शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

ऋतुएं

 प्रिय कुशाग्र ! 

पहले सीखना माता से 

बारहो मास के नाम

कि चैत में कैसे पकता है गेहूं

और बैशाख में समेटा जाता है

खलिहान से 

तभी मंजरी से टिकोले आते हैं आमों में

और यदि बारिश हो जाए बेमौसम वाली

तो पढ़ना बैशाख में

उनकी माथे की शिकन 


फिर जेठ की दुपहरी में

तपते हुए खेत देखना

देखना धरती की बढ़ती प्यास

सूखते कुएं, तालाब और 

पहली बारिश की प्रतीक्षा


इस प्रतिक्षा के बीच 

माएं बोयेंगीं धान के बीच 

उम्मीद में कि समय से 

बरसेगा आषाढ़ 

जो कि दशकों से कितना अनियमित रहा है

पढ़ लेना पुराने अखबारों में 

सूखे आषाढ़ के बाद सावन का हरा होना

केवल कल्पना है 

किसान बोएगा फिर भी धान 

इस उम्मीद में कि भादो जरूर बरसेगा

और भादो है कि

कई सालों से या तो खूब बरसा है

या एकदम ही नहीं 

इस सब बातों का जिक्र नहीं होता है

कुशाग्र जब निकाले जाते हैं

औसत बारिश के आंकड़े


आश्विन मास तो त्योहारों का होता है

थके हुए किसानों के लिए

जब दिल्ली और एनसीआर की हवा 

रहती है जहरीली 

कितना शोर रहता है उन दिनों

अखबारों में, टीवी पर

और फिर कार्तिक से शुरू होती है ठंड

ऐसा कहते हैं और अब यह सिकुड़ रहा है

फिर आएगा अगहन 

धानों का खेतों से खलिहान तक आने का समय

और तैयारी दलहन के बोने की

पूस से शुरू हो जाती है तैयारी

 गेहूं की

आलू की  

माघ में गंगा किनारे लगता है मेला

फिर आता है बसंत का मास फागुन

बसंत पंचमी से होली तक ! 


सीख लेना पहले 

महीनों के नाम

ऋतुओं के नाम

कैसे सम्भाली जाती हैं ऋतुएं

यह सीखना अधिक जरूरी है

स्तनों को संभालना सीखने से पहले ! 


(संदर्भ : हिंदवी पर कुशाग्र की कविता ) 

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