बुधवार, 13 जून 2018

निसीम एज़िकेल की कविता "दर्शन" का अनुवाद

निसीम एज़िकेल अंग्रेजी के महत्वपूर्ण कवि हैं . उनकी कवितायेँ दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं . उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है . उनकी कविता "दर्शन" का अनुवाद करने का दुस्साहस मैंने किया है . दर्शन एक जगह है जहां मैं अक्सर जाता हूं, योजना बना कर नहीं बल्कि स्वतः खिंचा चला जाता हूँ सभी अस्तित्व से दूर, अंतिम प्रकाश तक जिसका इच्छा अनियंत्रित है यहां, ईश्वर का सृजन कभी धीमा नहीं पड़ता सृष्टि के अलौकिक आभा, अपनी उत्कृष्टता प्रदर्शित करने के लिए होता हुआ विघटित असंख्य तारों को मिटा कर अदम्य उत्साह के साथ एक पल में घटित होता है समय की उदास आंखों में । लेकिन अर्थ के अवशेष अभी गढ़े जा रहे हैं अंधेरे मिथक दर्द के माध्यम से घूमते हैं प्रकाश के अंतिम सूत्र के लिए। मैं भी, दृष्टि की इस स्पष्टता को अस्वीकार करता हूं- जो समझाया नहीं जा सकता है, समझाओ मत। इंद्रियों की सांसारिक भाषा गाती है इसकी अपनी व्याख्याएं आम जन की बातें बनें, उनकी प्रज्ञा के आधार पर, उनकी नग्नता के खिलाफ एक तर्क वह जो सच्चाई का अन्वेषण करता है गति को प्राप्त होता है उसी की उदासीनता से ! मूल कविता अंग्रेजी में A prominent Indian English Poet Nissim Ezikiel's poem : Philosophy There is a place to which I often go, Not by planning to, but by a flow Away from all existence, to a cold Lucidity, whose will is uncontrolled. Here, the mills of God are never slow. The landscape in its geological prime Dissolves to show its quintessential slime. A million stars are blotted out. I think Of each historic passion as a blink That happened to the sad eye of Time. But residues of meaning still remain, As darkest myths meander through the pain Towards a final formula of light. I, too, reject this clarity of sight. What cannot be explained, do not explain. The mundane language of the senses sings Its own interpretations. Common things Become, by virtue of their commonness, An argument against their nakedness That dies of cold to find the truth it brings. ********

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपने रचना के साथ न्याय किया है ...
    इंग्लिश में कहीं कहीं राइम मिल रहा है जो शायद अनुवाद में सम्भव न हो ...
    मुझे ज़्यादा ज्ञान तो नहि अनुवाद के तरीक़े का पर ओवर आल अच्छा लगा पढ़ने के बाद ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (15-06-2018) को "लोकतन्त्र में लोग" (चर्चा अंक-3002) (चर्चा अंक 2731) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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