फोन आया है काकी का गांव से
इस बार अषाढ नहीं बरसा
खेत सब उपटे पडे हैं
इस बार आम भी नहीं फले थे
बिना खाद पानी के
काकी बता रही थी
इनार तो भर ही गया था
अब चापाकल भी छोड दिया है
पानी , सूख गया है .
हर घर 'नल से जल' वाला नल लग तो गया है
लेकिन पानी कब आयेगा नहीं पता
अभी तो गांव में टंकी भी नहीं बना है
मेरे साथ बचपन में जो लड्का
करता था नाटक, वह बऔरा गया है
पंचायत समिति का शिकायत कर दिया था
कहीं ऊपर और जांच बैठ गई
उसी समय कोई दारु में कुछ मिला के
पिला दिया उसको, कहते हैं लोग
काकी को नहीं पता है इसका पूरा सच
हाँ ये जरूर कह्ती है कि
मुखिया, काउंसिलर, पंचायत समिति का आदमी सब
चलने लगा है बलेरो से !
काकी कहती है
गांव में घर होना जरुरी है
साल में दू बार गांव आना जरुरी है
नहीं तो हो जाते हैं देवता पितर नाराज
और कहती हैं देना है पातैर (प्रसाद)
नये अन्न के आने पर
लेकिन अभी तक खेत रोपा नहीं गया
बरखा नहीं हई आषाढ में !