सोमवार, 5 अक्तूबर 2015

एक दिन जिसकी गिनती नहीं




हर दिन 
जीवन में गिनी ही जाए 
होता है क्या 
और यह जरुरी भी तो नहीं 

हर आदमी 
जीवन में रखता हो महत्व 
ऐसा भी तो नहीं होता 
और यह भी तो जरुरी नहीं 

यह भी तो हो सकता है कि 
जिसे आप गिनते हो आदमी में 
वह आदमी ही न हो 
या वह दिन जो आप बिता चुके हैं 
वह दिन न रहा हो 

कितने ही दिन भूखे गुज़र जाते हैं 
गुज़र जाते हैं प्यासे कितने ही दिन 
कितने ही दिन भय की छाया में ख़ाक हो जाते हैं 
तो कितने ही दिन मिटटी में दब का घुट जाते हैं 
और आदमी भी 

कल एक दिन गुज़र गया 
एक भीड़ ने एक आदमी को मार दिया 
एक आदमी ने एक लड़की तो तार तार कर दिया 
एक लड़की ने एक तितली को पकड़ तोड़ दिए उसके पंख 
एक तितली फूल से चुरा ली थोड़ी खुशबू 

यह थोड़ी खुशबू ही ज़िंदा रखे हुए है इस धरती को
और गिनती नहीं होती खुशबूओं की।  

8 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, संत कबीर के आधुनिक दोहे - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. जरूरी कुछ भी नहीं ।
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  3. यह थोड़ी खुशबू ही ज़िंदा रखे हुए है इस धरती को
    और गिनती नहीं होती खुशबूओं की।
    ...बिलकुल सच...दिल को छूती बहुत ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति...

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  4. बहुत सुंदर अभिब्यक्ति । मेरी ब्लॉग पैर आप का स्वागत है ।

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  5. बहुत सुन्दर शब्द रचना........... बधाई
    http://savanxxx.blogspot.in

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