शुक्रवार, 22 जून 2012

कॉपी राईटर


(पेशे से कापी राइटर का दर्द इन कविताओं में  )



बेचता हूँ शब्द
इसलिए कबीर नही हूँ
भक्ति नही है शब्दों में
इसलिए तुलसी नही हूँ

बाजार की आंखों  देखी    लिखता हूँ
इसलिए सूर नही हूँ
दिमाग से सोचता हूँ शब्द
इसलिए मीरा नही हूँ 

एक कॉपी राईटर हूँ मैं
बेचता हूँ शब्द !


सपने बुनता हूँ
सपने गढ़ता हूँ
सपने दिखाता हूँ

नही जानना चाहता
कितना सच है
कितना झूठ
कितना फरेब

तारांकित करके 'शर्तें लागू'
लिख कर मुक्त हों  जाता हूँ
अपनी जिम्मेदारियों से
तोड़ लेता हूँ नाता
अपने शब्दों से 

एक कॉपी राईटर हूँ मैं
बेचता हूँ शब्द !


20 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!
    शब्दों का सौदागर....
    बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति.....

    सादर
    अनु

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  2. गज़ब कर दिया ……………कितना सुन्दर भाव संयोजन्…………ऽद्भुत

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  3. नए और ताजे शब्द भी ......
    शुभकामनायें आपको !

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  4. शब्द ही तो हैं जो शब्दों से तकरार कर सकते हैं

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  5. शब्द ही तो बेचता है बेचारा, इस भावनाओं की ख़रीदफ़्रोख़्त के बाज़ार में।

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  6. सच्चाई को बेझिझक स्वीकारते सच्चे शब्द उन्ही की तो कीमत होती है ...बहुत सुन्दर भाव से परिपूर्ण रचना

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  7. एक कॉपी राईटर हूँ मैं
    बेचता हूँ शब्द !

    मन के भावों की उत्कृष्ट प्रस्तुति

    MY RECENT POST:...काव्यान्जलि ...: यह स्वर्ण पंछी था कभी...

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  8. **♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**
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    उम्दा लेखन, बेहतरीन अभिव्यक्ति


    हिडिम्बा टेकरी
    चलिए मेरे साथ



    ♥ आपके ब्लॉग़ की चर्चा ब्लॉग4वार्ता पर ! ♥

    ♥ पहली बारिश में गंजो के लिए खुशखबरी" ♥


    ♥सप्ताहांत की शुभकामनाएं♥

    ब्लॉ.ललित शर्मा
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  9. एक कॉपी राईटर हूँ मैं
    बेचता हूँ शब्द !

    क्या बात है अब तो उसका दर्द आपको ज्यादा अच्छी तरह समझ आ रहा होगा.

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  10. कापीराइटर के दर्द को उड़ेल के रख दिया है इन रचनाओं में अरुण जी ... शब्द बेचता हूँ .. क्योंकि पेट भरना है ...

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  11. बेचता हूँ शब्द
    इसलिए कबीर नही हूँ
    भक्ति नही है शब्दों में
    इसलिए तुलसी नही हूँ

    बाजार की आंखों देखि लिखता हूँ
    इसलिए सूर नही हूँ
    दिमाग से सोचता हूँ शब्द
    इसलिए मीरा नही हूँ .....kya behtarin soch hai..anand aa gaya

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  12. कापीराइटर तो हूँ नहीं...लेकिन कविता पढ़ कर अब उनका दर्द अच्छे से समझ सकता हूँ..:)

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  13. अच्छा करते हो बेच देते हो शब्द
    वर्ना पास में बहुत इक्ट्ठा हो जायेंगे
    बैंक भी बना कर क्या करोगे उनका
    लोग बाग उधार में ले जायेंगे
    फिर कभी नहीं लौटायेंगे ।

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