शनिवार, 14 मई 2011

नहीं बदली कहानी

बाबूजी को
कहाँ याद होगा कि
कब पैदा हुए थे
हाँ दद्दा बताते थे कि
जब अंग्रेजों के जाने के बाद
कलकत्ता में हुए थे दंगे
गाँधी जी बैठे थे
धरने पर
पैदा हुए थे बाबूजी
उसी दौरान

कहते हैं
बड़ा कठिन समय था वह
देश में
ना सड़कें थी
ना बिजली
किसानो की हालत
और भी बुरी थी
तभी तो
जब बाबूजी कहते थे
दद्दा को

सुनाने कहानी
दद्दा की हर कहानी शुरू होती थी
'एक था गरीब किसान'

समय बीता
बाबूजी हुए जवान
उसी गरीबी में
रेडियों पर सुनते थे
देश कर रही है
तरक्की
तरक्की करते रहे
बाबूजी भी
दद्दा गुज़र गए
उसी गरीबी में
तरक्की के बीच

कोई माध्यम मार्ग
अपनाया देश ने
कहते हैं बाबूजी
लोग गाँव छोड़ छोड़ भागे
फिर हुए युद्ध
फिर हुआ अकाल
और गाँधी जी की तरह
विनोबा जी घूमे गाँव गाँव
सुना दिन फिर जायेंगे
किसानो के
इसी अकाल में
पैदा हुआ मैं
कहते हैं बाबूजी
और यह समय भी था
बड़ा ही कठिन
ठीक उसी तरह
जब पैदा हुए थे बाबूजी
और जाते हुए
खेत या खलिहान
सुनाते थे  कहानी
'एक था गरीब किसान'

समय
और भी बदला
तरक्की और भी हुई
इस तरक्की का शोर
कुछ अधिक था
अखबारों में
रेडिओ में
टीवी में
और घर घर घूम कर
किया गया इस तरक्की का प्रचार
इस बीच
हुए कुछ और युद्ध
लेकिन सीमा पर नहीं
सीमा के भीतर
माध्यम मार्ग जो अपनाया गया था
बाबूजी के ज़माने में
कर दिया गया उसे
असफल घोषित
और इसी असफल समय में
बने कुछ नए युद्ध के मैदान
जैसे खेत खलिहान
हाट बाज़ार
दिल दिमाग
और हमला हुए भीतर से
बेहद सुनियोजित थे
वे हमले
इन्ही हमलो के बीच
पैदा हुआ मेरा बच्चा
मैं भी सुनाता हूँ
उसे कहानी
और कहानी अब भी
शुरू हो रही है
'एक था गरीब किसान' 



(यह कविता अपने बड़े बेटे अभिनव को समर्पित कर रहा हूँ. एक दिन शाम को मैं, पत्नी और दोनों बच्चो के साथ पार्क में टहल रहा था... छोटे बेटे आयुष ने कहानी सुनने की जिद्द की. मैंने अभिनव  से  कहा कि वो ही आयुष को कहानी सुना दे... अभिनव की कहानी शुरू हुई.. 'एक था गरीब किसान'... और यहीं से जन्म हुई बैचैनी और दो तीन दिनों बाद यह कविता. )
 

38 टिप्‍पणियां:

  1. यह वाक्य तब से आज तक नहीं बदला है।

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  2. क्या बात है !!!!!
    बहुत उम्दा ! वाक़ई जितना बदल जाना चाहिये था उतना किसान कहां बदल पाया ,,वो आज भी भूख के कारण ही ख़ुदकुशी कर रहा है .

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  3. किसान ऐसा न रहा तो वह भी रक्‍तचाप और मधुमेह का शिकार होगा.

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  4. यह कहानी कहाँ बदलती है....


    पहले वैसे भी ऐसे ही जन्म तिथियाँ अंदाज से बताई जाती थी...


    बहुत कुछ समेटे हैं यह रचना अपने आप में..पसंद आई.

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  5. आह ! एक था गरीब किसान !
    अरुण भाई,दिल को छू लेतें हैं आपके जज्बात.
    जादू है आपकी प्रस्तुति में.
    दर्द है आपकी अभिव्यक्ति में.
    भगवान नित्य आपको शक्ति दे,आप यूँ ही अलख जगाते रहें.
    बहुत बहुत आभार .

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  6. कहानी ज्यों की त्यों है ..भले ही देश ने तरक्की कर ली
    आज भी किसान गरीब ही है ...बहुत संवेदनशील प्रस्तुति

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  7. अच्छी, हकीकत बताती रचना ! शुभकामनायें आपको !

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  8. अच्छा लगा इसे बांचकर! आपके बच्चे का आभार जिसके जरिये यह कविता हम तक पहुंची।

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  9. आप तो अपनी बेचैनी कविता में ढ़ाल देते हैं
    एक हम हैं कि
    अपनी बेचैनी को कल पर टाल देते हैं
    न ही सुधरा है, और न सुधरेगा
    किसानों का हाल
    आप उदासीनताओं के साथ सोते संसार
    की नींद में क्यों खलल डाल देते हैं।

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  10. kya baat hai.... ek tha garib kisaan... bichara aaj bhi garib hai.....
    I have been arguing at different forums that economic growth is not just enough, we need to look at SWB (subjective well-being). http://www.theindiaeconomyreview.org/Article.aspx?id=78

    thanx for such nice words for getting us all nostalgic....
    vijay

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  11. इन्ही हमलो के बीच
    पैदा हुआ मेरा बच्चा
    मैं भी सुनाता हूँ
    उसे कहानी
    और कहानी अब भी
    शुरू हो रही है
    'एक था गरीब किसान'
    chalti hi rahti hai yah kahani

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  12. Arun bhai aap ki ye kavita bhi hila gayi andar tak. Aap ki kavita ke samman men:-

    kaamyaabi ke jashn se pahle
    soch kya khoya aur kya paya
    ban gaya 'saab', kal jo tha 'labor'
    fir bhi 'roti' vo naa juta paya

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  13. ्किसानों की व्यथा को बहुत ही गहनता से उतारा है…………वो कल भी ऐसा ही था और आज भी…………इस हाल को बखूबी उकेरा है।

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  14. और कहानी अब भी
    शुरू हो रही है
    'एक था गरीब किसान'

    आपकी प्रस्तुति में ग़ज़ब का अनोखापन देखने को मिलता है.

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  15. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (16-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  16. एक था गरीब किसान !
    dard bhari dastan......

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  17. बहुत ही मार्मिक कविता है....
    दिन बदलते गए...समय बदलता गया...पर गरीब किसान गरीब ही रहा
    उसका दर्द छलक आया है...पंक्तियों में

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  18. 'एक था गरीब किसान'
    और उसकी गरीबी और बदहाली का सिलसिला बदस्तूर जारी है, जारी रहेगा ना जाने कब तक.

    कविता में तो आपने पूरा इतिहास समेत लिया नए भारत के निर्माण का.

    बहुत सुंदर रचना.

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  19. kahaa kya badla hai abhi tak!!!

    dekhte hai ye drishya kab tak dekhne honge....

    samayanukool rachna...

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  20. भाई अरुण चन्द्र जी आपकी हर कविता बेमिसाल होती है बधाई और शुभकामनाएं |यह कविता भी उत्कृष्ट है |

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  21. चंद लाइनें आपकी बहुत भावुक कर जाती है..किसान परिवार और.गाँव से ताल्लुक रखने वाले लगभग हर लोगों की कहानी कुछ ऐसे ही है. खास कर वो जिनकी जीवनचर्या में बस खेतीबारी ही होता था..बहुत ही सुंदर भाव..खूबसूरत रचना के लिए बहुत बहुत बधाई

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  22. समग्र रचना. समय कोई भी रहा हो पर किसान तो फिर भी गरीब ही रहा.

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  23. ye garib kisan kab bada aadmi ban payega...!!
    sayad aisa na hoga kabhi..

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  24. अरुण जी आपकी सादगी......आपकी सोच और आपकी कलम को मेरा सलाम......बहुत गहरी और मार्मिक पोस्ट......अनूठे अंदाज़ में......शानदार |

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  25. दशा आज भी यही है .. बस तोड़ा सा अंदाज़ बदला है ... नेता बदले हैं .. पैसा बदला है ... मार्मिक चित्रण है समय का ...

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  26. अरुण जी ,

    बस ज़माने बदलते जाते हैं और कहानियां वही रहती हैं, हर नई पीढ़ी को पिछली पीढ़ी गरीब ही मिलती है और इस गरीबी का व्याख्यान तो जब तक मनुष्य रहेगा जारी रहेगा.

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  27. दशा आज भी यही है| बहुत संवेदनशील प्रस्तुति|

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  28. कुछ नहीं बदलता ! बहुत अच्छी रचना । धन्यवाद ।

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  29. Arun jee karuna kavita ki rooh hoti hai aur jo kavita pathak ke hriday me karuna jagaye vahi utkrishta kavita hai.Garib kisan to aam shahri ke liye jaise ek mithak hi ban kar rah gaya hai jisse vah hamesha do char hota hai par jo use shayd hi kabhi alodit hota hai.Aapki yah kavita satahikaran aur sarlikaran ke par jati hai.Ek bahut achhi kavita ke liye hriday se badhai.Han,mere hisab se yadi shirshak'Ek Garib Kisan Tha'hota to bat aur gahre pahunchti.

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  30. कविता में आपकी बेचैनी स्पष्ट झलक रही है। एक यथार्थ का उम्दा चित्रण है।

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  31. आदरणीय अरुण जी
    नमस्कार !
    .....बहुत भावुक बहुत गहरी और शानदार पोस्ट...

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  32. समय
    और भी बदला
    तरक्की और भी हुई
    इस तरक्की का शोर
    कुछ अधिक था
    अखबारों में
    .....हकीकत बताती रचना

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  33. प्राचीन, अर्वाचीन और वर्तमान को जोडती हुई प्रगतिशील कविता . लेकिन तब से अब तक एक समानता बनी रही किसान की " वह गरीब ही बना रहा " भट्टा परसौल की तरह .

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  34. अम्मा बताती थी देश में मार काट चल रही थी ,अंग कटे लोग गाड़ियों में भर भर के हिन्दुस्तान आरहे थे ,उसी घबराहट मैं अम्मा को डिलीवरी पैन हुआ था और मैं पैदा हो गया था .जन्म तिथि कोई नहीं जानता ।
    किसान हो या जवान या फिर कांग्रेस की जेब में पड़ा आम आदमी जिसकी जेब में भी हर दम कांग्रेस का ही हाथ होता है ,हर दम है किसान के साथ ,दिल्ली पोलिस की तरह ,बने हुए हैं आहलुवालिया साहिब और रोज़ -बा -रोज़ विकास के आंकड़े गिनातें हैं ,जो किसान के सिर पे से उतर जातें हैं .गले में आजाता है फंदा -इसीलिए तो कहा गया है -जिसे फिट आजाये उसके गले में फंदा ,,बाकी सबको आज़ादी है ,अब तो किसानों के साथ राहुल बाबा भी हो गएँ हैं ,दिग्गी भी पगड़ी बांधे किसा की दिखाई दिए हैं खुदा खैर करे ,किसान पे रहम करे ।
    बेहद संवेदन शील रचना हाई आपकी ,बाबूजी कहते थे -
    एक गरीब किसान था

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  35. निःशब्दता की स्थिति है...क्या कहूँ...?????

    आपकी लेखनी को नमन !!!

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  36. बहुत सटीक अभिव्यक्ति..सच में कहाँ बदली है अभी भी गरीब किसान की स्तिथि..बहुत संवेदनशील रचना..

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