बुधवार, 19 अगस्त 2009

रोटी जीतती गई

मेरी
और रोटी की लडाई में
जीतती रही रोटी
दिनोदिन बड़ी होती रही यह
समय के साथ बदलती रही
कभी रंगीन तो कभी क्रिस्पी
कोकटेल डिनर से कांफ्रेंस सेमीनार तक
अलग अलग समय पर
अलग अलग तरह से
परोसी गई यह
रोटी का स्वाद भी बदलता गया
समय के बदलने के साथ
मेरी
और रोटी की लडाई में
जीतती रही रोटी


वह रोटी
जो कभी सामाजिक सरोकार थी मेरे लिए
वोह रोटी जो पूजा थी, मोक्ष का साधन थी
दान थी कल्याण थी
छिटक गई हाथों से
और ई ऍम आई , स्टेटस सिम्बल
और स्टेटस कांससनेस में बदल गई

अब
रोटी के पीछे भागता हूँ
मुहँ चिढा कर
स्वर्ण मृग बन
भगा रही है यह रोटी

मेरी
और रोटी की लडाई में
जीतती रही रोटी

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