सोमवार, 28 मई 2018

उदास आसमान

 उदास है आसमान
क्योंकि नदी के पानी में 
फ़ैल गया है  जहर 

यह जहर धर्म का हो सकता है 
हो सकता है यह राजनीति का 
और हो सकता है विश्वासघात का 
जिसे पीकर चिड़ियों के पंख 
हो रहे हैं कमजोर 

यह जहर पैदा करता है भ्रम 
निर्णय की क्षमता होती जाती है 
कमजोर शनैः शनैः 
चिड़ियों को आभास भी नहीं होता 

कमजोर पंखों से चिड़ियाँ 
कहाँ छू पाती हैं आसमान 
आसमान रहता है उदास 
चिड़ियों के बिना 
जैसे उदास रहता है 
मरे हुए बेटों के बूढ़े माँ बाप के घर का दालान 
उदास है आसमान ! 

9 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अमर क्रांतिकारियों की जयंती और पुण्यतिथि समेटे आया २८ मई “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. इतना ज़हर और हर तरह का ज़हर पूरे आसमान को निराश कर रहा है ...
    समस्त प्राकृति को उदास कर रहा है
    बहुत गहरी रचना है ...

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (30-05-2018) को "किन्तु शेष आस हैं" (चर्चा अंक-2986) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  5. शिव बनाने का रियाज चल रहा है। सरकार संजीदा है। सुन्दर रचना।

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  6. सचमुच जहर है हवा में . अच्छी कविता

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