चावडी बाज़ार और देश के अन्य थोक बाज़ारों में जाना चाहिए। निर्माण कम्पनियाँ अब इम्प्रोटर भर रह गई हैं। बेरोज़गारी बढ़ी है। वालमार्ट जैसे खिलाडी के आने के बाद उनकी सोर्सिंग भारत से होगी यह दिवास्वप्न भर है। जब अभी भारतीय कंपनिया यहाँ से सोर्स नहीं कर रही हैं तो कल कैसे होगा यह, समझ से परे है।
(चित्र सौजन्य : दी गार्डियन )

जो लोग वालमार्ट जैसे रिटेल जायंट से देश में बेरोज़गारी कम होने और कीमत घटने की बात कर रहे हैं, उनके लिए एक ताज़ा जानकारी यह है कि वालमार्ट के कर्मचारी शोषण के खिलाफ सड़क पर उतर गये हैं. बहुत पुरानी घटना नहीं है यह। 23 नवम्बर 2012 को अमेरिका के पचास से अधिक स्टोरों पर वालमार्ट के कर्मचारी हड़ताल पर गए हैं, क्योंकि कंपनी अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन, ओवर टाइम, भत्ते नहीं देता है, अधिकारों की बात करने पर सीधे छटनी करता है।

आने वाला समय भारतीय खुदरा बाज़ार के लिए दुश्वारी भरा होगा। छोटे व्यापारी जो आज स्वाबलंबी हैं वे कल रिटेल स्टोर के मैनेजर भर होंगे।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

माँ और दीपावली



माँ के लिए
दिवाली आ जाता है
हफ्ता भर पहले ही

घर के कोने कोने तक
पहुच जाती है माँ
जहाँ होती है
चूहों  का  बसेरा
सीलन
अँधेरा
माँ दिवाली कर आती है
घर के अँधेरे कोनो में

सबसे आखिर में
माँ निकलती है
अपनी सबसे पुरानी पन्नी
जिसमे कई गत्तो के नीचे
पड़ी होती है
कुछ पुरानी कढाई,
कुछ जंग लगी सुइयां
कुछ अधूरे चित्र
जिन्हें इस बरस पूरा करने को सोचती है
यह सिलसिला
दशको पुराना है

होती हैं
इन्ही गत्तों के बीच
कुछ सपने
जिन्हें माँ छोड़ आई होती हैं
जिंदगी के किसी मोड़ पर
दिवाली पर
उन सीलन भरे सपनो को भी
धूप और दीया दिखाती है


माँ  के लिए
दिवाली का मतलब
कुछ सपनो को
फिर से अँधेरे गत्तो के बीच सहेज कर
रख देना होता है
और फिर रोशन करना होता है
घर, आँगन, चूल्हा, चौका, छत।

माँ के जीवन का तिमिर
किसी दीप से नहीं गया
सदियों से

(दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं )

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

औसत लोग



जो होते हैं
औसत
उनका कुछ भी नहीं
न धरती, न आसमान,
न  हवा न पानी
न होते हैं वे वोट ही

क्योंकि
वे लड़ नहीं सकते
कोई युद्ध
वे बन नहीं सकते
किसी क्रांति का हिस्सा
उनमे जोश का
गुबार नहीं होता
वे इश्वर के
अनचाहे संतान की तरह
होते हैं
अपने ही भरोसे

चूँकि औसत लोग
तन या मन से विकलांग नहीं होते
नहीं बनती कोई विकलांग नीति उनके लिए
उनके हिस्से
नहीं आती कोई
राजकोषीय सहायता
कोई विशेष योजना
वे हिस्सा नहीं होते
तथाकथित 'इन्क्लूसिव ग्रोथ' के

औसत लोग
न हाशिये के ऊपर होते हैं
न होते हैं हाशिये के पार
उनकी न कोई मंजिल होती है
न कोई राह

मैं
एक औसत व्यक्ति हूँ
संज्ञाहीन

सोमवार, 8 अक्तूबर 2012

माँ और भादो



इस बरस भी
भादो नहीं बरसा
हथिया नक्षत्र
सूना ही रहा
नहीं बढाई बादलो ने
अपनी सूंढ़
और तालाब की मछलियाँ
नहीं खींच ले गया

न जाने माँ की
कैसी कैसी चिंताएं हैं
जो इस शोर में
दब कर रह जाती हैं
और इस बीच सरकार
एक दिन में ले लेती है
कई जरुरी निर्णय
जिसमे भादो के नहीं बरसने का
जिक्र नहीं होता

हथिया जो
नहीं बरसा है
कैसे जमेगा धान के पौधे में गर्भ
धान के पौधे जो नहीं
गम्हरायेंगे
कैसे लकदक लकदक फूटेंगे
माँ घुली जाती है इन चिंताओं में
उस नहीं फ़िक्र कि
बुढ़ापे के लिए संजोये पेंशन की रकम से
अब खेलेगा बाज़ार
मनचाहे तरीके से
क्योंकि अब भी पेंशन उन तक कहाँ पहुची है
जिनके लिए भादो का नहीं बरसना
बन सकता है
आत्महत्या का तात्कालिक कारण

माँ
भादो के हर इतवार को
रखती है सुरुज देवता का व्रत
और ऐसा रिश्ता है उसका
सुरुज देव से कि
जी भर कर कोसती है
भादो में चमकने के लिए
चटकते धान के खेतो को देख
माँ के चेहरे पर उभर आती है
झुर्रियों की कई और परतें
और कोई मेकप नहीं बना
जिसे छुपाने के लिए

माँ बहुत उदास होती है
भादो के नहीं बरसने पर
जबकि गीत तो सावन के बरसने का है
माँ फिल्मे नहीं देखती शायद

सोमवार, 1 अक्तूबर 2012

भूसा



भूसा हूं
मैं
अन्न को
सहेज
रखता हूं
और अंत में
कर दिया जाता हूं
बाहर

मेरा मोल भी
भूसा रह जाता है
मैं
ढेर सारे लोगों में
दिमाग में भर जाता हूं
जो नहीं होते हैं
इस दुनिया के काबिल तेज़

मैं
भूसा हूं

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

कलाई घडी


कलाई पर
बंधा है
समय
मारता  है
पीठ पर चाबुक
और दौड़ पड़ता हूँ मैं
घोड़े की तरह
आगे
और आगे
अंतहीन
घडी मुस्कुराती है
कलाई पर बंधी बंधी
मुझे हाँफते देख

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

बाँध के आगे के लोग



एक नदी
जो गुज़रती थी
खेतों के बीच से
बाँध बनने से
सूखी रहने लगी हैं

सुना है
बहुत पानी है
बाँध के उस तरफ
वहां से
बिजली बनेगी
राजधानी को जाएगी
वहां से लौटते हुए
सांसद, विधायक, मुखिया,
सरपंच के घर होते हुए
हमारे घर भी आएगी 

तब तक
या तो सूखे रहेंगे
या ढह / डूब जायेंगे
खेत, घर आँगन
बाँध के आगे के लोगों के 



सोमवार, 10 सितंबर 2012

घोगल-जरुरी है संघर्ष


जल 
 
जीवन है

जल में समा कर

मिट जाना है

एक दिन

लेकिन मिटने से पूर्व

जल की सतह पर

लिख जाना है

सत्य 

सत्य का आग्रह करते हुए


यह जल
वह नहीं
जो आता है टोटियों के रास्ते
या फिर 

बड़े बड़े जार में

पहुंचाया  जाता है 

घरों में हर सुबह

या फिर 

सीलबंद बोतलों में

चमचमाता रहता है

दुकानों में

यह जल वह है

जो बहता है

नदियों से होकर

खेत खलिहान को सीचते हुए 

गुजरता  है 

संस्कृतियाँ जिनके तट पर 
हैं पनपीं
घोगल में
लिखा गया है इतिहास

कि जल को
जीवन बनाये रखने के लिए
जरुरी है
सामूहिक संघर्ष 

बुधवार, 5 सितंबर 2012

द्रोण

शिक्षक दिवस पर प्रश्न उठती कुछ क्षणिकाएं 

१. 
मिलती है शिक्षा 
शक्ति से, 
भक्ति से नहीं 
आपने बहुत पहले 
स्थापित कर दिया था
आज भी है जारी 


२.
शिक्षा पर
सबका 
एक सा अधिकार 
 है नहीं, 
नहीं तो 
एकलव्य भी होता 
अर्जुन की कक्षा में 

३.
शिक्षा और 
शिक्षक का 
प्राथमिक उद्देश्य है
सत्ता का पोषण 
अन्यथा 
समता होता 
पहला पाठ 

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

वो इमली का पेड़




१.
खेतों के बीच
हुआ करता था
एक इमली का पेड़
(अब वे खेत ही कहाँ हैं)

२.
सुस्ताया करते थे 
खेत जोतते बैल और हरवाहे 
उस इमली के पेड़ के  नीचे
(अब वे बैल और हरवाहे ही कहाँ हैं )

३.
हुआ करता था 
गौरैया  का घोंसला 
इमली के पेड़ पर 
(अब वे गौरैया  ही कहाँ हैं)

४.
सुना है
कट गया है 
इमली का पेड़
(कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लगा यह तो होना  ही था )

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

देश: आपके लिए - हमारे लिए



  
१.

आपके लिए
बनी सड़क
आई बिजली
बने पब्लिक स्कूल
नए नए कालेज
हमारे लिए
हुए हर साल
वादे


२.

आपके लिए
बने नए शहर
हुए निवेश
आयात हुई प्रौद्योगिकी
हमारे लिए
हुए हर साल
नए नए वादे


३.

आपके लिए
सहज हुई नीतियाँ
आसान हुई नीलामियाँ
सरकार बनी गारंटर
हमारे लिए
हुए हर साल
कुछ और नए  वादे


(स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ )

सोमवार, 6 अगस्त 2012

पहाड़ और क़ानून



पहाड़,
पत्थरों पर
जिनका था अधिकार
वे कानून की किताब से
हैं बाहर
उन्हें पढनी नहीं आई
क़ानून की भाषा
और जो भाषा
जानते हैं वे
उस भाषा में
नहीं लिखा जाता है
क़ानून

पेड़
नहीं जानते हैं
कैसे वे कटने के बाद
बदल जाते हैं
प्रीमियम प्रोडक्ट में
वे इतना भर जानते हैं
सूखे और झडे पत्तों को बटोरने
और टहनियों के काटने से
नहीं होता प्रदूषण
नहीं कम होते पेड़
हाँ ! चूल्हा जरुर जलता है
चूल्हे की आग में
नहीं होती बारूदी गंध
बन्दूक सी
समझ कहाँ है इसकी
क़ानून को. 

क़ानून
पेड़ को कटघरे में
खड़ा कर सकता है
क्यों दी  उसने
पहाड़ को घनी  छाया
फल और सूखे पत्ते
क्योंकि
क़ानून में लिख दिया गया है
नहीं चलेगी
पेड़ की मर्ज़ी अपनी

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

ईश्वर




१.

ईश्वर की
होती है जो इच्छा
वह कर लेता है
उसके पास समय हैं
संसाधन हैं
बल है
छल है
बहाने हैं
क्योंकि वह ईश्वर है


२.

इधर
ईश्वर
नहीं सुनता है
प्रार्थनाएं
चीखें
अनुनाद
अनुरोध
क्योंकि
ईश्वर होता जा रहा है
निरंकुश


३.

जब तक
ईश्वर को
मालूम है कि
सुरक्षित है
उसकी सत्ता
ईश्वर
रहेगा ऐसा ही

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

प्रार्थना का धर्म




धान के बीज
बो दिए हैं तालाब के किनारे किनारे
उम्मीद में कि बादल बरसेंगे
और पौध बन उगेंगे
फिर से खेतो में रोपे जाने के लिए


सुबह दोपहर शाम
दो दो घड़े की बहंगी बना
सींच रहे हैं
धान के बीज वाली क्यारियां
पुरुष, स्त्री,
जवान होते बच्चे और बच्चियां
गाते हुए गीत
उमस और पसीने के बीच


साथ में कर रहे हैं प्रार्थना
बादलों से/इन्द्र से /मेढ़को से
/मंदिरों में /मस्जिदों में
ग्राम देवता से/स्थान देवता से
अपनी अपनी कुल देवियों से

उनकी  प्रार्थनाओं और गीतों में 
नहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल

सोमवार, 16 जुलाई 2012

अंततः



हो जाना है अंत 
सभी आयुधो का

सभी बमवर्षक विमान
धराशायी हो जायेंगे 
बंदूकों की नालियां 
हो जाएँगी बंद 

फौजों के बूटों के 
तलवो में लगी गिट्टियाँ
घिस जाएँगी 
और तोपों के गोले 
हो जायेंगे फुस्स

अंतर की दीवारें 
गिर जाएँगी 
इर्ष्या का धुंआ 
छंट जायेगा 
और सीमाएं सब
ध्वस्त हो जाएँगी 
एक दिन 

बस एक बीज 
जो गया है धरती के गर्भ में 
अंकुरित होगा अंततः 

किन्तु एक युद्ध के बाद 
जो कहीं से भी  नहीं है
अपरिहार्य

मंगलवार, 10 जुलाई 2012

बवासीर



सदियों से
साथ रहा है उनके
यह रोग
जिन्होंने
काटे हैं  पहाड़
बनाये हैं महल
ऊँची चारदीवारी
सड़क, पुल और
नई फैक्ट्रियां

पीठों पर
जो ढोते हैं पत्थर
हाथ
जो गढ़ते हैं
शिलाओं की मूर्तियाँ
जो अपनी छाती के  जोर से
बढ़ाते हैं समय को आगे
साथ साथ उनके
चुप चाप चलता है

युद्ध में बहे खून का
हिसाब तो फिर भी है
लेकिन इतिहास में दर्ज नहीं
मेहनतकशो की यह पीड़ा

शुक्रवार, 29 जून 2012

ज्योतिपर्व से प्रकाशित सभी पुस्तकें फ्लिप्कार्ट पर


श्री निर्मल गुप्त एक  सिद्धहस्त   व्यंग्यकार, कवि और कहानीकार हैं.  ज्योतिपर्व प्रकाशन से उनकी प्रथम पुस्तक "एक शहर किस्सों भरा" प्रकाशित हुई है.  इस पुस्तक की समीक्षा पढ़िए.  समीक्षक  हैं श्री प्रशांत मिश्र. समीक्षा दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई है।   


01 जुलाई, 2012 से इस पुस्तक के साथ - साथ ज्योतिपर्व  प्रकाशन से प्रकाशित सभी पुस्तकें फ्लिप्कार्ट पर ऑनलाइन  बिक्री  के लिए  उपलब्ध होंगी। 

शुक्रवार, 22 जून 2012

कॉपी राईटर


(पेशे से कापी राइटर का दर्द इन कविताओं में  )



बेचता हूँ शब्द
इसलिए कबीर नही हूँ
भक्ति नही है शब्दों में
इसलिए तुलसी नही हूँ

बाजार की आंखों  देखी    लिखता हूँ
इसलिए सूर नही हूँ
दिमाग से सोचता हूँ शब्द
इसलिए मीरा नही हूँ 

एक कॉपी राईटर हूँ मैं
बेचता हूँ शब्द !


सपने बुनता हूँ
सपने गढ़ता हूँ
सपने दिखाता हूँ

नही जानना चाहता
कितना सच है
कितना झूठ
कितना फरेब

तारांकित करके 'शर्तें लागू'
लिख कर मुक्त हों  जाता हूँ
अपनी जिम्मेदारियों से
तोड़ लेता हूँ नाता
अपने शब्दों से 

एक कॉपी राईटर हूँ मैं
बेचता हूँ शब्द !


गुरुवार, 21 जून 2012

एक उपलब्धि होने को है





इन्टरनेट के इस  युग में हिन्दी और प्रौद्योगिकी पर एक पुस्तक ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित हो रही है. संभावना  है कि यह पुस्तक  सितम्बर २०१२ में विश्व हिंदी सम्मलेन, दक्षिण अफ्रीका में विमोचित हो.  पुस्तक और रचनाकार के नाम की प्रतीक्षा कीजिये.


आप सबकी शुभकामना चाहिए.

बुधवार, 20 जून 2012

सतीश सक्सेना के गीत संग्रह "मेरे गीत" का भव्य विमोचन . ख़ामोशी से हुआ "खामोश, खामोशी और हम" का भी विमोचन.





ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सतीश  सक्सेना के गीतों का संग्रह "मेरे गीत" का विमोचन वरिष्ठ गीतकार श्री देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' के हाथों हुआ . इस अवसर पर "आजकल" पत्रिका के पूर्व संपादक और गीतकार डॉ. योगेन्द्र दत्त और नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर और आलोचक डॉ. भारतेंदु मिश्र भी उपस्थित थे. साथ में मीडिया गुरु डॉ. अम्बरीश सक्सेना और ख्यातिप्राप्त लेखक, चिन्तक और उद्यमी लायन डॉ राजेंद्र अग्रवाल भी उपस्थित थे.  राजधानी के कंसटिट्युशन क्लब में आयोजित इस समारोह में दिल्ली और एन सी आर के साहित्यकारों और ब्लोगरों का अदभुत  समागम था. इसी समारोह में रश्मि प्रभा जी  के संपादन में १८ ब्लागरों का काव्य संकलन "खामोश ख़ामोशी और हम" का विमोचन वरिष्ठ कथाकार और कवि श्री अशोक गुप्ता द्वारा किया गया. समारोह के अध्यक्ष श्री देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' थे. इस अवसर पर पूरे एन सी आर से आये ब्लागरों की उपस्थिति उत्साह बढ़ाने वाली थी. 

कार्यक्रम की शुरुआत श्री सतीश सक्सेना के आत्मकथ्य से हुआ.  अपने भावपूर्ण संभाषण और गीत से सतीश जी ने सभा की ऑंखें नम कर दी. अपने आत्मकथ्य में सतीश सक्स्सेना ने कहा कि मेरे गीत वास्तव में मेरे ह्रदय के उदगार हैं. ये सच हैं जो सीधे मेरे दिल से निकले हैं. मेरे आसपास जो दुनिया है, ये गीत मैंने वहीँ से उठाये हैं. इनमे मेरी माँ है, मेरी बहिन है, मेरी पत्नी है, मेरे बच्चे हैं.... मैं उन्हें जो देना चाहता हूं.. जो उनसे पाना चाहता हूं.. ये गीत वही हैं. वास्तव में ये गीत हमारे समाज के गीत हैं. हमारा परस्पर व्यवहार कैसा होना चाहिए, हमारे  अंतर्संबंध  कैसे होने चाहिए, यही मैंने अपने गीतों में कहा है. उन्होंने अपने गीतों का पाठ भी किया. सतीश सक्सेना ने कहा कि पारिवारिक स्नेह की कमी एवं असहिष्णुता हर जगह मुखर है , जिसे मेरी संवेदनशीलता अस्वीकार करती है ! आज के समय में भरे पूरे परिवार के होते हुए भी इसके सदस्य अपने आपको असुरक्षित  महसूस करते है , मेरे गीतों में सामाजिक मूल्यों में गिरावट पर ध्यान  खींचा गया है और कवि की यही वेदना इन गीतों में हर जगह मुखर होती है ! मेरी कामना है कि यह गीत, पाठक के परिवार के हर सदस्य का मन छुएं तो इनका लिखना सफल हो जाय !    

पुस्तक पर चर्चा करते हुए श्री अशोक गुप्ता ने कहा कि ब्लॉग और मूलधारा के साहित्य के बीच की दूरी कम हो रही है और ब्लॉग अभिव्यक्ति का नया मंच बन चुका है. ब्लॉग पर लिखे जाने वाले साहित्य को भी गंभीरता से लिया जा रहा है. 

हिंदी साहित्य में गीत विधा के महत्व और वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए डॉ भारतेंदु मिश्र ने कहा कि इस कठिन आर्थिक और उपभोक्तावादी समय में गीत विधा ही सहज और सरस रह गई हैं. गीतों की सरसता और सहजता ही इसे लोकप्रिय बनाती है और सतीश सक्स्सेना के गीतों में ये दोनों तत्व मौजूद हैं. डॉ. भारतेंदु मिश्र ने कहा कि जीवन और गीत एक जैसे हैं... भावो को जोडिये.. जो अधिक हो गया है उन्हें घटाइए...फिर जो सार बचे उसे गुणित कीजिये और फिर उसे बांटिये.... 

 नई कविता जब उन्मुक्त हो रही है तब जीवन और साहित्य दोनों में अनुशासन  की जरुरत बताते हुए डॉ. योगेन्द्र दत्त ने कहा कि सतीश सक्स्सेना के गीतों में विषय भी हैं और विविधता भी है. 

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि दुःख की पीड़ा वही बता सकता है जिसने उसे भुगता हो.. और सतीश जी के गीतों में वह पीड़ा अभिव्यक्त हुई  है. राजेंद्र अग्रवाल ने कहा कि भोजन के बाद सबसे जरुरी है पुस्तकें. पुस्तकें हमारे जीवन से कम हो रही है जो कि चिंता जनक है. "मेरे गीत की प्रशंसा  करते हुए उन्होंने कहा कि इस गीत में आम आदमी के भाव लिखे गए हैं. बेटों के लिए गीत, बेटियों के लिए गीत, माँ के लिए, पत्नी के लिए, बुजुर्गों के लिए... हमारे आसपास का संसार, जीवन इन गीतों में स्फुटित है. 

मीडिया गुरु डॉ अम्बरीश सक्सेना ने कहा कि पारंपरिक मीडिया और नए मीडिया में कोई टकराहट नहीं है और यही कारण है कि ब्लॉग से चल कर यह गीत पुस्तक के रूप में आई है. 

हिंदी नवगीत के वरिष्ठ गीतकार देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" ने दुःख जताते हुए कहा कि नई पीढी के साहित्यकार में अनुशासन  की कमी है और इस कारण से वे गीत के प्रति उन्मुख नहीं हो रहे क्योंकि गीत ह्रदय से लिखा जाता       है, इसमें शब्दों में  अनुशासन चाहिए और यह एक श्रम साध्य विधा है. मेरे गीत पर प्रकाश  डालते हुए कहा उन्होंने कि इस संग्रह में सतीश सक्स्सेना ने भाव प्रधान गीत लिखे हैं, जो बताते हैं कि वे सहृदय और सरल व्यक्तित्व के स्वामी  हैं. जितनी ईमानदारी से गीतों को लिखा गया है वह आज की पीढी में विरले ही मिलता है. 

ज्योतिपर्व से प्रकाशित एक और पुस्तक "खामोश, ख़ामोशी और हम" कविता संग्रह का विमोचन भी किया गया. इस संग्रह में १८ ब्लोगर कवियों की कवितायेँ संग्रहीत हैं. मीडिया गुरु डॉ.  अम्बरीश सक्सेना की उपस्थिति का मैं लोभ संवरण नहीं कर पाया और अपनी किताब "Management & Leadership Thoughts" का विमोचन भी करवा लिया। पूरा अवसरवादी ! 

ज्योतिपर्व प्रकाशन की ओर से श्रीमती ज्योति रॉय  ने साहित्यकारों का स्वागत पुष्पगुच्छ से किया. कार्यक्रम का  संचालन  मैंने स्वयं किया. 

कुछ चित्र विमोचन के अवसर के 
(चित्रकार : राजू )































मंगलवार, 12 जून 2012

लोकार्पण

मित्रो ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक "मेरे गीत" और "खामोश ख़ामोशी और हम" का लोकार्पण इस शनिवार को हो रहा है। कार्यक्रम संलग्न है। 
आप सादर आमंत्रित हैं। 
श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं। उनकी 50 से अधिक पुस्तकें जिनमे गीत, कविता, ग़ज़ल और आलोचना की पुस्तकें शामिल हैं, प्रकाशित हुई हैं और इससे कहीं अधिक पांडुलिपियाँ तैयार हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष श्री इन्द्र पर कम से कम 20 विद्यार्थियों ने शोध किया है। 
साहित्य के खेमेबाजी से दूर देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी पच्चासी वर्ष की आयु में भी साहित्य साधना में जुटे हुए हैं और लगातार हिंदी, उर्दू और संस्कृत में सामान अधिकार से सृजन कर रहे हैं। 
लोकार्पण और गोष्ठियों जैसे साहित्यिक उत्सवो से दूर रहने वाले देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी आधुनिक कविता को गीत हन्ता की संज्ञा देते हैं क्यों आज की अधिकांश कविता में उन्हें साधना, भाव और उद्देश्य की कमी लगती है। "मैं शिखर पर हूँ" उनका प्रसिद्द गीत संग्रह है। 

हिंदी में गीत की स्थिति और सतीश सक्सेना जी की पुस्तक "मेरे गीत" पर उन्हें देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" को सुनना एक अनोखा अवसर होगा।  मैं ज्योतिपर्व प्रकाशन के लिए एक सुयोग और भाग्य का विषय मान रहा हूँ की श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी हमारे कार्यक्रम में आने के लिए राजी हुए हैं। 

इन्द्र जी का एक प्रसिद्द गीत आप भी पढ़िए.... 

केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं

"हम जीवन के महाकाव्य हैं
केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं।
         कंकड़-पत्थर की धरती है
         अपने तो पाँवों के नीचे
         हम कब कहते बन्धु! बिछाओ
         स्वागत में मखमली गलीचे
रेती पर जो चित्र बनाती
ऐसी रंग-तरंग नहीं है।
         तुमको रास नहीं आ पायी
         क्यों अजातशत्रुता हमारी
         छिप-छिपकर जो करते रहते
         शीतयुद्ध की तुम तैयारी
हम भाड़े के सैनिक लेकर
लड़ते कोई जंग नहीं हैं।
         कहते-कहते हमें मसीहा
         तुम लटका देते सलीब पर
         हंसें तुम्हारी कूटनीति पर
         कुढ़ें या कि अपने नसीब पर
भीतर-भीतर से जो पोले
हम वे ढोल-मृदंग नहीं है।
         तुम सामुहिक बहिष्कार की
         मित्र! भले योजना बनाओ
         जहाँ-जहाँ पर लिखा हुआ है
         नाम हमारा, उसे मिटाओ
जिसकी डोर हाथ तुम्हारे
हम वह कटी पतंग नहीं है।"


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गुरुवार, 24 मई 2012

रुपया


१. 
रुपया 
गिर रहा है
लगातार
होकर कमजोर 
वह रुपया जो
आम जनता की जेब में
नहीं है, फिर भी
रोटी आधी हो रही है
नमक कम हो रहा है
उसकी थाली से,
फिसल रहा है 
उसकी जेब से 

२.
रूपये  से
खरीदना  है
पेट्रोल, गाड़ियाँ
कपडे, घड़ियाँ
टीवी, इंटरनेट,
हवाई जहाज़ और उसकी टिकटें
ई एम आई और क़र्ज़ 

आत्मनिर्भरता नहीं
खरीद सकता 
अपना रुपया 

सोमवार, 21 मई 2012

माल रोड, शिमला



गोरखा युद्ध से लौटे
अपने सेनापति के लिए
ब्रिटिश साम्राज्य का
उपहार था शिमला
जिसे कालांतर में बनाई  गई 
गुलाम भारत की  ग्रीष्मकालीन राजधानी

कहा जाता है
कालों को अनुमति नहीं थी
माल रोड तक पहुचने की
और गुलामी का प्रतीक
माल रोड शिमला में
अब भी पाए जाते हैं कुली
जो अपनी झुकी हुई पीठ पर
लादते हैं अपने से दूना वज़न तक
जीवन रेखा हैं ये
इस शहर की

पीठ पर
लाते हैं उठा
माल रोड की चमक दमक
रौनक
और किनारे पडी
किसी लकड़ी की बेंच के नीचे बैठ
सुस्ताते पाए जाते हैं
आँखों में सन्नाटा लिए


आँखे नहीं मिलाते हैं
ये कुली
क्योंकि झुकी हुई पीठ से
आदत हैजमीन को देखने की
ख़ुशी से भरे चेहरों के बीच
अकेले होते हैं
ये कुली

जब भी आता है 
जिक्र
माल रोड या  शिमला का
नहीं होता है जिक्र  पीठ पर वजन उठाये
इन कुलियों का
इस चमक के पीछे
घुप्प अँधेरा होता है
इनकी जिंदगी में

दासता के पदचिन्ह
और गहरे होते जाते हैं
जब भी उठाते हैं
अपनी पीठ पर वजन
और मापते हैं पहाड़ की ऊंचाई,
ये कुली.

शुक्रवार, 11 मई 2012

मित्रों !
एक वर्ष पहले प्रकाशन शुरू करने का विचार आया था. वह विचार कम और उत्साह अधिक था. कोई योजना नहीं थी. संसाधन नहीं था. बस था तो उत्साह. शायद पहला प्रकाशक हूं जिसने पहले विश्व पुस्तक मेले में स्थान लिया था और कोई प्रकाशित पुस्तक नहीं थी. केवल योजना थी. सपने थे. 


फिर विश्व पुस्तक मेला भी आया और साथ में करीब दस पुस्तकें. आदरणीय रश्मि प्रभा जी ने सबसे पहले भरोसा  जताया, मौका दिया और विश्व पुस्तक मेले के बड़े मंच पर आठ पुस्तकों का भव्य विमोचन हुआ था. पहली बार ब्लॉग और सहित्य जगत के लोग एक साथ एकत्रित हुए थे. ज्योतिपर्व प्रकाशन एक पुल का कार्य किया था. कुछ ऐसी घटनाएँ हुई कि मन खिन्न हुआ. कोशिश तो हौसला पस्त करने की हुई, लेकिन असफल. हाँ गति थोड़ी कम हुई, खैर जीवन का एक रंग यह भी है.



१२-१७ मई तक शिमला में पुस्तक मेला हो रहा है. नेशनल बुक ट्रस्ट का आयोजन है यह. इस बीच ब्लॉग के लोगों के साथ जो सफ़र शुरू हुआ था उसे हिंदी साहित्य जगत के स्थापित हस्ताक्षरों ने एक नया लक्ष्य दिया और बहुत गर्व है कि मेरी प्रिय कथाएं सीरिज़ के अंतर्गत संजीव, स्वयंप्रकाश और विजय जी का संग्रह प्रकाशित हो गया है. इसी बीच हिंदी की स्थापित कथा लेखिका कुसुम भट्ट जी का संग्रह "खिलता है बुरांश" भी प्रकाशित हो गया है. इसके अतिरिक्त देव प्रकाश चौधरी की ओसामा बिन लादेन के जीवन पर आधारित किताब "एक था लादेन"  भी प्रकाशित हो गया है. ज्योति  रॉय   का एक संकलन "प्रसिद्द बाल कवितायेँ" भी छप गया है. इसमें हिंदी की प्रसिद्द बाल कवितायेँ संकलित हैं.
अँधेरे के बाद रौशनी का आना तय है. यह उस एक फ़ोन काल से आभास हुआ जब सलिल वर्मा (चला बिहारी ब्लोगर बनने) ने कहा कहा कि सतीश  सक्सेना जी (मेरे गीत ब्लॉग) मुझ से प्रभावित हैं और बात करना चाहते हैं. सतीश जी से मिलकर लगा कि मुझे एक बड़ा भाई मिल गया हो. मेरे प्रयास को देख वे इतने अभिभूत थे कि मेरा आत्मविश्वास दुगुना नहीं बल्कि कई गुणा हो गया. इसी उत्साह में एक माह से भी कम समय में ही सतीश जी के कर्णप्रिय मधुर गीतों का संग्रह "मेरे गीत:" भी प्रकाशित हो गया. उनका व्यवहार, उनका स्नेह, उनकी ओर से मिली आत्मीयता के लिए कोई भी शब्द कम है.




 मेरा विश्वास है कि मेरे गीत  के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में गीत विधा को नया जीवन मिलेगा।
गीतों का दौर फिर से लौटेगा. बच्चन और नीरज के युग की याद आएगी  इन गीतों को पढ़ कर. 

शिमला पुस्तक मेला जा रहा हूं. आप सबके स्नेह और शुभकामना के संग.
आप सबको आमंत्रण है.


बुधवार, 9 मई 2012

सूखे खेत की मेड़ पर



बैठ सूखे खेत की  मेड़  पर
घड़ियाँ टिक टिक नहीं करती
समय ठहर जाता है
आँखों के सूनेपन के भय से

यहाँ से
आसमान का रंग
दिखता है काला
लेकिन बादलों से भरा नहीं

चिड़िया लौट जाती  हैं
भूखे पेट
थके हुए डैने लेकर और
चूहों के बिल
खाली रहते हैं
आँगन के पसरे सन्नाटे की तरह
किसान के अनाजघर की तरह

सूखे खेत की  मेड़ पर
नहीं उगती  दूब
खर या पतवार भी

समय ठहर जाता है यहाँ .

शनिवार, 5 मई 2012

हथेलियां



१.
रेखाएं जो नहीं होतीं
तो भी
लोग प्यार करते
अपनी हथेलियों को

२.
हथेलियों को
साथ लाने से बनती है अंजुरी
चाहो तो रखा जा सकता है
समंदर का पूरा जल
वितान का विस्तार
उतना ही प्यार

३.
कुछ हथेलियों में होते हैं
कोयला, पत्थर, ईंट, सीमेंट,
मशीन के हत्थे के निशान
लोग संभाल कर
संजोते हैं उन्हें
किसी डिग्री या
प्रमाण पत्र की तरह

बुधवार, 2 मई 2012

सुकमा





१.
मैं
भारत के भूगोल का
नहीं था हिस्सा
कल तक
आज भी  बस
'खबर' में हूं


२.
प्रधानमंत्री के नाम से
चलती है कोई
'ग्रामीण सड़क योजना '
दशक हुए
पहुंची नहीं
हमारे यहाँ


३.
घने जंगल के बीच
कोई मानव बसता है
अक्सर
भूल जाता है
तंत्र


४.
आज
सोचा जा रहा है
सुकमा के बारे में भी
अच्छा लग रहा
(दुःख भी हो रहा है)
प्रश्न है कि
पहले क्यों नहीं !