रविवार, 4 अगस्त 2013

रेखाएं

(देश भर में मानसून अच्छा है , कह रहा है मौसम विभाग। नदियाँ उफान पर हैं।  मीडिया क्रिकेट , टमाटर और प्याज़ में व्यस्त है।  लेकिन आधे देश में बारिश अच्छी नहीं हुई है।  किसान के धान बारिश के पानी का बाट जोह रहे हैं।  धान की कोख में इन्ही बूंदों से मोती जमेंगे।  और किसान की इस चिंता को साझा करती कविता।  ) 


रेखाएं
न उभरे
तो ही अच्छा है
न चेहरे पर
न खेतो में 


बाबूजी के चेहरे पर
उभर आती हैं
तरह तरह की रेखाएं
आड़ी तिरछी
जब पानी बिना खेतो में
उभर आती हैं रेखाएं
दरारों के रूप में


आसमान का रंग
नीला नहीं काला होना चाहिए
सावन भादो में
पगडंडियों पर धूल नहीं
कीचड होना चाहिए
कहते हुए खेत की मेढ़ पर बैठा किसान
खींच देता है एक रेखा
अपने बूढ़े नाखून से 
धान की कोख से रिसने लगता है 
सफ़ेद खून
अच्छा नहीं है 
किसी किसान का 
रेखा खींच, फसल की कोख को 
लहूलुहान कर देना 

रेखाएं उभर आई हैं 
भालों और बरछों की तरह 
नीले आसमान में, सूखे खेतो में 




12 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिन बाद कुछ दिखा !
    सुंदर !

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  2. अच्छा नहीं है
    किसी किसान का
    रेखा खींच, फसल की कोख को
    लहूलुहान कर देना .....

    अद्भुत!!!
    सादर
    अनु

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  3. सावन भादो में
    पगडंडियों पर धूल नहीं
    कीचड होना चाहिए

    अलग अंदाज़ है आपका , सबसे अलग !
    बधाई !

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  4. भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  5. सच है .. किसान जो देख रहे हैं बस मटमैला आसमान सूखी आशा लिए ... उनके दर्द को बाखूबी लिखा है आपने अरुण जी ...
    बहुत दिनों बाद आपको पढ़ा ... अच्छा लगा ...

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  6. धरतीपुत्र की चिता और उसके दर्द की सटीक अभिव्यक्ति!

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  7. रेखाएं अक्सर दर्द की गवाही देती हैं।
    जमीन पर हो या चेहरे पर !!

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  8. आसमान से धरती की ओर बढ़ती रेखा बने, जल की।

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  9. कुछ रेखाएँ अपने हाथों में भी खिचती हैं ...उन पर भी अपना बस कहाँ चलता है ...हर उभरने वाली रेखा कभी भी मिटाएँ नहीं मिटती ||

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  10. ek ek rekha ka dard itani gahrai se mahsoos karte aapne apni samvedansheelata ka parichay diya hai ...
    bhavnatmak rachna ..

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  11. किसी किसान का
    रेखा खींच, फसल की कोख को
    लहूलुहान कर देना
    ........बहुत दिनों बाद बाखूबी लिखा है आपने अरुण जी ...

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