सोमवार, 24 जुलाई 2017

अजेय




दुनिया में कुछ भी 
अजेय नहीं 
वह जो अजेय है 
मात्र है एक दंभ 

धूल में मिल जाएँगी 
ये सभ्यता 
पीछे भी मिल गई हैं 
कई कई सभ्यताएं 

जो कर रहे हैं हत्याएं आज 
समाप्त हो जायेंगे वे भी स्वयं 
सेनायें जो फहरा रही हैं पताकाएं 
सब ध्वस्त हो जायेंगी 

बची रहेगी 
नदी, हवा, पानी और मिटटी 
अजेय हैं ये।  


4 टिप्‍पणियां:

  1. प्राकृति को शायद इतना ज्यादा मान इसीलिए दिया है हमारी संस्कृति ने ...
    गहरी रचना ...

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (26-07-2017) को पसारे हाथ जाता वो नहीं सुख-शान्ति पाया है; चर्चामंच 2678 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती. सुंदर शब्दों के साथ..

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