मंगलवार, 21 अगस्त 2012

वो इमली का पेड़




१.
खेतों के बीच
हुआ करता था
एक इमली का पेड़
(अब वे खेत ही कहाँ हैं)

२.
सुस्ताया करते थे 
खेत जोतते बैल और हरवाहे 
उस इमली के पेड़ के  नीचे
(अब वे बैल और हरवाहे ही कहाँ हैं )

३.
हुआ करता था 
गौरैया  का घोंसला 
इमली के पेड़ पर 
(अब वे गौरैया  ही कहाँ हैं)

४.
सुना है
कट गया है 
इमली का पेड़
(कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लगा यह तो होना  ही था )

34 टिप्‍पणियां:

  1. यह तो होना ही था .... संवेदनशील भाव लिए हुये

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  2. गहनभाव लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  3. स्वार्थी मनुष्य अपने पाँव पर ही कुल्हाड़ी मार रहा है....
    गहन अभिव्यक्ति.

    सादर
    अनु

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  4. यह तो होना ही था ... पता नहीं और क्या क्या होना है इंसान की भूख को मिटाने के लिए ...
    सोचने को मजबूर करती रचना ...

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  5. पुरानी बाते अब कहाँ रही,सिर्फ यादें बची है,,,,,
    उत्कृष्ट गहन प्रस्तुति,,,,,

    RECENT POST ...: जिला अनुपपुर अपना,,,

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  6. कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लगा यह तो होना ही था

    वक्त सब बदल देता है।

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  7. Nahee pata hota ped lagane waleko ki,wo kab kat jayega!Bahut sundar rachana!

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  8. इमली के पेड के माध्यम से जो आज पेड़ों को काटकर हरियाली समाप्त कर कंक्रीट की इमारतें बनती जा रही हैं उस पर ब्यंग करती हुई शानदार रचना /बधाई आपको /


    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /

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  9. बहुत खूब !

    पर इमलियां
    कहाँ गयी?

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  10. सुना है
    कट गया है
    इमली का पेड़
    (कोई आश्चर्य नहीं हुआ, लगा यह तो होना ही था )

    इन्हें अलग अलग क्यों किया ...?
    एक ही कविता रहती तो अंत तक आते आते
    जो भाव स्पष्ट होता है वह अद्भुत है ...

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  11. बहुत कुछ कट गया है जीवन से ...इमली के पेड़ की तरह .....

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  12. गुलज़ार साहब ने अपनी गली के आम के पेड़ को याद करते हुए एक लंबी नज़्म लिखी थी और आज आपने इस इमली के पेड़ के ज़रिये जो दर्द बयान किया है, उसे वही महसूस कर सकता है जिसने उस इमली के पेड़ को देखा हो, अपनी चाचा, काका या ताऊ की तरह!! बहुत खूब अरुण जी!!

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    1. सलिल सर बहुत दिनों बाद लग रहा है कि कविता लिखा हूं... आपकी टिप्पणी स्वयं में कविता होती है... अपना स्नेह बनाये रखियेगा .. आपका अरुण

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  13. हमारे गांव समय के साथ धीरे धीरे अपने अस्तित्व की विशेषता खो रहे हैं ।

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  14. सुना है हम पहले संवेदनशील हुआ करते थे ....

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    1. अभी क्या कमी है...
      अरुण जी स्पैम से उद्धार करें मेरी टिप्पणी का!!

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  15. समय के साथ सब कुछ बदल जाता है..

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  16. इमली का पेड़ कट गया ,हरवाहे दिखते नही ...सब कुछ बदल जायेगा । हम बचे रहें .. मानवता बची रहे ,मित्रता और प्यार महफूज़ रहे - अब तो यही कामना है ।

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  17. आधुनिकता में मानवता खो
    रही है उसी का परिणाम है ये...
    सार्थक चिंतन लिए रचना...
    सुन्दर:-)

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  18. बदलती परिस्थितियों को आपने इन शब्दचित्रों से बहुत ही बढिया प्रस्तुत किया है।

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  19. अरुण जी यह समय से आंख चुराती कविता है। इमली का पेड,खेत,बैल और चरवाहे सब वहीं हैं, केवल आप वहां से चले आए हैं।

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    1. राजेश जी आज मैं आपसे असहमत हूं. मैं और मेरी कविता समय से आँख चुरा नहीं रही है बल्कि समय को आपसे सामने यानि पाठक के सामने ला रही है... १९५०-५१ में भारत के जी डी पी में कृषि की हिस्सेदारी ५०% से अधिक थी जो कि घट कर वर्तमान में १४% के आसपास रह गई है... भारत में कृषि योग्य भूमि में लगातार कमी हो रही है... और प्रतिव्यक्ति खेत केवल ०.३ हेक्टर रहा गया है जबकि लाखो लोग भूमिहीन हो चुके हैं... लैंड यूज़ में तेज़ी से परिवर्तन के कारण शहर के आसपास वाले क्षेत्रों में खेत औद्योगिक हबों में बदल चुके हैं.... ये मैं नहीं कह रहा..शोध और आकडे कह रहे हैं... हाल के दिनों में कृषि में नकारात्मक वृद्धि देखी गई है...ग्यारहवी योजना अवधी में सरकार का लक्ष्य ४% दे दर से कृषि क्षेत्र में तरक्की का था जो कि हासिल नहीं हो सका है.... ऐसे में खेत वहीँ हैं..इमली के पेड़ वहीँ है...कहना गलत होगा.... वे वहां नहीं हैं...कविता बनी या न बनी हो लेकिन कविता मुह नहीं चुरा रही समय से.... आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे... सादर

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  20. sab kuchh badal raha hai.. jahan khet the, wahan rashte .... aur buildings ban chuki...
    sam-samyik rachna..

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  21. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (01-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  22. ये तो होना ही था रचना का मूल तथ्य है पुरानी बातें दिल में बसी रहती हैं पुनरावृत्ति का भाव रखती हैं जो नामुमकिन है सो दिल में टीस जन्म लेती है -----बहुत अच्छी रचना

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  23. पढ़ कर एक दम उस कीकर की याद आई जो हमारे घर, खेत के कोने में थी. जि‍से बचपन से देखता आया था मैं. एक बार घर गया तो नहीं थी वो वहां. बहुत खाली खाली लगा.

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  24. SAARTHAK KAVYA PANKTIYON KE LIYE AAPKO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA .

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  25. काल का पहिया चलता जाए.
    खेत,बैल ,हरवाहे,गौरेया,इमली का पेड़
    सब मिटते चले जा रहे हैं.

    न जाने अभी और क्या क्या मिटेगा अरुण भाई.

    सुन्दर भावमय मार्मिक प्रस्तुति.

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