शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

परिधि

परिधि



पृथ्वी के पैर में
लगे हैं पहिये
किन्तु उसे लौट आना होता है
धुरी पर
यही नियति है
जैसे स्त्रियों के लिए
निर्धारित है परिधि !




परिधि में
नहीं है आसमान
जंगल भी नहीं
न ही समंदर
किन्तु निर्धारित कर ली है नदी
अपना मार्ग
जैसे स्त्रियों के लिए
निर्धारित है परिधि !!




परिधि के लिए
गढ़ लिए गए हैं
कई पर्याय
किन्तु वही छूता है शिखर
जिसमें दुस्साहस है
लांघने को परिधि !


2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (24-12-2017) को "ओ मेरे मनमीत" (चर्चा अंक-2827)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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