मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

रिशेप्शनिस्ट


वर्षो से
सैकडों फोन
रोज सुनती है वो
लेकिन नही आया
वो एक फोन
जिसका इंतज़ार था उसे .


टेलीफोन के पैड पर
थिरकतीं हैं उसकी उंगलियाँ ऐसे
जैसे थिरका था उसका पांव
पहला प्यार होने पर .


दफ्तर के पीछे वाली खिड़की पर
रहने वाली गौरैया
बहुत खुश थी आज
उसने जाने थे अंडे
पहली बार इर्ष्या की आग में
जली थी वो .

4 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर रचना बधाई

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  2. nari man ko bahut gahare se jana hai. bahut sunder likha hai . badhai

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  3. itna achcha likhte hai. ab tak to kai books likh li hongi. starting ka photo bahut impresive hai

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  4. anamika ji abhi to likhna shuru kiya hai ! aap logon ke taareef yon hi milti rahegi to aur bhi likhunga ... kitabein bhi aayengi !

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