सोमवार, 6 अगस्त 2012

पहाड़ और क़ानून



पहाड़,
पत्थरों पर
जिनका था अधिकार
वे कानून की किताब से
हैं बाहर
उन्हें पढनी नहीं आई
क़ानून की भाषा
और जो भाषा
जानते हैं वे
उस भाषा में
नहीं लिखा जाता है
क़ानून

पेड़
नहीं जानते हैं
कैसे वे कटने के बाद
बदल जाते हैं
प्रीमियम प्रोडक्ट में
वे इतना भर जानते हैं
सूखे और झडे पत्तों को बटोरने
और टहनियों के काटने से
नहीं होता प्रदूषण
नहीं कम होते पेड़
हाँ ! चूल्हा जरुर जलता है
चूल्हे की आग में
नहीं होती बारूदी गंध
बन्दूक सी
समझ कहाँ है इसकी
क़ानून को. 

क़ानून
पेड़ को कटघरे में
खड़ा कर सकता है
क्यों दी  उसने
पहाड़ को घनी  छाया
फल और सूखे पत्ते
क्योंकि
क़ानून में लिख दिया गया है
नहीं चलेगी
पेड़ की मर्ज़ी अपनी

14 टिप्‍पणियां:

  1. स्वार्थ को और कानून को कैसे समझाये नंगे होते पहाड़, कटते जाते पेड़।

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  2. बहुत अच्छी कविता पढ़ाई अरूण जी आपने।..आभार।

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  3. अरुण जी! बहुत दिनों बाद लौटा हूँ और आपने इतनी शानदार रचना से स्वागत किया है.. शुभाशीष है आपको!!

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  4. बेहतरीन भाव पूर्ण रचना के लिए बधाई ,,,,अरुण जी,,,,

    RECENT POST...: जिन्दगी,,,,

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  5. क़ानून में लिख दिया गया है
    नहीं चलेगी
    पेड़ की मर्ज़ी अपनी
    यही तो दुखद है .... बहुत सुंदर

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  6. पहाड़,
    पत्थरों पर
    जिनका था अधिकार
    वे कानून की किताब से
    हैं बाहर
    उन्हें पढनी नहीं आई
    क़ानून की भाषा
    और जो भाषा
    जानते हैं वे
    उस भाषा में
    नहीं लिखा जाता है
    क़ानून
    सोच की अदभुत छवि यह रचना ...

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  7. कविता के माध्यम से गहरे सत्य और आज की व्यवस्था के आत्म्घाती परिणाम को लिख दिया है आपने ... बहुत प्रभावी दूरगामी रचना ...

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  8. ye ek kadva satya hai ,kanoon ne ped jameen ka haq rakhane valon ko isse door kiya hai aur ab to prakruti bhi kanoon ke aage bebas hai..
    sundar rachna..

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  9. क्या घुमा के मारा है।
    पेड़ को पहाड़ पे
    अब आयेगा समझ में
    कानून !

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  10. ये ऐसी उलझने हैं जिन्हें जितना जानना चाहो उतना ही उलझते जाते हैं।

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