बुधवार, 6 नवंबर 2013

जब कोई मरता है



जब कोई मरता है 
मैं चाहता हूँ 
खा लूं भर पेट भात 
डरता हूँ मैं 
मरने से 

जब कोई मरता है 
मैं चाहता हूँ 
उतार कर फेंक दूं 
अपने सारे कपडे 
नंगा हो जाऊं 
डरता हूँ मैं 
भार से 


जब कोई मरता है 
मैं चाहता हूँ 
मुनादी करवा दूं 
गाँव गाँव 
शहर शहर 
डरता हूँ मैं 
कहीं लौट न आये वह 

किसी के मरने से 
बहुत खुश होता हूँ मैं 
क्यूँ कि 
मरने वाला नहीं लौटेगा 
वसूलने उधारी 
सलटाने बकाया हिसाब 




12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार को (04-11-2013) "दिमाग का फ्यूज़" (चर्चा मंच 1422) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. Aaj ke HORI ka badalta manovigyan. Darta hoon, jis peshe mein hoon, pata nahin kitne Hori hamare marne ki duaa maangte honge!!
    Hamesha ki tarah lajawab!!

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  3. बहुत ही प्रभावी ... मार्मिक और संवेदना से भरपूर ... भूखे पेट, धंसी आँखों के दोनों काम किसी एक के मरने से पूरे हो जाते हैं ... गहरी सोच ...

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  4. कभी कभी आत्माऐं मांगने आ जाती है उधारी :)
    बहुत खूब !

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  5. गहरी सोच बहुत ही प्रभावी प्रस्तुति

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  6. बहुत खूब !खूबसूरत रचना,। सुन्दर एहसास .
    शुभकामनाएं.

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  7. बहुत उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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