सोमवार, 10 सितंबर 2018

मौजूद रहेंगी ध्वनियाँ


एक दिन कुछ ऐसा होगा
मिट जाएगी पृथ्वी
ये महल
ये अट्टालिकाएं
ये सभ्यताएं
सब मिटटी बन जाएँगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

जब सब सागर
सूख जायेंगे
नदियाँ मिट जायेंगी
मछलियों की हड्डियां
अवशेष बचेंगी
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .


मनुष्य रहे न रहे
मनुष्यता उसमे बचे न बचे
फिर भी मौजूद रहेंगी
ध्वनियाँ .

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (11-09-2018) को "काश आज तुम होते कृष्ण" (चर्चा अंक-3084) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    उत्तर देंहटाएं
  2. मनुष्य रहे न रहे
    मनुष्यता उसमे बचे न बचे
    फिर भी मौजूद रहेंगी
    ध्वनियाँ .
    नश्वरता में अमरत्व की खोज , अति सुन्दर सृजन ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. जिंदादिल एहसासों को खूब पिरोया है!

    उत्तर देंहटाएं
  4. अवषेश में केवल बचती है ध्वनियाँ

    उत्तर देंहटाएं