सोमवार, 10 नवंबर 2014

खलिहान


धान कट कर 
आ रहे हैं खेतो से 
नहीं है खेत में 
मजूरन की लहक चहक 
वे गा नहीं रही हैं गीत
दूर कहीं सुन सकते हो
कोई गा रहा है शोक गीत 

दौनी हो रही है  
धानो की 
नहीं है लेकिन 
बैलो के गले में घंटियों का 
समवेत स्वर

किसान और उसकी औरतें व्यस्त नहीं हैं 
व्यस्त है ट्रैक्टर 
और उसके इंजन के शोर और बड़े पहियों के बीच 
दब गया है 
किसान, मजूर और खलिहान ! 

7 टिप्‍पणियां:

  1. किसान और उसकी औरतें व्यस्त नहीं हैं
    व्यस्त है ट्रैक्टर
    और उसके इंजन के शोर और बड़े पहियों के बीच
    दब गया है
    किसान, मजूर और खलिहान !
    ..सच फिर से वह समय देखने को अब ऑंखें तरस कर रह गयी ...
    ..सुन्दर यादगार प्रस्तुति

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-11-2014) को "नानक दुखिया सब संसारा ,सुखिया सोई जो नाम अधारा " चर्चामंच-1795 पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. विकास या कुछ और ...
    किसकी आहट है ये क्या पता ...

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  4. आपने खेती के बदलते चेहरे को बहुत सच्चाई से सामने रखा है। मैं आपकी पंक्तियाँ पढ़ते हुए पुराने खेतों की आवाज़ें याद करता हूँ। पहले मैं बैलों की घंटियाँ और मजूरन के गीत सुनता था, अब मैं सिर्फ ट्रैक्टर का शोर सुनता हूँ। आपने इस बदलाव का दर्द सीधे शब्दों में दिखाया है।

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