गुरुवार, 4 सितंबर 2014

हताश


दरवाज़े हैं 
बंद 
खिड़कियों पर 
मढ़ दिए गए हैं
शीशे 

हवाओं के लिए भी 
नहीं है 
कोई सुराख़ 

आसन्न है 
अंत !

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (05.09.2014) को "शिक्षक दिवस" (चर्चा अंक-1727)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. निराशा की इस पराकाष्ठा को आपने ,कम शब्दों में ही पूरा विस्तार दे दिया है । ।

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  3. हताशा, निराशा नही चाहिये ऐसी वाली आशा।
    एक बार कोशिश करिये मुस्कुराने की।

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  4. बहुत भावपूर्ण ... ... मन की गहराई तक उतर जाने वाली

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  5. अंत या एक नयी शुरुआत की जंग ...

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