मंगलवार, 17 जुलाई 2018

भीड़

भीड़ जो कल
प्रतिरोध का विवेकपूर्ण यन्त्र था
आज  एक हथियार है
विध्वंसक
जो हत्या कर सकता है
विचारों का

भीड़ का कोई चरित्र नहीं होता
इसकी कोई नैतिकता भी नहीं
न ही कोई संविधान है इनका

भीड़ का कोई रंग नहीं होता
ये अपने ऊपर ओढ़ लेते हैं
गमछा सुविधा के रंग का
कभी भगवा, कभी हरा ,
कभी लाल तो कभी तिरंगा

यह एक षड़यंत्र  है सुनियोजित
अफवाहों की ईंधन इसे बना देती है
और भी हिंसक

हम सब होते जा रहे हैं
भीड़ के हिस्से

3 टिप्‍पणियां:

  1. गरमी बढ़ रही है ... भीड़ भी बढ़ रही है ...
    मुखिया कमज़ोर हो तो नियंत्रण नहि रहता ... तंत्र है भीड़ भी ...
    लाजवाब रचना अरुण की ...

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