बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

पूजा पंडाल से



मूर्तियां सजी हैं 
सजी हैं स्त्रियां
लड़कियां भी सजी हैं 
और सजे हैं बच्चे भी 

रंग अलग अलग 
और एक रंग सब में एक सा 
छोड़ दुखो के दैनिक रंग को 
उत्सव का रंग ओढ़ 
सजी हैं स्त्रियां, लड़कियां और बच्चे 
मूर्तियां स्थिर हैं 

बज़ रहे हैं ढोल ढाक 
नाच रहे हैं पुरुष 
नाच रही हैं स्त्रियां 
 नाच रहे हैं बच्चे 
आरती के धुएं से 
नहीं  होती दूषित हवा 

बिक रहे हैं 
तीर धनुष 
 बिक रहे हैं 
गदा तलवार 
बिक रही हैं 
जलेबियाँ गोल गोल 
गोल गोल घूम रहे हैं 
झूले, घोड़े , मोटर 
धरती की गति को भूल 
भूल दैनिक झंझावातों को 
खरीद रहे हैं लोग उत्सव 

मूर्तियां अर्थहीन हैं 
अर्थहीन हैं  धर्म की किताबें 
कोई अर्थ नहीं पताको के रंग का 
अर्थ है उत्सव के बहाने का 
पूजा के पंडालों में 

विसर्जित हो जाएँगी देवियाँ 
मूर्तियां प्रवाहित हो जाएँगी 
घर के छोटे मंदिरों में कैद हो जायेंगे धर्म 
रह जायेगा उत्सव अपनी  यादों में 
जिनके सहारे निकल जायेंगा एक और वर्ष  
फिर से सजने के लिए पूजा पंडाल उखाड़ लिए जायेंगे 

7 टिप्‍पणियां:

  1. पंडालों के साथ साथ
    पता नहीं कितना कुछ
    उखड़ेगा किसे पता ?

    बहुत सुंदर !

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.10.2015) को "शुभ संकल्प"(चर्चा अंक-2138) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!

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  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

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