बुधवार, 5 अगस्त 2009

पच बजिया ट्रेन

बाबा लौट आते हैं दिशा मैदान से
पच बजिया ट्रेन से पहले

चौके में धुआं भर आता है
पच बजिया ट्रेन से पहले

बाबूजी खेत पहुँच जाते हैं
पच बजिया ट्रेन से पहले

भैंस पान्हा जाती है
पच बजिया ट्रेन से पहले

अखाडे में हलचल हो जाती है
पच बजिया ट्रेन से पहले

मन्दिर की घंटिया बज उठती हैं
पच बजिया ट्रेन से पहले

मस्जिद में अजान हो जाता है
पच बजिया ट्रेन से पहले

वहां ख़बर है की
अब पच बजिया ट्रेन नही चलेगी

यहाँ अलार्म क्लोक बजता है
नौ बजे...
अलार्म क्लोक से पहले यहाँ कुछ नही होता

7 टिप्‍पणियां:

  1. Effort is very sincere and sentimental one. This shows the writer's attachment to the train that regulates routine of life and has a symbolic importance to the rural folk.
    Imagery has nicely been woven to give body to the pain for losing a "regular presence" of something that becomes importantif continues..
    RAJIV

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. कल 28/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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