शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

परिधि

परिधि



पृथ्वी के पैर में
लगे हैं पहिये
किन्तु उसे लौट आना होता है
धुरी पर
यही नियति है
जैसे स्त्रियों के लिए
निर्धारित है परिधि !




परिधि में
नहीं है आसमान
जंगल भी नहीं
न ही समंदर
किन्तु निर्धारित कर ली है नदी
अपना मार्ग
जैसे स्त्रियों के लिए
निर्धारित है परिधि !!




परिधि के लिए
गढ़ लिए गए हैं
कई पर्याय
किन्तु वही छूता है शिखर
जिसमें दुस्साहस है
लांघने को परिधि !


1 टिप्पणी:

  1. परिधि का बिंब बहुत सटीक बैठता है और स्त्री जीवन की सीमाएँ साफ दिखाता है। पृथ्वी, नदी और शिखर के उदाहरण बात को मजबूत करते हैं। भाषा सरल है, पर असर गहरा है। आपने अपनी कविता में सवाल पूछा और जवाब भी इशारों में दे दिया है।

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