बुधवार, 3 अक्तूबर 2018

गोल

ईश्वर ने
दुनिया गोल बनाई
उन्होंने सूरज को भी
गोल बनाया
चाँद भी गोल है
और जिसदिन दिखता  है पूरा गोल
लगता है वह सबसे सुन्दर

गोल चेहरा बच्चो का होता है
जब उनमे नहीं भरा होता है
दुनियावी बाते, झूठ और मक्कारी
घृणा और द्वेष
हिंसा, प्रतिहिंसा और क्रोध

जलते हुए दीप  की आभा भी
फैलती है गोलाकार में
सपनों का यदि कोई आकार होता तो
होता वह  वृताकार ही

रास्ते जो गोल चलते हैं
मंजिल की आपाधापी में नहीं रहते
ईश्वर की बनाई इस गोल दुनिया में
कहाँ रह गया है कुछ भी गोल ! 



9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-10-2018) को "छिन जाते हैं ताज" (चर्चा अंक-3115) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन देश की दूसरी महिला प्रशासनिक अधिकारी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  3. दीपोत्सव की अनंत मंगलकामनाएं !!

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