गुरुवार, 19 जुलाई 2012

प्रार्थना का धर्म




धान के बीज
बो दिए हैं तालाब के किनारे किनारे
उम्मीद में कि बादल बरसेंगे
और पौध बन उगेंगे
फिर से खेतो में रोपे जाने के लिए


सुबह दोपहर शाम
दो दो घड़े की बहंगी बना
सींच रहे हैं
धान के बीज वाली क्यारियां
पुरुष, स्त्री,
जवान होते बच्चे और बच्चियां
गाते हुए गीत
उमस और पसीने के बीच


साथ में कर रहे हैं प्रार्थना
बादलों से/इन्द्र से /मेढ़को से
/मंदिरों में /मस्जिदों में
ग्राम देवता से/स्थान देवता से
अपनी अपनी कुल देवियों से

उनकी  प्रार्थनाओं और गीतों में 
नहीं होता है कोई धर्म/जाति
होता है केवल
जल और जल

15 टिप्‍पणियां:

  1. उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
    नहीं होता है कोई धर्म/जाति
    होता है केवल
    जल और जल
    SARTHAK VICHARON KO PRESHIT KARTI RACHNA .AABHAR

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  2. काश सभी ऐसी प्रार्थना कर पाते .....!

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  3. बस प्रार्थनाएं कबूल हो जाएँ....
    और मेहनत सफल हो पुरुषों, स्त्रियों,
    जवान होते बच्चे और बच्चियों की......

    सादर
    अनु

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  4. जब कर्म की भावना हो तो कर्म ही धर्म बन जाता है ... बहुत सुंदर

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  5. आखिर कर्म ही इश्वर है.सुन्दर कविता.

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  6. बहुत खूब !!

    अब जल को तो छोड़ दीजिये
    अभी उनको पता नहीं चला है
    कि जल का बंटवारा बचा है!!!

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  7. एक ईश्वर, एक आकाश, बादल भी एक से आने हैं, प्रार्थना भी एक...बहुत सुन्दर..

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  8. उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
    नहीं होता है कोई धर्म/जाति
    होता है केवल
    जल और जल
    वाह क्या भाव है

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  9. उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
    नहीं होता है कोई धर्म/जाति
    होता है केवल
    जल और जल

    ....बहुत खूब! लाज़वाब और सार्थक सोच...

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  10. शशक्त ... कुछ बाते धर्म, जाती, साम्प्रदाओं से अलग होती हैं ... जो जीवन की बाते होती हैं ... सांसों की बाते होती हैं ..

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  11. उनकी प्रार्थनाओं और गीतों में
    नहीं होता है कोई धर्म/जाति
    होता है केवल
    जल और जल

    ....बहुत सटीक और सार्थक प्रस्तुति...

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  12. जब मेहनत और पसीने से भींगे मन और हृदय से उस खेत को सींचा जाता है ईश्वर उनकी प्रार्थना ज़रूर सुनते हैं।

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  13. उनकी प्रार्थना सुनी जाये यही दुआ है। सुन्दर रचना।

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  14. मेरी पहली वाली टिप्पणी को स्पैम से निकालिए।
    ** आपकी इस कविता में निहित प्रार्थाना को पढ़कर सगीना माहतो द्वारा की गई प्रार्थना याद आ गई ..
    “ऊपर वाला दुखियो की नहीं सुनता रे! ...”

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