गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

गृहस्थी : कुछ क्षणिकाएं




१,
आटा 
थोडा गीला
फिर भी गीली
तुम्हारी हंसी

२.
मैं 
तुम 
बच्चे , 
गीले बिस्तर की गंध 
कितनी  सुगंध 

३.
न कभी 
गुलाब 
न कोई 
गीत 
फिर भी जीवन में 
कितना संगीत 

४.
सूखी रोटी
नून 
और तेरा साथ , 
आह ! कितना स्वाद 

५.
तीज 
त्यौहार पर 
तेरा उपवास 
गरीबी को छुपाने का 
अदभुत प्रयास 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

खलिहान


धान कट कर 
आ रहे हैं खेतो से 
नहीं है खेत में 
मजूरन की लहक चहक 
वे गा नहीं रही हैं गीत
दूर कहीं सुन सकते हो
कोई गा रहा है शोक गीत 

दौनी हो रही है  
धानो की 
नहीं है लेकिन 
बैलो के गले में घंटियों का 
समवेत स्वर

किसान और उसकी औरतें व्यस्त नहीं हैं 
व्यस्त है ट्रैक्टर 
और उसके इंजन के शोर और बड़े पहियों के बीच 
दब गया है 
किसान, मजूर और खलिहान ! 

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

दीपावली : कुछ चित्र

१.

महानगर की
लालबत्ती पर
कटोरे में 
लक्ष्मी गणेश की मूर्ति लिए
एक करीब सात साल का लड़का 
ठोक रहा है बंद शीशा
मना रहा है दीपावली 

२.
दीपावली पर
हार्दिक शुभकामना के कार्ड 
छापते छापते
सोया नहीं है वह
पिछले कई रातों से
आँखें दीप सी चमक रही हैं
ओवर टाइम के रुपयों को देख 
आज सोयेगा मन भर 
पटाखों के शोर के बीच 
मनायेगा दीपावली 

मिठाई के डब्बे पर 
चढाते चढाते
चमकीली प्लास्टिक की पन्नी
आँखों के चमक भी 
हो गईं हैं प्लास्टिक सी 
अब नहीं देखता है वह
सामने खड़े ग्राहक की ओर
वह तो मनाता है दीपावली 
दशहरा, तीज, करवाचौथ को भी 

४.
गोबर से लीपे हुए आँगन में
माँ करती है इन्तजार
दीप जलते जलते 
बुझ जाता है
आधी रात के बाद

वर्षों से कई माएं मानती हैं
ऐसे ही दीपावली 
 

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

विज्ञापन बनाते हुए


वातानुकूलित
सम्मेलन कक्ष में
बनायी जाती है रणनीति
कैसे छला जाना है
संवेदनाओं को
व्यापक रूप से,
कहा जाता है
उसे 'ब्रीफ'


पहुंचना
होता है
हर घर की जेब तक
कहा जाता है
छूना है
दिलों को


करनी है
संबंधों की बात
दिखानी है
रिश्तों की अहमियत
वास्तव में
लक्ष्य है
इस फेस्टिव सीज़न
जमा पूंजी में सेंध


संस्कृति
और परम्पराएं
तो बस साधन हैं
साध्य है
असीम विस्तार
नए बाज़ार
नए एम ओ यू
कुछ विलय
कुछ अधिग्रहण

विज्ञापन बनाते हुए 
करने  होते  हैं  
कई कई समझौते
हर बार स्वयं से

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

मुट्ठी


उन्ही उँगलियों से 
बनती है मुट्ठी 
जिसके भीतर कसा होता है 
एक सरोकार 

मुट्ठी के लिए 
उँगलियों का होना उतना ही जरुरी है 
जितना कि होना सरोकार का 

और उनके एक होने का भी !

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

पेड़



पेड़ 
कटते हैं 
बनते हैं 
खिड़की, किवाड़ 
कुर्सी पलंग 
और धर्मशास्त्र रखने के लिए 
तख्त 

दंगा नहीं करते 
पेड़ कभी
कि रोपा था उसे किसी और धर्म के व्यक्ति ने 
और रखा जा रहा है 
किसी और धर्म का शास्त्र 

फिर भी पेड़ नहीं छोड़ता 
अपना धर्म ! 

सोमवार, 15 सितंबर 2014

पीले पत्ते



क्या पेड़ को 
महसूस होता होगा 
पीले पत्ते की कमी 
जो झड़ कर
पड़े हुए हैं नीचे 

नीचे पड़े हुए पत्ते 
कभी सोखते थे 
सूरज से रोशनी 
जड़ो से पोषण 
पेड़ के होने में 
था छोटा सा योगदान 
इन पीले पत्तों का 

प्रतिरोध भी तो नहीं करते 
ये  पीले पत्ते ! 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

हिंदुस्तान की राजधानी


हुज़ूर 
कहाँ है हिन्दुस्तान की राजधानी !

क्या कहा दिल्ली !
वही दिल्ली जहाँ देश भर से बिजली काट काट कर 
पहुचाई जाती है रौशनी 

वही दिल्ली न 
जहाँ तरह तरह के भवन हैं 
पूर्णतः वातानुकूलित 
करने को हिंदुस्तान और हिन्दुस्तानियों की सेवा 
हाँ उन्ही भवनो की खिड़कियों पर लगे हैं न शीशे 
जहाँ हिन्दुस्तान की आवाज़ न पहुचती है 

हुज़ूर यह नहीं हो सकती हिन्दुस्तान की राजधानी 

राजपथ पर चलते हुए जहाँ 
हीनता से ग्रस्त हो जाता है हिंदुस्तान 
लोहे के बड़े बड़े सलाखों से बने दरवाजों के उस ओर राष्ट्रपति 
अपने राष्ट्रपति नहीं लगते 
सुना है राजधानी में है कोई संसद
जिसकी भव्यता से हमारी झोपड़ी की गरीबी और गहरी हो जाती है 

ऐसी भव्य नहीं हो सकती हिन्दुस्तान की राजधानी 

यह वही दिल्ली हैं न 
जहाँ प्रधानमंत्री अक्सर गुजरते हैं 
और खाली कर दी जाती है सड़के 
ठेल ठाल कर उनके मार्ग से किनारे कर दिए जाते हैं हम 
कितना दूर है मेरा गाँव , देहात , क़स्बा 

क्या इतनी दूर हो सकता है हिंदुस्तान की राजधानी  ! 

सोमवार, 8 सितंबर 2014

विशेषण



यह समय 
विशेषण का समय है 

लिफ़ाफ़े पर शुद्ध लिखने से 
शुद्ध हो जाता है 
लिफाफे के भीतर का वस्तु 

प्रबुद्ध कहने से 
शहर के वे सब लोग प्रबुद्ध हो जाते हैं 
जो जुटते हैं तमाम समारोहों में 

नाम के पहले श्री लगा देने भर से 
"श्री" हो जाते हैं वे 
जिनके कुछ दांत खाने के हैं , कुछ दिखाने के 

आस्तीन में पाले होते हैं सांप 
वे महान कहे जाते हैं 
इन्ही विशेषणों के आधार पर ! 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

सूई-धागा




वह 
अब नहीं डाल पाती है 
सूई में धागा 
आँखे कमजोर हो गई हैं 
उम्र के साथ 
दूर तक नहीं देख पाती 
पास का भी 
नहीं दीखता उसे स्पष्ट

उधड़े रिश्तो को 
कैसे सिले वह ! 




गुरुवार, 4 सितंबर 2014

हताश


दरवाज़े हैं 
बंद 
खिड़कियों पर 
मढ़ दिए गए हैं
शीशे 

हवाओं के लिए भी 
नहीं है 
कोई सुराख़ 

आसन्न है 
अंत !

बुधवार, 3 सितंबर 2014

नदी और पुल से फेंके गए सिक्के






एक छोटी नदी 
बहती थी मेरे गाँव  के  पास से 
कई नाम थे उसके 
मेरे गाँव में आने से पहले 
कमला थी वह 
मेरे गाँव से गुज़र जाने के बाद 
बलान हो जाती थी 
कोसी में मिलने के समय उसका नाम होता था 
करेह 

इस नदी में चलती थी नाव 
नहाती थी भैंसे 
विसर्जित होती थी प्रतिमाएं 
फेंके जाते थे जाल मछलियों के लिए 
और पुल से कूद जाती थीं लडकियां कभी कभी 
जो मिल जाया करती थी गंगा मैया से 

बूढ़ी औरते इस छोटी नदी को समझती थी 
सिमरिया वाली गंगा 
और पुल से फेंकती थी सिक्के 
पहले पांच के, दस के, बीस पैसो के  
फिर चवन्नी, अठन्नी, 
और इन दिनों फेंकती हैं 
रूपये, दो रूपये और कभी कभी पांच रूपये के सिक्के भी 
मन ही मन बुदबुदाती हुई कुछ 

मैं बचपन से सोचता रहा 
नदी कैसे बनती है 
कैसे बहती है 
कैसे अप ने  पेट मे रखती है 
मछलियाँ, कूदी हुई लड़कियों के राज़ 
और पुल से फेंके गये सिक्के 
प्रार्थनाओं के संग 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कलवर्ट



गाँव के बाहर 
हुआ करता था 
एक कलवर्ट 
जिसके नीचे से बहता था 
ऊंचाई से नीचे की ओर 
बारिश का पानी 
इसपर बैठ होती थी बहसें 
सुना जाता था कभी 
रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री 

यही बैठ जो कभी रटते थे 
रसायन विज्ञान के सूत्र 
अफसर बन चले गए 
राजधानी की ओर 
और लौटे नहीं फिर कभी 
कलवर्ट पर. 

कलवर्ट 
आज अकेला जोहता है बाट 
कोई आये 
करे बहस, सुने कमेंट्री 
रटे रसायन के सूत्र 
इसके नीचे से बहे 
ऊंचाई से नीचे की ओर पानी 

किन्तु क्या प्रयोजन है कलवर्ट का 
जब बह रहा हो पानी 
नीचे से ऊपर की ओर चारो तरफ 
कलवर्ट का एकाकीपन पसर रहा है 
गाँव गाँव घर घर ! 

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

आग

तुम्हे सोचते हुए 
मुझे याद आती है 
आग 
जो पकाती है रोटी, 
सुलगाती है बोरसी 
और 
अकेले होती है 
बुझ जाने के बाद 

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

कच्ची सड़क

कच्ची सड़को को छोड़ 
जब चढ़ता हूँ 
पक्की सड़क पर 
पीछे छूट जाती है 
मेरी पहचान 
मेरी भाषा 
मेरा स्वाभिमान ! 

कच्ची सड़क में बसी 
मिटटी की गंध से 
परिचय है वर्षो का 
कंक्रीट की गंध 
बासी लगती है 
और अपरिचित भी 

अपरिचितों के देश में 
व्यर्थ मेरा श्रम 
व्यर्थ मेरा उद्देश्य 
लौट लौट आता हूँ मैं हर बार 
पीठ पर लिए चाबुक के निशान 
मनाने ईद , तीज , त्यौहार 

कहाँ मैं स्वतंत्र 
मैं हूँ अब भी गुलाम 
जो मुझे छोड़नी पड़ती हैं 
कच्ची सड़क !




मंगलवार, 26 अगस्त 2014

औसत बारिश



मेरे गाँव में 
बारिश नहीं हुई 
जब रोपनी हो रही थी 
धान की 

फिर आया 
भीषण बाढ़ 
मेरे गाँव में 
और बह गया 
रहा-सहा धान 

तब भी बारिश नहीं हुई 
जब फूटना था 
बाढ़ से बचे हुए धानों को 

जैसे तैसे धान फूटे 
और कटनी के समय 
बादल बरसा खूब 
मेरे गाँव में 

इण्डिया गेट पर तब 
नहाये खूब बच्चे 
भीगे रूमानी मौसम में खूब जोड़े 
अखबारों ने छापे 
हरे भरे, साफ़ सुथरे वृक्षों के चित्र 
जब माथे पर हाथ धरे 
रो रहे थे मेरे गाँव के किसान 
मौसम विभाग ने बुलाकर प्रेस कांफ्रेंस कहा 
इस साल भी हुई औसत बारिश 

मेरा खलिहान रहा खाली 
जिसका जिक्र नहीं होगा 
किसी रिपोर्ट में ! 

रविवार, 24 अगस्त 2014

बर्गर, बगोदर और ब्रह्मपुत्र



राजधानी के मेट्रो रेल के 
वातानुकूलित स्टेशन पर 
देर रात लौटते हुए 
किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के 
मझौले स्तर का कामगार 
कर रहा होता है चर्चा अपने सहयोगी से
बेमौसम बारिश में 
ठंढ के लौटने की 
खाते हुए बर्गर 
ठीक उसी समय मेरे गाँव में एक किसान 
कोस रहा होता है बेमौसम बारिश को 
जिसने तोड़ दी हैं गेंहूं की पकी हुआ बालियां 
और ब्रह्मपुत्र घाटी से आई हुई एक  लड़की 
खो देती है अपनी अस्मिता 
इसी शहर के रौशनी भरे  सड़को के अँधेरे में  

यह समय रहा होगा 
जब पुलिस के छापे में 
पकड़ा गया एक नौजवान 
जिसकी धसी हुई आँखे लाल लाल थी 
बगोदर (झारखंड का एक शहर) में 
चुराते हुए कोयला 
उसके पास बरामद हुआ था 
एक थैले में देशी शराब 
जो वह कोयला डिपो के कर्मचारी को देता था 
घूस के तौर पर 
उस पर लगा दी गई हैं कई गैर जमानती धाराएं 

उसी समय एक मजदूर कुचला जाता है 
एक महँगी गाड़े से 
जो लौट रहा होता है अपने घर 
चौदह घंटे की नौकरी के बाद 
टूटी हुई साइकिल पर 
तोड़ देता है वह दम 
सरकारी अस्पताल के गेट पर 
शिनाख्त नहीं हो पाती है 
उस मजदूर की .   

खाते हुए बर्गर वही  युवक 
कर रहा होता है ट्वीट अपनी चिंताएं
मौसम के बारे में, 
लड़कियों की सुरक्षा के बारे में 
गरियाते हुए नक्सलियों को
तबतक डाउनलोड हो चुका होता है उसके स्मार्ट फोन पर 
एक और ट्रिपल एक्स फिल्म  

उसके भूगोल में नहीं है बगोदर या ब्रह्मपुत्र 
वह जानता है शहर के तमाम बर्गर आउटलेट्स ! 

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

नए नए अवतार



सड़के 
अबकी बार बन जाएँगी 
हर हाथ को मिलेगा रोजगार 
नहीं होंगे दंगे 
बढ़ेगा कारोबार 
आसमान से उतर रहे हैं 
नए नए अवतार 


स्कूल नए खुलेंगे 
नए खुलेंगे कालेज 
जो बीत गया उसको भूलो 
चुनो नया सरकार 
आसमान से उतर रहे हैं 
नए नए अवतार 

धुले पूछे आये हैं सब 
जनता के सेवक सच्चे 
अपराधी नहीं है कोई 
नहीं कोई गुनहगार 
आसमान से उतर रहे हैं 
नए नए अवतार 

देखना अपनी जाति 
छोड़ना न धर्म 
शहर गाँव और रंग को 
बनाना अपना आधार 
आसमान से उतर रहे हैं 
नए नए अवतार 

जलीय कीट

ए. के. रामानुजम की कविता "दी स्ट्राईडर्स" का अनुवाद - जलीय कीट बाकी सब कुछ छोडिये  कुछ पतले पेट वाले  बुलबुले सी पारदर्शी आँख...