मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

पतंगों की तरह

पतंगों की तरह उडती हूँ
आडम्बरों की डोर से बंधी
फरफराती हूँ
विकृत परम्पराओं के थपेड़ों से
कभी नीचे कभी ऊपर
मरती हूँ लोल
कसमसाती हूँ सदा तोड़ देने को
साड़ी जंजीरें
हो जाना चाहती हूँ मुक्त
बन्धनों से

पर
ज्यों ही नीचे देखती हूँ
भय होता है
भविष्य के प्रति
कटी पतंगों की तरह
कहीं फँस ना जाऊं
अपनों के ही वृत्त जाल में
या फिर
पिस ना जून
पुनः उसी समाज के हाथों
पतंगों कि तरह
जिसने उड़ाया है मुझको
आडम्बरों केई डोर में
बांध कर !

3 टिप्‍पणियां:

  1. "kasmatati hu sada tod dene ko saari janjeere"
    is kasmasahat ko mahsus kiya ja sakata hai,par ise tod dena bhi utana hi peeda dayak hai.sarthak rachana.

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  2. बहुत सुन्दर!!



    यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

    हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

    नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

    वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

    आपका साधुवाद!!

    नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

    समीर लाल
    उड़न तश्तरी

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