मंगलवार, 30 अगस्त 2011

भादो मास



गीले भीत के 
ढहने के डर से
नींद नहीं आती है
भादो मास 
हे देश ! 
क्यों नहीं है तुम्हें पता ?

भादो मास के अन्हरिया में 
टूटी हुई चट्टी* पहनकर 
गया था वह दिशा मैदान 
काट लिया साँप ने
कोसों दूर 
न  डाक्टर न अस्पताल
मर गया झाड फूंक के दौरान 
हे देश !
क्यों नहीं बनी यह खबर ?

भादो मास 
जो चढ़ी थी नदी
बँटना शुरू हो गया था
अनाज, पन्नी 
सुना था रेडियो पर
पंहुचा नहीं मेरे गाँव 
हे देश !
क्यों नहीं बना यह मुद्दा ?

६५वा भादो है यह 
देश का 
आज़ादी के बाद 
इस बीच 
क्यों नहीं आया
कोई अगहन
मेरे लिए
हे देश !
क्या है उत्तर सर्वोच्च संसद के पास ?

*चप्पल

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

रामलीला मैदान से लौटते हुए




हर साल
मेघनाद, कुम्भकरण
और रावण को
जलाने की परंपरा है
इस मैदान में
सरकार के नेतृत्व के हाथों
जब वास्तव में
होना है
रावण का अवसान
वही सरकार
आज फासले पर है
इस मैदान से


आज
कन्धा है
थोडा ऊँचा
मन पर बोझ है
थोडा कम
विश्वास है
थोडा दृढ
एक परिवर्तन जो
होने को है
इस मैदान से


सुना था
अहिंसा में है
अतुलनीय शक्ति
सुना था
हो सकती है
क्रांति
विश्वास फिर भी
था नहीं
किन्तु 

आज मुट्ठियाँ 
भिंच रही हैं

बुधवार, 17 अगस्त 2011

नागार्जुन तुम कवि नहीं थे

तुम कवि नहीं थे
नागार्जुन
तुम्हे कोई वाद
नहीं था पसंद
तुमने नहीं जुटाई
अपनी पीढ़ियों के लिए
सुविधाएँ
तुम जुटा गए स्वरलहरियां
जिन्हें सुन आज भी
भुजाएं तन जाती हैं
कहो क्या कविता है
यह उद्देश्य

कवि की तरह
तुम्हे कभी प्रेम भी नहीं हुआ
कोई प्रेयसी नहीं थी तुम्हारी
जो लिखे अपनी आत्मकथा में
तुम्हारा नाम और
पत्रिकाओं के संपादक
उन पर करें चर्चा, टीका- टिप्पणी
हाँ जब युवा थे तुम
तुम्हे प्रेम हुआ भी था
तो कलकत्ता की  ट्राम और
मिलिटरी से रिटायर हुए
बूढ़े घोड़े से
कहो तो कैसे हो
इस विषय पर कोई चर्चा
लिखी जाए सम्पादकीय टिप्पणी
नागार्जुन
तुम कवि नहीं थे

तुम्हारी कविताओं में
अभाव  है नितांत
क्योंकि ह्रदय नहीं टूटते हैं
तुम्हारी कविताओं में
बिस्तरों में सिलवट नहीं पड़ते
और साँसें एक नहीं होती
तुम्हारी  कविताओं में
एक बस ड्राइवर सामने रख लेता है
गुलाबी चूड़ियां अपनी नन्ही बिटिया के लिए
कुतिया सोती है कई दिनों से बुझे चूल्हे के पीछे
रानी की पालकी ढोने के क्रम में
विद्रोह का विगुल बजा देती हैं
तुम्हारी कवितायेँ
फिर कहो कैसे कहें तुम्हे
एक कवि

नागर्जुन
तुम कवि नहीं हो सकते
तुम क्रांतिबीज थे
जो पनपेगा  एक न एक दिन
अवश्य ही  !

रविवार, 14 अगस्त 2011

लाल किले की प्राचीर से



१.
यह प्राचीर
बहुत ऊँची है
यहाँ से नीचे
बैठती है जनता जहाँ
दिखाई नहीं देता
कुछ साफ़ साफ़

२.
यह प्राचीर
बहुत दूर है
यहाँ से चली
घोषणाओं को
पहुचने में जनता तक
हो जाता है
पारेषण ह्रास

३.
यह प्राचीर
टिकी  है
जनता की पीठ पर
इसलिए इसका  भी है
हाल वही
जो होता है
नीव की ईंट का

४.
इस प्राचीर से
किये जाते हैं
तरह तरह के वादे
दिए जाते हैं
दुनिया भर को सन्देश
भरी जाती हैं हुंकार
बलिदान के लिए
रहते हैं तैयार
बुलेट प्रूफ पारदर्शी शेल के बीच से


इस प्राचीर से
लिया जा रहा है
हर साल नाम
हमारे गाँव का
हमारे खेतों का
हमारे बेरोजगार भाई का
कम होती बहनों का
बिजली का
दंगों का
स्कूलों का
कालेजों का 
शिक्षको की कमी का

कुल मिला कर
मुद्दे बदले नहीं हैं
इस प्राचीर के
इन ६४ सालों में 

बुधवार, 10 अगस्त 2011

नहीं आता है माँ को मोबाइल चलाना

माँ को जब
नहीं आता है
मोबाईल पर सन्देश भेजना
बड़ी खीज आती होगी आपको
आप तब अपना सिर
पीट लेते होंगे
जब उसे मोबाइल खोल कर
सन्देश पढना भी नहीं आता होगा

आपने जब दिया होगा
नया मोबाइल फ़ोन

एक और जरुरत समझकर
सिखाया होगा जतन से
फ़ोन करना
सन्देश पढना/भेजना
फोटो खीचना
रेडियो बजाना
और आप निराश हो गए होंगे
जब उसने बिना किसी रूचि के
रख दिया होगा
एक ओर

आप लौट आये होंगे
गाँव से उल्टे पाँव
उसी हताशा में, निराशा में
समझा दिया होगा
आस पड़ोस को
माँ के बारे में सबकुछ
उसकी बीमारी, उसका डाक्टर
दे दिया होगा
अपना नंबर भी
प्रतीक्षित आकस्मिक स्थिति के लिए

लौटते हुए आपने कई बार
'सॉरी' का सन्देश भी भेजा होगा
लेकिन नहीं आया  होगा जवाब
बहुत रोये होंगे आप
उसकी  कांपती हाथो से लिखी
चिट्ठी को याद करके 

लगता होगा की बदल गई है 
माँ भी

आश्चर्य होता होगा कि
जो लिख सकता है इस उम्र में
करीब सात फांट साइज़ के महीन अक्षरों में चिट्ठी
उसे कैसे नहीं आ सकता है
मोबाइल चलाना

आप सोच रहे होंगे
इनबाक्स में पड़े होंगे 

आपके सन्देश
बिना माँ के बच्चों  जैसे
और माँ के बारे में
सोचते सोचते आप भूल गए होंगे
चलना उसी ने सिखाया था
पकड़ कर नन्ही उंगलियाँ
पहली बार साइकिल के पीछे 

वही  थी भागी 
दो और दो चार होते हैं
उँगलियों को दिखा कर
उसी ने सिखाया था 

जो अब भी याद है आपको

शायद
जबसे आपने सीख लिया कि
दो और दो केवल चार नहीं होते
माँ भूल गई
सब जोड़, घटा, गुणा, भाग
और कर दी घोषणा
नहीं आता है
माँ को
मोबाइल चलाना

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

कालेज की कैंटीन और ब्लैकबेरी पर इन्टरनेट सर्च

जरुरी नहीं कि
जो कविता मैंने पढ़ी हैं
अपने छात्र जीवन में
वह आपने भी पढ़ी हो
जैसे लव सांग आफ जे एल्फ्रेड प्रुफ्रोक
और जीवन को समझने के लिए
कविता आवश्यक हैं
यह भी जरुरी नहीं है
हाँ एक कैंटीन जरुरी है
जुगाली के लिए

ठीक है कि
मेरे कालेज की  कैंटीन
लगती थी मुझे
इस कविता के पात्र की तरह
गीला फर्श
जो कभी सूखा ही नहीं
जैसे नहीं सूखते हैं
देश में मुद्दे
और उन मुद्दों पर बहस करते हुए
मैं कवि टी एस एलियट सा लगता था
जिन्होंने लिखा था 'लव सांग ऑफ़ जे एल्फ्रेज़ प्रुफ्रोक '
उद्वेलित हो उठता था
और कैंटीन में आते जाते मेरे सहपाठी
मुझे बस पात्र से लगते थे, निर्जीव
लक्ष्य विहीन नपुंसक

उनके चेहरे कई अर्थ लिए होता था
उनका चरित्र कई रूपों में होता था
और मैं मानो
समझ रहा था सभी अर्थ
पहचान रहा था सभी रूप
मैं भी एक प्रेम गीत लिखना चाहता था
ज़े एल्फ्रेड प्रुफोक की तरह
कडाही से वाष्पित होते तेल की चिपचिपाहट के बीच

वही कैंटीन है यह
जहाँ कार्ल मार्क्स की पूंजी कई बार बांच गया
मन के उकताने पर
फाड़ डाली कई प्रतियां पूंजी की
इसी कैंटीन से खोला गया
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ मोर्चा
जंगल बचाने की मुहिम भी
यही से शुरू हुई
जो स्थानीय अखबार के पांचवे पन्ने से आगे नहीं बढ़ सका
यहीं थमाया कई मित्रो को
लाल झंडा, तीर कमान, बाद में जिन्होंने थाम लिया
ए. के. फोर्टी सेवन, 
कहते हैं  हताश होकर किया है
नहीं माफ़ी चाहता हूँ मैं
उन सभी कृत्यों कुकृत्यों के लिए

हमारे सिद्धांत बदले
समय के साथ, समय की सुविधा से
इस बीच नदी संकरी हो गई
शहर के भीतर से गुजरने वाला सीवर
बह गया इसी नदी से होकर
कैंटीन में आते रहे हमारे जैसे लोग
बरस दर बरस
कैंटीन अब भी वैसी  ही है
तटस्थ
अब भी जे एल्फ्रेड प्रुफोक आते हैं यहाँ
वेन्डिंग मशीन से लेकर चाय
पढ़ते हैं पूंजी, करते हैं बहस
होते हैं उद्वेलित, करते हैं आह्वान
रोते हैं, कोसते हैं, विलापते  हैं
रचते हैं एक प्रेम गीत,
जिसमे नहीं है प्रेम जैसा कुछ

इस बीच
पंखे पर झूलती  कालिख
गिर पड़ता है
चाय की प्याली में
टूट जाता है चिंतन का क्रम
मन करता है
चलो ढूंढ लेते हैं
'स्ट्रीम ऑफ़ कांससनेस' का अर्थ
अपने ब्लैकबेरी पर ही इन्टरनेट सर्च के जरिये !