बुधवार, 3 सितंबर 2014

नदी और पुल से फेंके गए सिक्के






एक छोटी नदी 
बहती थी मेरे गाँव  के  पास से 
कई नाम थे उसके 
मेरे गाँव में आने से पहले 
कमला थी वह 
मेरे गाँव से गुज़र जाने के बाद 
बलान हो जाती थी 
कोसी में मिलने के समय उसका नाम होता था 
करेह 

इस नदी में चलती थी नाव 
नहाती थी भैंसे 
विसर्जित होती थी प्रतिमाएं 
फेंके जाते थे जाल मछलियों के लिए 
और पुल से कूद जाती थीं लडकियां कभी कभी 
जो मिल जाया करती थी गंगा मैया से 

बूढ़ी औरते इस छोटी नदी को समझती थी 
सिमरिया वाली गंगा 
और पुल से फेंकती थी सिक्के 
पहले पांच के, दस के, बीस पैसो के  
फिर चवन्नी, अठन्नी, 
और इन दिनों फेंकती हैं 
रूपये, दो रूपये और कभी कभी पांच रूपये के सिक्के भी 
मन ही मन बुदबुदाती हुई कुछ 

मैं बचपन से सोचता रहा 
नदी कैसे बनती है 
कैसे बहती है 
कैसे अप ने  पेट मे रखती है 
मछलियाँ, कूदी हुई लड़कियों के राज़ 
और पुल से फेंके गये सिक्के 
प्रार्थनाओं के संग 

4 टिप्‍पणियां:

  1. नदी भी तो माँ होती है ... समेत लेती है पूरा अंचल सबके सपने ...
    बहुत दिनों बाद आपको दुबारा पढ़ा अरुण जी ... मजा अ गया ...

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  2. आपकी कविताओं के भाव हमेशा कुछ ना कुछ सोचने को मजबूर कर ही देते हैं... आज भी वही किया..

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