छुपी है धूप है भर गया कोहरा
बिना ज़ुर्म के मैं बन गया मोहरा
जिम्मेदरियों ने मुझे झुकाया इतना
पीठ मेरा देखो, ऐसे हो गया दोहरा
नाराज हो जब, नदी बहाती भी है
जब भी धार पर लगाया गया पहरा
पहचानना कठिन है इन दिनों
किसने चेहरे पे है लगाया चेहरा
धर्म जाति का शोर हुआ इतना
न्याय औ' संविधान बन गया बहरा
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