मंगलवार, 2 सितंबर 2014

कलवर्ट



गाँव के बाहर 
हुआ करता था 
एक कलवर्ट 
जिसके नीचे से बहता था 
ऊंचाई से नीचे की ओर 
बारिश का पानी 
इसपर बैठ होती थी बहसें 
सुना जाता था कभी 
रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री 

यही बैठ जो कभी रटते थे 
रसायन विज्ञान के सूत्र 
अफसर बन चले गए 
राजधानी की ओर 
और लौटे नहीं फिर कभी 
कलवर्ट पर. 

कलवर्ट 
आज अकेला जोहता है बाट 
कोई आये 
करे बहस, सुने कमेंट्री 
रटे रसायन के सूत्र 
इसके नीचे से बहे 
ऊंचाई से नीचे की ओर पानी 

किन्तु क्या प्रयोजन है कलवर्ट का 
जब बह रहा हो पानी 
नीचे से ऊपर की ओर चारो तरफ 
कलवर्ट का एकाकीपन पसर रहा है 
गाँव गाँव घर घर ! 

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरी बात कह गए आप इस कविता में आज ...!!

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  2. अपनी व्यस्तताओं में उलझा रहा मैं और आपकी सक्रियता देखकर प्रसन्नता हुई.. आशा है आपके घर-परिवार और मन के कलवर्ट के नीचे बहता हुआ अवसाद दूर निकल गया होगा और वे रसायन के सूत्र आज रसायन-चिकित्सा के रूप में आरोग्य प्रदान कर रहे होंगे...!!

    मेरे मन का कलवर्ट भी सूना था जब सुना था वह व्यथित करने वाला समाचार. चाहकर भी उस कलवर्ट पर नहीं जा सका, यह सोचकर कि अगर आपसे मिलना हो भी गया तो क्या मैं बात करने का सामर्थ्य भी जुटा पाउँगा! मेरी पत्नी भी दु:खी थीं!
    आपकी वापसी और कविता का बहता सोता यूँ ही सदा स्वच्छ सलिल प्रवाह सा गतिमान रहे, यही आशीष है!!

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  3. 'कलवर्ट' अब हर जगह सूने ही हैं । लेकिन उनके गुलज़ार होने की उम्मीद भी अभी पूरी तरह खत्म नही हुई । होनी भी नही चाहिये ।

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  4. बहुत सुन्दर।
    पानी ही नहीं तो कलवर्ट काया करेगी।

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  5. पानी बहने की दिशा ही बदली तो कलवर्ट का सूनापन बढ़ता ही। लौटें पंछी डालों की ओर तो कुछ उम्मीद बची रहे !
    कैसी उदासी है कविता में !

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  6. सूने हैं सब कलवर्ट आज ... हमारी, आपकी बात भी तो जोह रहे हैं ...

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