मंगलवार, 4 जुलाई 2017

सरकारों की गहरी नींद और किसानो का टूटता धैर्य

सरकारों की गहरी नींद और किसानो का टूटता धैर्य 
- अरुण चंद्र रॉय 

किसानो की स्थिति के बारे में सच्चाई यह है कि तमाम वायदों और घोषणाओं के बीच आजादी के सात दशक बाद भी देश के अधिकांश किसान बदहाल व उपेक्षित हैं।हालात यह है कि अपने खून-पसीने से देशवासियों का पेट भरने वाले अन्नदाता आज स्वयं दाने-दाने को मोहताज नजर आ रहे हैं।सबसे बदतर हालत छोटे व मझोले किसानों की है, जो मुसीबत में आर्थिक व मानसिक सहायता प्राप्त न कर पाने की स्थिति में खुदकुशी कर अपने अनमोल जीवन को त्यागने को विवश हैं।हालांकि, कागजों पर किसानों के लिए तमाम नीतियां बनायी गयी हैं, लेकिन कागजी खानापूर्ति से इतर व्यवहार के धरातल पर आज तक ऐसी कोई ठोस नीति नहीं बनीं, जो किसानों को उनका वाजिब हक दिला सके अथवा उन्हें मौत के मुंह में जाने से रोक सके!
हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय किसानों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति घटने की बजाय लगातार बढ़ती जा रही हैं।’एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया-2015′ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों में आत्महत्या करने की दर में 42 फीसदी का इजाफा हुआ है।रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में सात राज्य ऐसे हैं, जहां किसानों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति सर्वाधिक है जिनमे महाराष्ट्र, तेलंगाना, आँध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्णाटक, मध्यप्रदेश और पंजाब शामिल हैं।  

अब तक की हमारी सरकारों ने भी खेती तथा इससे जुड़े किसानों की उपेक्षा ही की है।देश में विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा देने के लिए हमारी नीतियां, हमारे बैंकिंग उद्योग कार्पोरेट्स के लिए उचित वातावरण तैयार करते हैं  लेकिन कृषि के विकास हेतु ऐसे प्रयासों का जैसे अकाल ही पड़ जाता है।कृषि-आधारित कई उद्योग आज बंद हो रहे हैं या होने के कगार पर हैं, लेकिन उसकी सुध कोई नहीं ले रहा।बरेली में आयोजित एक सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का वादा किया था।लेकिन यह कैसे पूरा होगा, इस पर नीति स्पष्ट नहीं है। 
देश में अधिकांश किसानों की हालत खस्ताहाल है।उदासीनता का आलम यह है कि बीते साल अगस्त माह में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के 25000 किसानों को राष्ट्रपति से आत्महत्या करने की इच्छा जाहिर करनी पड़ गयी थी।स्पष्ट है कि किसान मौजूदा व्यवस्था से तंग आ चुके हैं।बात सिर्फ उन्नाव के किसानों की नहीं है, देश भर के किसान दुखी हैं ,उनकी यह वेदना समय-समय पर सामने आती भी रहती हैं।कोई व्यवस्था से लड़ रहा है, तो कोई उम्मीद धुंधली पड़ती देख आत्महत्या का रास्ता अपना रहे हैं।सवाल यह है कि किसानों की आत्महत्या के बाद ही खबरें सुर्खियां क्यों बनती हैं?
कृषि-प्रधान देश के होने तथा करीबन 70 फीसदी जनसंख्या के कृषि कार्यों में संलग्न होने के बावजूद भारत में किसानों की दशा स्तरीय नहीं है।महंगे होते कृषि आगतों, कठिन होती प्राकृतिक दशाओं तथा सरकारी उपेक्षा की वजह से वे अपने व्यवसाय के साथ न्याय कर पाने में अपनी असमर्थता जाहिर कर रहे हैं।किसानों के अपने परंपरागत पेशे से टूटते मोह के कारण कृषि दिन-ब-दिन बदहाली की गर्त में समाती जा रही है।दरअसल, खेती में लागत अधिक और मुनाफा कम होने की वजह से किसानों का धैर्य भी जवाब दे रहा है।जमीनी हकीकत है कि केवल कृषि कार्य कर एक औसत किसान के लिए अपनी दैनिक आवश्यकता की पूर्ति कर पाना भी मुश्किल होता जा रहा है।ऐसे में, बच्चों की अच्छी शिक्षा और असाध्य रोगों के लिए खर्च का उचित बंदोबस्त कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं।
देश में तीव्र औद्योगिक विकास के बावजूद,एक बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है।खेती व किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज कर देश के विकास की कल्पना नहीं की जा सकती।अतः किसानों को बदहाली की गर्त से निकालने के लिए सरकार को यथासंभव प्रयास करने चाहिए।कहीं ऐसा न हो कि हमारे किसानों का धैर्य जवाब दे। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (05-07-2017) को "गोल-गोल है दुनिया सारी" (चर्चा अंक-2656) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. कहीं न कहीं अब जरूरत है कि समाज के तौर पर किसानों को दूसरे काम ढूंढने होंगे। पुरातन और नवीनतम ज्ञान खेती की हालत में सुधार कुछ ला सकता है। पर देखता हूं कि आपस में भी सहयोग न करने की आदत गांव, कस्बे तक में इतनी घुसपैठ कर चुकी है कि हालात बदतर हो चले हैं।

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  3. अमिताभ बच्चन जैसे किसानों का क्या होगा?

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