बुधवार, 20 जनवरी 2010

बाबूजी के खामोश होने के एहसास से

अचानक लगा
फिसल गया हूँ
बाबूजी के कन्धों से

अचानक लगा
छूट गई हैं उँगलियाँ
बाबूजी के हाथों से

अचानक लगा
आज दरवाजे पर
कौन खड़ा होगा
लम्बी सी बेंत लिए
देर से घर लौटने पर

आज
मैं सुबह
समय पर जाग गया
बाहर गली में देर तक नहीं खेला
तितलियों के पंख नहीं तोड़े

बस बाबूजी के खामोश होने के एहसास से !

10 टिप्‍पणियां:

  1. आँखें नम हो आयीं इस मासूम ख्याल पे

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  2. अप्रत्‍याशित और आपने खबर भी नहीं की। अगर यह सच है तो ....। विश्‍वास नहीं हो रहा है।

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  3. बहुत कोमल और दृढ ...बहुत सुंदर रचना ...

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  4. बहुत से लोग बाबूजी के खामोश होने का इंतज़ार करते हैं ..बहुत मार्मिक चित्रण .

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  5. अश्रुपूरित आँखों से लिख रही हूँ ..आपकी रचना में आपके बाबूजी के लिए आपका प्यार ओत प्रोत है ...
    सादर
    kalamdaan.blogspot.com

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  6. बहुत गहरी संवेदना लिए कविता।
    बाबुजी के होने का एहसास।

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