मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कालेज की कैंटीन और ब्लैकबेरी पर इन्टरनेट सर्च

जरुरी नहीं कि
जो कविता मैंने पढ़ी हैं
अपने छात्र जीवन में
वह आपने भी पढ़ी हो
जैसे लव सांग आफ जे एल्फ्रेड प्रुफ्रोक
और जीवन को समझने के लिए
कविता आवश्यक हैं
यह भी जरुरी नहीं है
हाँ एक कैंटीन जरुरी है
जुगाली के लिए

ठीक है कि
मेरे कालेज की  कैंटीन
लगती थी मुझे
इस कविता के पात्र की तरह
गीला फर्श
जो कभी सूखा ही नहीं
जैसे नहीं सूखते हैं
देश में मुद्दे
और उन मुद्दों पर बहस करते हुए
मैं कवि टी एस एलियट सा लगता था
जिन्होंने लिखा था 'लव सांग ऑफ़ जे एल्फ्रेज़ प्रुफ्रोक '
उद्वेलित हो उठता था
और कैंटीन में आते जाते मेरे सहपाठी
मुझे बस पात्र से लगते थे, निर्जीव
लक्ष्य विहीन नपुंसक

उनके चेहरे कई अर्थ लिए होता था
उनका चरित्र कई रूपों में होता था
और मैं मानो
समझ रहा था सभी अर्थ
पहचान रहा था सभी रूप
मैं भी एक प्रेम गीत लिखना चाहता था
ज़े एल्फ्रेड प्रुफोक की तरह
कडाही से वाष्पित होते तेल की चिपचिपाहट के बीच

वही कैंटीन है यह
जहाँ कार्ल मार्क्स की पूंजी कई बार बांच गया
मन के उकताने पर
फाड़ डाली कई प्रतियां पूंजी की
इसी कैंटीन से खोला गया
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ मोर्चा
जंगल बचाने की मुहिम भी
यही से शुरू हुई
जो स्थानीय अखबार के पांचवे पन्ने से आगे नहीं बढ़ सका
यहीं थमाया कई मित्रो को
लाल झंडा, तीर कमान, बाद में जिन्होंने थाम लिया
ए. के. फोर्टी सेवन, 
कहते हैं  हताश होकर किया है
नहीं माफ़ी चाहता हूँ मैं
उन सभी कृत्यों कुकृत्यों के लिए

हमारे सिद्धांत बदले
समय के साथ, समय की सुविधा से
इस बीच नदी संकरी हो गई
शहर के भीतर से गुजरने वाला सीवर
बह गया इसी नदी से होकर
कैंटीन में आते रहे हमारे जैसे लोग
बरस दर बरस
कैंटीन अब भी वैसी  ही है
तटस्थ
अब भी जे एल्फ्रेड प्रुफोक आते हैं यहाँ
वेन्डिंग मशीन से लेकर चाय
पढ़ते हैं पूंजी, करते हैं बहस
होते हैं उद्वेलित, करते हैं आह्वान
रोते हैं, कोसते हैं, विलापते  हैं
रचते हैं एक प्रेम गीत,
जिसमे नहीं है प्रेम जैसा कुछ

इस बीच
पंखे पर झूलती  कालिख
गिर पड़ता है
चाय की प्याली में
टूट जाता है चिंतन का क्रम
मन करता है
चलो ढूंढ लेते हैं
'स्ट्रीम ऑफ़ कांससनेस' का अर्थ
अपने ब्लैकबेरी पर ही इन्टरनेट सर्च के जरिये !

28 टिप्‍पणियां:

  1. गज़ब की सोच है और गज़ब का चित्रण्…………जहाँ तक आम वर्ग पहुंच ही नही पाता………शानदार प्रस्तुति।

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  2. क्लासिकल कविताओं के बीच वर्त्तमान को इस कदर बुना है आपने कि इन्हीं सभी पात्रों के बीच खुद को भी चलता फिरता पा रहा हूँ.. और क्षोभ हो रहा है अपनी नपुंसकता पर!!
    अरुण जी! दिल पर प्रहार ही नहीं करती यह रचना, उद्वेलित करती है, अंतस को!!

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  3. सच कहूँ तो मुझे इस तरह की कविता कभी भी कविता नहीं लगी ... हो सकता है साहित्य की समझ नहीं है मुझे ... हाँ यही होगा ... खैर जो भी हो ... चाहे यह कविता हो ... ना हो ... आपके विचार बढ़िया लगे ... शुभकामनाएं !

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  4. जगह वही, सवाल वही, मायने बदल गये हैं।

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  5. आपकी कविता समय के साथ आंच में तपे कुंदन की तरह निखरी है। आपकी काव्यकत्मकता निखार पर है। आपकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच खींचतान पैदा करता है।

    इसमें कविता में एक दर्शन और जीने के हठ का संकेत है। थोड़ा अमूर्तन, थोड़ी अभिधा, थोड़ी फैंटेसी है, मगर अनूठापन है।

    अपने समय व परिवेश का नया पाठ बनाने, समकालीन मनुष्य के संकटों को पहचानने तथा संवेदना की बची हुई धरती को तलाशने के कारण यह एक महत्वपूर्ण रचना बन पड़ी है।

    अरुन्स वन ऑफ द बेस्ट!

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  6. हमारे सिद्धांत बदले
    समय के साथ, समय की सुविधा से
    इस बीच नदी संकरी हो गई
    शहर के भीतर से गुजरने वाला सीवर
    बह गया इसी नदी से होकर

    बहुत उम्दा.... निशब्द करते शब्द हैं...

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  7. दाना-पानी के साथ भाती कविता.

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  8. बड़ी टेक्नोलॉजी फ्रेंडली कविता है! एकदम मौलिक. भई वाह!

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  9. हाँ एक कैंटीन जरुरी है
    जुगाली के लिए...... bahut achhi rachna

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  10. कैंटीन हर छात्र-छात्रा के जीवन का एक अहम् हिस्सा होता है...
    सजीव हो गया सब-कुछ आँखों के समक्ष

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  11. गहन चिंतन , व्याकुल भावों की अनूठी प्रस्तुति ....
    नए-पुराने प्रतीकों के माध्यम से यथार्थ तक पहुँचाने की ज़द्दोज़हद ...सफल होती दिखती है

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  12. वाह....शानदार प्रस्तुति ....मार्मिकता का पुट लिए....गहन अभिव्यक्ति

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  13. कॉलेज के दिनों की याद दिला दी भाई| बाकी सब तो आपने लिख ही दिया है:)

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  14. उफ्फ्फ....
    कहाँ से लाते हैं ये भाव ......
    नमन है आपकी लेखनी को .....
    एक बार नहीं कई बार पढ़ी ....
    अभी शायद और पढनी पड़े .....
    अरुण जी .....अंक पहले दे दूँ .....?
    १० /१०

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  15. वाह!! नये जमाने की कविता कहलाई यह तो...एकदम अलग, अनोखी!!

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  16. कितना कुछ कह डाला. हमारे कहने को कुछ बचा ही नहीं.गज़ब की सोच और अभिव्यक्ति.
    लाजवाब

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  17. Arun ji , very appealing creation . I'm kinda nostalgic after reading this.

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  18. अरुण जी,

    यह कविता पहली बार पढ़ी थी तभी से सेक्सपियर की एक कविता की एक पंक्ति याद आयी... तब से लेकर आपकी कविता को पढ़-पढ़कर उस भूली-बिसरी कविता को याद करता रहा. जितना हो पाया वो यह है,
    "The poet’s eye, in a fine frenzy rolling,
    Doth glance from heaven to earth, from earth to heaven;
    And as imagination bodies forth
    The forms of things unknown, the poet’s pen
    Turns them to shapes and gives to airy nothing
    A local habitation and a name."

    आपने इस कविता में जिस तरह से लौकिक (स्थुल) चरित्रों में अलौकिक (सूक्ष्म)तत्व का निरुपण किया है.... उसके लिये उपर उद्धृत दो पंक्तियों से अधिक मैं शायद कुछ नहीं कह सकता। कविता थोड़ी बौद्धिक जरूर हो गई है किन्तु जीवन के खुरदरे सत्य को व्यक्त करने के लिये मखमली शब्द तो काफ़ी नहीं ही होंगे।

    इसे मैं एक क्लासिकल कविता कहना चाहूँगा...!

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  19. आपकी पोस्ट और उस पर हुई टिप्पणियों को पढकर
    एक अलग ही आनंद आता है.अरुण भाई आप कमाल
    का लिखते है,गहन अर्थों को समेटे.
    मेरी आपको हार्दिक शुभकामनाएँ.
    यूँ ही शानदार लेखन को जारी रखें.

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  20. हमारे सिद्धांत बदले
    समय के साथ, समय की सुविधा से
    इस बीच नदी संकरी हो गई
    शहर के भीतर से गुजरने वाला सीवर
    बह गया इसी नदी से होकर

    बहुत बढ़िया पंक्तियां...

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  21. मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
    आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
    पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है

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  22. क्या कहूँ? ऐसे अनूठे शब्द रचना में पिरोये हैं के बस...एक बार क्या बार बार पढने को जी करता है...इतनी गहन बात रचना के माध्यम से कहना आसान नहीं होता लेकिन आपकी कलम की ताकत ही ऐसी विलक्षण रचनाओं का सृजन कर पाती है. बधाई स्वीकारें.

    नीरज

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  23. आपकी पोस्ट को ब्लोगर मीट वीकली (३) में इस सोमबार ०८/०८/११ को शामिल किया गया है /आप आइये और हमें अपने विचारों से अवगत कराइये/आप ऐसे ही हिंदी साहित्य की सेवा करतेरहें यही कामना है /सोमवार को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली (3) Happy Friendship Day के मंच पर आप सादर आमंत्रित है /

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  24. बार बार पढ़ने को जी करता है .. किसी कोलाज की तरह ... शब्दों को अर्थ से परे देखा हो निसे इस लाजवाब रचना में ... अरुण जी ये रचना आपकी विलक्षण प्रतिभा का उदाहरण है ...

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  25. हमारे सिद्धांत बदले
    समय के साथ, समय की सुविधा से
    इस बीच नदी संकरी हो गई
    शहर के भीतर से गुजरने वाला सीवर
    बह गया इसी नदी से होकर
    behatreen bhav shabd sanyojan aur badalte samay ke na badalne vale badle roop...bahut khoob..

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