धान के बीज
बो दिए हैं तालाब के किनारे किनारे
उम्मीद में कि बादल बरसेंगे
और पौध बन उगेंगे
फिर से खेतो में रोपे जाने के लिए
सुबह दोपहर शाम
दो दो घड़े की बहंगी बना
सींच रहे हैं
धान के बीज वाली क्यारियां
पुरुष, स्त्री,
जवान होते बच्चे और बच्चियां
गाते हुए गीत
उमस और पसीने के बीच
साथ में कर रहे हैं प्रार्थना
बादलों से/इन्द्र से /मेढ़को से
/मंदिरों में /मस्जिदों में
ग्राम देवता से/स्थान देवता से
अपनी अपनी कुल देवियों से
उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
नहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल
उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
प्रत्युत्तर देंहटाएंनहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल
SARTHAK VICHARON KO PRESHIT KARTI RACHNA .AABHAR
काश सभी ऐसी प्रार्थना कर पाते .....!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबस प्रार्थनाएं कबूल हो जाएँ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंऔर मेहनत सफल हो पुरुषों, स्त्रियों,
जवान होते बच्चे और बच्चियों की......
सादर
अनु
जब कर्म की भावना हो तो कर्म ही धर्म बन जाता है ... बहुत सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंआखिर कर्म ही इश्वर है.सुन्दर कविता.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूब !!
प्रत्युत्तर देंहटाएंअब जल को तो छोड़ दीजिये
अभी उनको पता नहीं चला है
कि जल का बंटवारा बचा है!!!
एक ईश्वर, एक आकाश, बादल भी एक से आने हैं, प्रार्थना भी एक...बहुत सुन्दर..
प्रत्युत्तर देंहटाएंएक रूप एक रंग ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर भाव ..!!
उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
प्रत्युत्तर देंहटाएंनहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल
वाह क्या भाव है
उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
प्रत्युत्तर देंहटाएंनहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल
....बहुत खूब! लाज़वाब और सार्थक सोच...
शशक्त ... कुछ बाते धर्म, जाती, साम्प्रदाओं से अलग होती हैं ... जो जीवन की बाते होती हैं ... सांसों की बाते होती हैं ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंउनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
प्रत्युत्तर देंहटाएंनहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल
....बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति...
जब मेहनत और पसीने से भींगे मन और हृदय से उस खेत को सींचा जाता है ईश्वर उनकी प्रार्थना ज़रूर सुनते हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंउनकी प्रार्थना सुनी जाये यही दुआ है। सुन्दर रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरी पहली वाली टिप्पणी को स्पैम से निकालिए।
प्रत्युत्तर देंहटाएं** आपकी इस कविता में निहित प्रार्थाना को पढ़कर सगीना माहतो द्वारा की गई प्रार्थना याद आ गई ..
“ऊपर वाला दुखियो की नहीं सुनता रे! ...”