गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

सहिष्णु देश का नागरिक



मैं कभी भी 
मारा जा सकता हूँ 

कभी भी कोई आकर 
भोंक सकता है मुझे 
त्रिशूल 
कोई खदेड़ कर मुझे 
कर सकता है 
तलवार आर पार 
कोई मुझे 
शूली पर चढ़ा सकता है 
कभी भी 
या फिर 
गाडी में बंद कर 
फूंक सकता है 
भीड़ के साथ 

मैं नागरिक हूँ 
एक सहिष्णु  देश का 

मेरे गाँव को 
साफ़ किया जा सकता है 
गोमूत्र से 
शुद्धि की जा सकती है 
गंगाजल से 
और इस विधान से शुद्ध  गाँव में 
दी जा सकती है किसी की भी बलि 
सामूहिक रूप से उत्सव के तौर पर 

एक बार मैं 
लटक  गया था खेतों के मेढ पर लगे पीपल से 
जब खड़ी फसल में लग गया था फुफूंद 
एक बार मैं 
रेल की पटरी पर सो  गया था 
जब बाढ़ बहा ले गई थी फसल 
एक बार रेत दिया गया था  मेरा गला 
सूदखोर महाजन के हाथों 
इसी सहिष्णु देश में 

मैं दब जाता हूँ पहियों के नीचे 
फुथपाथ पर सोते हुए 
जबकि वह पहिया कभी चला ही नहीं होता है 
या फिर कोई चला ही नहीं रहा होता है 
उस पहिये को 
मेरे बच्चे खदेड़ दिए जाते हैं न्यायलय से 
और न्याय की देवी मुस्कुरा रही होती हैं 
मूंदे आँखे इसी सहिष्णु देश में 


मेरी ही हड्डियां मिली हैं हर बार खुदाई में 
मंदिरों के प्रस्तर में /मंडियों की सीढ़ियों में 
राजदरबारों के प्रेक्षागृह में 
मैं ही हारा हूँ बार बार 
इस सभ्यता की यात्रा में सदियों से 


मैं नागरिक हूँ 
एक सहिष्णु देश का।  



9 टिप्‍पणियां:

  1. अरुण जी, अच्छी सोच है। बधाई। काव्य संकलन कब आ रहा है।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-12-2015) को "सहिष्णु देश का नागरिक" (चर्चा अंक-2188) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बेहद अच्छी और सामयिक रचना। सटीक लेखन के लिए बधाई ...

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  4. बेहद अच्छी और सामयिक रचना। सटीक लेखन के लिए बधाई ...

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  5. मैं नागरिक हूँ
    एक सहिष्णु देश का।


    गंभीर प्रस्तुति
    अच्छा बुरा सब कुछ है इस देश में.
    सहिषुणता व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर है.

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  6. एक आम नागरिक सब कुछ सहता है फिर भी उसे देश असहिष्णु नहीं लगता . काफी कुछ समेटा है इस कविता में .

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