मंगलवार, 12 जून 2012

लोकार्पण

मित्रो ज्योतिपर्व प्रकाशन से प्रकाशित बहुचर्चित पुस्तक "मेरे गीत" और "खामोश ख़ामोशी और हम" का लोकार्पण इस शनिवार को हो रहा है। कार्यक्रम संलग्न है। 
आप सादर आमंत्रित हैं। 
श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं। उनकी 50 से अधिक पुस्तकें जिनमे गीत, कविता, ग़ज़ल और आलोचना की पुस्तकें शामिल हैं, प्रकाशित हुई हैं और इससे कहीं अधिक पांडुलिपियाँ तैयार हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी के सेवानिवृत्त प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष श्री इन्द्र पर कम से कम 20 विद्यार्थियों ने शोध किया है। 
साहित्य के खेमेबाजी से दूर देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी पच्चासी वर्ष की आयु में भी साहित्य साधना में जुटे हुए हैं और लगातार हिंदी, उर्दू और संस्कृत में सामान अधिकार से सृजन कर रहे हैं। 
लोकार्पण और गोष्ठियों जैसे साहित्यिक उत्सवो से दूर रहने वाले देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी आधुनिक कविता को गीत हन्ता की संज्ञा देते हैं क्यों आज की अधिकांश कविता में उन्हें साधना, भाव और उद्देश्य की कमी लगती है। "मैं शिखर पर हूँ" उनका प्रसिद्द गीत संग्रह है। 

हिंदी में गीत की स्थिति और सतीश सक्सेना जी की पुस्तक "मेरे गीत" पर उन्हें देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" को सुनना एक अनोखा अवसर होगा।  मैं ज्योतिपर्व प्रकाशन के लिए एक सुयोग और भाग्य का विषय मान रहा हूँ की श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी हमारे कार्यक्रम में आने के लिए राजी हुए हैं। 

इन्द्र जी का एक प्रसिद्द गीत आप भी पढ़िए.... 

केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं

"हम जीवन के महाकाव्य हैं
केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं।
         कंकड़-पत्थर की धरती है
         अपने तो पाँवों के नीचे
         हम कब कहते बन्धु! बिछाओ
         स्वागत में मखमली गलीचे
रेती पर जो चित्र बनाती
ऐसी रंग-तरंग नहीं है।
         तुमको रास नहीं आ पायी
         क्यों अजातशत्रुता हमारी
         छिप-छिपकर जो करते रहते
         शीतयुद्ध की तुम तैयारी
हम भाड़े के सैनिक लेकर
लड़ते कोई जंग नहीं हैं।
         कहते-कहते हमें मसीहा
         तुम लटका देते सलीब पर
         हंसें तुम्हारी कूटनीति पर
         कुढ़ें या कि अपने नसीब पर
भीतर-भीतर से जो पोले
हम वे ढोल-मृदंग नहीं है।
         तुम सामुहिक बहिष्कार की
         मित्र! भले योजना बनाओ
         जहाँ-जहाँ पर लिखा हुआ है
         नाम हमारा, उसे मिटाओ
जिसकी डोर हाथ तुम्हारे
हम वह कटी पतंग नहीं है।"


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43 टिप्‍पणियां:

  1. श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी की रचना पढवाने,और आमंत्रण के लिये आभार,,,,,,,

    MY RECENT POST,,,,काव्यान्जलि ...: ब्याह रचाने के लिये,,,,,

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  2. Satish sir ko ab tak blog pe padha tha.. ab unki book ko dekhna ek achchha anubhav hoga.. aur hame prerna milegi.. badhai satish sir ko aur aapko bhi arun jee:)
    ham jarur aane ki koshish karenge...

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  3. सतीश जी से रोहतक में मिलने के बाद दोबारा मिलना ही नहीं हुआ.......पर ये अच्छा मौका है सतीश जी से मिलने का ....बहुत ही जिंदादिल इंसान है सतीश जी उन्होंने हमेशा ही मेरा उत्साह बढाया है.....!!!

    मेरी और से सतीश जी को बहुत बहुत बधाई व आमंत्रण के लिये आभार....!!

    @ संजय भास्कर

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  4. Shukriya Arun ji ..Devendra Sharma "Indra" jee ki ek bahut gahrii aur samay ko chunautii detii rachna padwaane k liye ...aur programme mein aamantrit karne k liye ..

    जिसकी डोर हाथ तुम्हारे
    हम वह कटी पतंग नहीं है

    "हम जीवन के महाकाव्य हैं"
    Adbhut !!!

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  5. सतीश जी बहुत बहुत बधाई । ज्‍योतिपर्व प्रकाशन के कर्ताधर्ताओं को भी शुभकामनाएं। इसी तरह ज्‍योतिपर्व मनाते रहें।

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  6. सतीश जी को हार्दिक शुभकामनायें ....

    अरुण जी आमंत्रण नहीं सूचना कहिये, ओर सुचना मिल गयी है - जरूर पहुंचेंगे.

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  7. इस बेहतरीन रचना प्रस्‍तुति के लिए आभार

    आदरणीय सतीश जी को बहुत-बहुत बधाई सहित शुभकामनाएं

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  8. श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी की रचना पढवाने,और आमंत्रण के लिये आभार. और आयोजन की सफलता के लिए आपको व सतीश जी को अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएं.

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  9. सतीश जी को पुनरपि बधाई, सुन्दर कविता पढ़वाने का आभार..

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  10. सतीश भाई साहब और आपको बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं ! मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि मैं भी इस आयोजन का एक हिस्सा बन सकूँ !

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  11. सतीश जी को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ।

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  12. सतीश जी को शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ

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  13. अभी तो सिर्फ आभासी हाजिरी ही लगाइयेगा ! शुभकामनाओं सहित !

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  14. लेखक प्रकाशक को शुभकामनाए!
    आपने दिल्ली में मेरे रहते हुए सूचना न दी और अब वापस कोलकाता आकर इसका पता लगा और जा पाना संभव नहीं। वहां रहते सूचना देते तो रुक पाना संभव था।
    और इसमें आपने तिथि तो बताया नहीं और जो निमंत्रण पत्र लगाया है उसके अक्षर इतने छोटे हैं कि ठीक से पता चल नहीं रहा।

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    1. सर कल तक सब टेनटेटिव था... कल चाह कर भी मिल नहीं पाया..क्षमा कीजियेगा... कैबिनेट नोट के अनुवाद में व्यस्त था... आमंत्रण को क्लिक कीजिये.. बड़ा हो जायेगा.... अब आपके पुस्तक के विमोचन पर ही आपको आमंत्रित करूँगा...आपकी पाण्डुलिपि से प्रकाशन शुरू करना था और देखिये तीस पुस्तकें आ गई हैं... आपने पाण्डुलिपि दी नहीं अब तक..

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  15. Indra ji ka geet padhwane ke liye bahut bahut shukriya...
    Sateesh Uncle ko dher saari badhaiyaan...
    N many many wishes to u n ur team for many such success n books... :)

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  16. आदरणीय सतीश जी को सादर बधाइयाँ...
    आदरणीय इन्द्र जी की बहुत ही खूबसूरत गीत पढ़वाने हेतु सादर आभार।

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  17. श्री "इन्द्र" जी की रचना पढवाने के लिये आपका बहुत आभार. आयोजन के आमंत्रण के धन्यवाद एवम सफलता हेतु आपको अग्रिम बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  18. सतीश जी को 'मेरे गीत' लोकार्पण अवसर की ढेरों बधाईयां। प्रकाशक महोदय को भी।
    समारोह पर उपस्थिति की इच्छा तो थी किन्तु समय साथ नहीं दे रहा। हमारी शुभकामनाएं!!

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  19. सतीश जी एवं ज्‍योतिपर्व प्रकाशन को हार्दिक बधाइयाँ ...... शुभकामनायें

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  20. इस सुंदर आयोजन की सफलता के बहुत शुभकामनायें और सतीश जी को बहुत बहुत बधाईयाँ.

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  21. हम भाड़े के सैनिक लेकर
    लड़ते कोई जंग नहीं हैं।

    बेजोड़...किताब की जानकारी का शुक्रिया

    नीरज

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  22. सतीश जी को बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं.

    अनु

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  23. खुशखबरी सुनाने का शुक्रिया. सतीश जी को हार्दिक बधाई!

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  24. सतीश जी को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं !
    निमंत्रण के लिये आभार .....

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  25. श्री देवेन्द्र शर्मा "इन्द्र" जी की रचना पढवाने और आमंत्रण के लिये आभार………चित्र को क्लिक करने पर भी नही पढ पा रहे ………आपको हार्दिक बधाई आपका प्रकाशन इसी तरह उन्नति के शिखर छूता रहे।

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  26. बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें !

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  27. वाह .. बहुत ही सुन्दर गीत पढवाने का शुक्रिया अरुण जी ...
    पुस्तक के लोकार्पण की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें ... सतीश जी कों भी बधाई ...

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  28. 'मेरे गीत' लोकार्पण के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाईयाँ
    Regards

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  29. पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम के किये मंगलकामनायें।

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  30. हार्दिक अभिनन्‍दन और बधाइयॉं।

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  31. aisi kavitan ko padhne ke baad hee lagta hai..sirf chalte chalo..satat chalte chalo..sayad kabhi koi gejet ya ghazal ban jaaye....ham jaise nausikhiyon ko bahut kuch seekhne ko milta aap jaise bidwano ke blog par aakar

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