शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

फिर भी



तोड़ दो 
मेरे हाथ 
क्योंकि ये 
लहराना चाहते हैं 
मुट्ठी 
तुम्हारे विरोध में 
उन सबके विरोध में 
जो हैं मिटटी, हवा के विरोध में 

तोड़ दो 
मेरी टाँगे 
क्योंकि ये 
चलना चाहते हैं 
संसद के दरवाज़े तक 
और खटखटाना  चाहते हैं 
बंद दरवाज़े 
जहाँ बन रहे हैं 
मेरे खिलाफ नियम 

मेरी जिह्ह्वा 
काट लो 
क्योंकि यह लगाना चाहती हैं 
नारे तुम्हारे खिलाफ 
तुम्हारी कुनीतियों के खिलाफ 
जो छीन रही रही 
मेरी ज़मीन , मेरे जंगल 
मेरे लोग 

मेरी आँखे 
फोड़ दो 
जो देखना चाहती हैं 
सत्ता से 
पूँजी की बेदखली 

फिर भी 
लहराएगा हाथ 
भिन्चेगा मुट्ठियाँ, 
कदमो के शोर से 
हिल देगा संसद का परिसर 
और बिना जिह्वा भी 
नारे से गूँज उठेगा 
राजपथ।  

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (06-10-2013) हे दुर्गा माता: चर्चा मंच-1390 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ऐसा सैलाब रोके नहीं रुकता.....
    बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

    अनु

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  3. नवरात्रि की शुभकामनायें-
    सुन्दर प्रस्तुति है आदरणीय

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  4. " राज करते-करते शासन दुशासन हो गया मिश्र जैसा महौल आज भारत में आया है ।" सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।

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  5. भई वाह ,
    सड़ी गली व्यवस्था का विरोध कैसे हो ?

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  6. व्यवस्था खराब हो तो विरोध होना ही चाहिए...!
    नवरात्रि की बहुत बहुत शुभकामनायें-

    RECENT POST : पाँच दोहे,

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  7. ये साहस बरकरार रहे तो थरथरा सकता है पूरा पथ ...
    मन के आक्रोश को शब्द देने के कला बाखूबी है आपमें अरुण जी .... बहुत प्रभावी रचना ...

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