शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

"कालाहांडी सिंड्रोम"

दाना मांझी अपनी मरी हुई पत्नी को लेकर दस किलोमीटर से अधिक चल लिया। चल लिया होगा। टीवी की मरीज़ उसका वजन ही कितना रहा होगा। ३०-३५ किलो। इतना लेकर वह चल लिया होगा। ठेंठ में पैसे नहीं रहे होंगे। घर पर भी पैसे नहीं रहे होंगे। और यदि रहे भी होंगे तो वह खर्च करने की बजाय बचाना बेहतर समझा होगा। और हमें इतना संवेदित होने की जरुरत भी नहीं है। हजारो नहीं लाखो दाना मांझी हैं हमारे आसपास। हमारी नजर कहाँ जाती है।
ये वही इलाका है न कालाहांड़ी। भूख, अकाल और बेबसी की हांडी। हमने कितनी बार खबर सुनी या पढ़ी है। कब किस अखबार ने कवर किया है काला हांडी को।
कालाहांडी और अकाल का पुराना इतिहास रहा है। कहा जाता है कि जैसे दस साल में सेंसस लौटता है आदमी के सिर गिनाने वैसे ही कालाहांडी में अकाल। अंग्रेजों के ज़माने में भी अकाल पड़ता था कालाहांडी में। आज़ादी के बाद भी पड़ते रहे अकाल। क्या बदला? बदलते रहे ओडिशा के मुख्यमंत्री, बदलते रहे देश के प्रधानमंत्री लेकिन कालाहांडी में कुछ नहीं बदला।
यदि आज आप संवेदित हैं दाना मांझी को लेकर तो हमें खुद पर शर्मिंदा होने के साथ ही अपने सिस्टम पर भी शर्मिंदा होने की जरुरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गाली देने के साथ साथ पिछले प्रधानमंत्रियों, गृहमंत्रियों, योजना आयोग के उपाध्यक्षों, ओडिशा के सभी मुख्यमंत्रियों, वहां के विधायकों और सांसदों को लानत भेजने की जरुरत है। देश को स्वतंत्र हुए सत्तर साल हुए हैं। कितने हे कलेक्टर आए होंगे, कितने ही अधिकारी आये होंगे। उन सबने क्या किया , यह भी पूछने की जरुरत है !
कालाहांडी पर लिखी कविता पर साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिल चुका है। लेकिन कालाहांडी की तस्वीर नहीं बदली। इकोनॉमिक्स के विद्यार्थियों के बीच "कालाहांडी सिंड्रोम" एक टर्मिनोलोजी है जिसका मतलब है "प्रचुरता के बावजूद भी भुखमरी". हम इसपर तो अध्यनन करते रहे लेकिन स्थिति नहीं सुधार पाए।
झारखण्ड और बिहार के कई इलाके कालाहांडी की तरह ही हैं मैं जानता हूँ जिन्हें। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पश्चिमबंगाल आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में भी होंगे। पूर्वोत्तर में भी होंगे और उत्तर में भी। लोग अपने जिन्दा या मुर्दा परिजनों को अस्पताल तक या अस्पताल से घर कंधे पर, बहँगी पर, खाट पर, साइकिल पर, रिक्शा पर , ठेला पर लाद कर लाते ले जाते हैं। हजारो गाँव हैं जहाँ सड़क ही नहीं है, एम्बुलेंस रहेगी भी क्या करेगी। देश में जहाँ डाक्टर नहीं हैं, अस्पताल नहीं हैं और यदि हैं भी तो काम नहीं करते, ऐसे में यदि हम लाशो के लिए एम्बुलेंस के बारे में सोचते हैं , तो निश्चित ही हमें देश के बारे में समझ नहीं है।
सुना है एक बार ओडिशा के मुख्यमंत्री इज़राइल गए थे अध्यनन के लिए कि कालाहांडी के अकाल को कैसे दूर किया जाए। कभी किसी पत्रकार भाई ने नहीं पूछा होगा कि उस अध्यनन का क्या हुआ ! खैर ! हाँ एक खबर यह है कि आज नवीन पटनायक की ओडिशा में "वर्ल्ड इन्वेस्टमेंट समिट" कर रहे हैं। इस खबर पर पानी फेर दिया दाना मांझी ने।
और सोचिये कि अकाल प्रदेश में कितने उम्मीद से "दाना" नाम रखा होगा उसके माता पिता ने।
जिस देश की जनता हिन्दू मुस्लिम के मुद्दे पर किसी से भी भेड बकरी की तरह हंका जाती हो , वहां दाना मांझी की खबर की उम्र कुछ घंटों से अधिक नहीं हो सकती।

10 टिप्‍पणियां:

  1. भीतर तक झकझोकरती पोस्ट । इस घटना ने सबको आइना दिखा दिया है

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    1. बहुत दिन बाद आये। अच्छा लगा।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-08-2016) को "माता का आराधन" (चर्चा अंक-2448) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. अपने आस पास के नंगे सच को छोड़ सब लगे हैं झूठ को ढूँड कर अलंकृत करने में कहाँ आँखे खोलनी हैं कहाँ बंद करनी है इसी में गीता का सार है । छोटी छोटी बाते हैं । ओलंपिक में मात्र दो मेडल इसके पीछे भी यही सोच है । दीमक हर जगह मौज कर रही है । क्या क्या कहा जाये । आप चिंघाड़ते रहिये सच को । सटीक लिखा है ।

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  4. झकझोड़ जाती है इस पोस्ट की सच्चाई ... इमानदारी ही पूरी इस पोस्ट में ...

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  5. ये डिजिटल युग है जहाँ संवेदना का कोई स्थान कहाँ ?

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  6. झकझोकरती है दिल को अंदर तक पर संवेदनाये मर चुकी है सब की

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