कास के घास में है
एक कसक
वह फुसफुसाती है हौले हौले
हवा के कानों में ।
कुछ चाहती है वह
पुकारती है वह
गाती है और
अपने मन की बातें बताती है
आसमान में चमकते तारों को
नीरव अंधेरे में !
बादल सुनते हैं;
बदल जवाब देते हैं;
उतरते हैं धीरे-धीरे बारिश के संग
बादल भिगो देता है
कास के घास के चेहरे को
लम्बे लम्बे सफ़ेद सुनहरे फूल
फूट पड़ते उसकी छाती पर
बढ जाता है
नदी के कछार का सौंदर्य !
नदी के कछार का सौंदर्य !
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