शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

छिट फुट छोटी कवितायें


शब्द
अब नही होते
हरे
और जो हरा होता है
होता नही
जीवन

नुक्कड़ के पीपल पर
पीले अमरबेल की
हरियाली
देखने लायक हो गई है !


क्या आपने भी
महसूस किया है कि
किताबों
के जिल्द होने लगे हैं
खूबसूरत
और
भीतर के
पृष्टों का खालीपन
गूंजने लगा है !


मेरे बच्चे
नही चाहते
मम्मी पापा और अपने लिए
अलग अलग कमरा
परदे लगे बंद दरवाजे
वे चाहते हैं
खुली खिड़की
कि हवा पानी अन्दर आए और
सब मिलकर
गहरी नींद सोयें !

7 टिप्‍पणियां:

  1. तीनो रचनाएँ एक दूसरे से सर्वथा अलग और श्रेष्ठ...वाह...कितना कुछ बयां होता है इन चंद शब्दों में... कमाल का लेखन...
    नीरज

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  2. बहुत ही अच्छी लगी तीनो कविताएं ख़ास कर दूसरी बहुत पसंद आई बहुत से भाव आये इसको पढ़ कर ..शुक्रिया

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  3. नुक्कड़ के पीपल पर
    पीले अमरबेल की
    हरियाली
    देखने लायक हो गई है
    --
    भीतर के
    पृष्टों का खालीपन
    गूंजने लगा है !
    --
    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  4. मेरे बच्चे
    नही चाहते
    मम्मी पापा और अपने लिए
    अलग अलग कमरा
    परदे लगे बंद दरवाजे
    वे चाहते हैं
    खुली खिड़की
    कि हवा पानी अन्दर आए और
    सब मिलकर
    गहरी नींद सोयें !

    Tino rachnayein achhi lagin ....!!

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  5. teeno kshanikayen bahut hi achhi hain, kise rekhankit karun......shayed ise-
    क्या आपने भी
    महसूस किया है कि
    किताबों
    के जिल्द होने लगे हैं
    खूबसूरत
    और
    भीतर के
    पृष्टों का खालीपन
    गूंजने लगा है ! par teesri kshanika bhi kam nahin

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