मंगलवार, 10 जुलाई 2012

बवासीर



सदियों से
साथ रहा है उनके
यह रोग
जिन्होंने
काटे हैं  पहाड़
बनाये हैं महल
ऊँची चारदीवारी
सड़क, पुल और
नई फैक्ट्रियां

पीठों पर
जो ढोते हैं पत्थर
हाथ
जो गढ़ते हैं
शिलाओं की मूर्तियाँ
जो अपनी छाती के  जोर से
बढ़ाते हैं समय को आगे
साथ साथ उनके
चुप चाप चलता है

युद्ध में बहे खून का
हिसाब तो फिर भी है
लेकिन इतिहास में दर्ज नहीं
मेहनतकशो की यह पीड़ा

20 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ समझ नही आयी अरुण ज़ी इस बार …………किस संदर्भ मे है आपकी रचना बवासीर बिम्ब के रूप मे है या बीमारी के रूप मे ?

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    1. वंदना जी कविता में यह स्पष्ट है . यदि स्पष्ट नहीं है को कविता सफल नहीं हुई है. बवासीर एक ऐसी पीड़ा है जिससे केवल और केवल मजदूर ग्रसित होता रहा है. सदियों से. मजदूरों की पीड़ा को एक बीमारी के नाम से कहने की कोशिश भर की है. अपने आस पास देखिये जीवन को.. ये लोग आम तौर पर मिल जायेंगे... ये बीमारी भी बड़ी आम सी है. बड़ा सपाट सा विम्ब है... इस से स्वतः स्पष्ट हो जाना चाहिए था...

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  2. मार्मिक ... उस श्रमिक की करुना का चित्रण किया है अरुण जी आपने ... सफल चित्रण उस खून कों कोई नहीं समझ पाता ...

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  3. सुंदर !
    गरीबी अपने आप में बवासीर नहीं है क्या?

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  4. behtarin...hamesha kee tarah...babaseer sheershak
    padhne ke kavita padhkar main ajkmanjas me tha lekin kavita ke bishay me aapke bichaar jaankar bhranti ka nirmoolan ho gaya..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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  5. यह अगर बीमारी है तो यह किसी वर्ग को नहीं छोड़ती। वंदना जी की बात में दम है।
    हां आपकी नज़र से देखता हूं, तो कविता अच्छी लगी।

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  6. यह केवल गरीबों की ही बीमारी है यह तो नहीं कहा जा सकता ... पर हाँ गरीब की ज़िंदगी की पीड़ा ज़रूर है

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  7. कविता गरीबी के दर्द को एहसास कराने का सफल प्रयास है।

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  8. श्रमिक के पसीने का हिसाब न होना और मूल्य न चुकना तो निश्चित ही दुखद है किन्तु यह तो एक बीमारी जो बहुत कब्ज़ के शिकार लोगों में ज्यादा पाई जाती है...मजदूर कम से कम बवासीर का शिकार तो गरिष्ट खाकर बैठे रहने वाले मालदार रईसों की तुलना में नगण्य ही होंगे. मेहनतकश वयक्ति को भला क्या कब्जियत और भला क्या पाचन तंत्र की खराबी- यही दो मूल कारण तो हैं बवासीर या फिर भगंदर (फिशर) के...बाकी तो कोई डॉक्टर कुछ कहे!

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  9. क्या कविता को मेरे समझने में कुछ कमी रह गई है अरुण भाई.....

    अगर ऐसा है तो क्षमाप्रार्थी.

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  10. बहुत सुन्दर और मार्मिक चित्रण | गरीबी सच में एक अभिश्राप है बवासीर जैसी बीमारी की तरह | आभार

    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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