गुरुवार, 28 अगस्त 2014

कच्ची सड़क

कच्ची सड़को को छोड़ 
जब चढ़ता हूँ 
पक्की सड़क पर 
पीछे छूट जाती है 
मेरी पहचान 
मेरी भाषा 
मेरा स्वाभिमान ! 

कच्ची सड़क में बसी 
मिटटी की गंध से 
परिचय है वर्षो का 
कंक्रीट की गंध 
बासी लगती है 
और अपरिचित भी 

अपरिचितों के देश में 
व्यर्थ मेरा श्रम 
व्यर्थ मेरा उद्देश्य 
लौट लौट आता हूँ मैं हर बार 
पीठ पर लिए चाबुक के निशान 
मनाने ईद , तीज , त्यौहार 

कहाँ मैं स्वतंत्र 
मैं हूँ अब भी गुलाम 
जो मुझे छोड़नी पड़ती हैं 
कच्ची सड़क !




14 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ, बहुत कुछ छूटता है .... उत्कृष्ट बिम्ब ....

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. कहाँ मैं स्वतंत्र
    मैं हूँ अब भी गुलाम
    जो मुझे छोड़नी पड़ती हैं
    कच्ची सड़क !
    ...बहुत कुछ छूट जाता है कच्ची सड़क के साथ...सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  4. कच्ची सड़क को दिल में रखते हुए जब हम पक्की सड़क पर चढ़ते हैं तो विकास की ओर भी बढ़ते हैं और जड़ों से भी जुड़े होते हैं। दोनों जरूरी हैं।

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    1. लेकिन ऐसा हो न पाया है। कच्ची सड़क और पक्की सड़क के बीच बहुत बड़ी खाई है। इन दोनों सड़को को केवल सड़क न समझे !

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  5. जब भी हम पक्की सड़क पर चलते हैं ,अपने आपसे दूर होते हैं । हम सचमुच अपनेआप से दूर हो रहे हैं किसी अनिश्चित दिशा की ओर । अच्ची भावपूर्ण रचना ।

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  6. जब भी हम पक्की सड़क पर चलते हैं ,अपने आपसे दूर होते हैं । हम सचमुच अपनेआप से दूर हो रहे हैं
    ............गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी सहमत हूँ आप की बातों से


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  7. कच्ची सड़क पर दिल है , पक्की पर दिमाग.

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  8. कितना कुछ खो देते हैं कुछ पाने के लिए उस पक्की सड़क को ...

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  9. कच्ची सड़क से त्यौहार मनाने का रिश्ता बच रहा ..चलो इतना भी बहुत है ..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  10. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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